बजट के अभाव में को-ऑपरेटिव बैंकों पर अंश पूंजी का संकट

भोपाल/ प्रणव बजाज/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश सरकार की आर्थिक बदहाली का असर अब प्रदेश के सहकारी बैंकों पर भी पड़ने लगा है। दरअसल आय कम और खर्च अधिक होने की वजह से सरकार ने इस बार प्रदेश के बजट में इन बैकों की अंशपंूजी के लिए राशि का ही प्रावधान नहीं किया है। जिसकी वजह से इस साल के आने वाले महीनों में इन बैंको के सामने परिचालन पर गंभीर वित्तीय संकट खड़ा होना तय माना जा रहा है। दरअसल इस साल बैंकों को अंश पूंजी के रुप में करीब एक हजार करोड़ की जरुरत थी, लेकिन अब तक इस राशि की कोई इंतजाम ही नहीं किया गया है। यही वजह है कि अब सहकारिता विभाग बैंक के लिए राशि का इंतजाम होने के लिए अनुपूरक बजट का इंतजार कर रहा है। गौरतलब है कि सहकारी बैंकों के संचालन के लिये राज्य सरकार द्वारा ही अंशपूजी दी जाती है। खास बात यह है कि इस बार के बजट में राज्य सरकार द्वारा मद बनाए रखने के लिए महज तीन हजार रुपये का प्रावधान किया है। जबकि इसके पहले पूर्व की सरकार ने बीते साल इसके लिए एक हजार करोड़ रुपये का इंतजाम किया था।
कोरोना की वजह से सरकार की आय पर भारी प्रतिकूल असर पड़ा है, जिसकी वजह से सरकार ने इस विभाग के बजट में बीते साल की तुलना में 1880 करोड़ रुपये से अधिक की कटौती कर दी है। जिसके चलते बैंकों के सामने अंशपूंजी का संकट खड़ा हो गया है। यही नहीं सरकार द्वारा इस बार किसानों के अल्पकालिक ऋण की राशि पर भी कैंची चला दी है। बीते साल विभाग को बजट में 2583 करोड़ 86 लाख 83 हजार रुपये का प्रावधान किया गया था, लेकिन इस बार उसमें 70 फीसदी से अधिक की कमी कर दी गई। इस बार बजट में सिर्फ 703 करोड़ 39 लाख 14 हजार रुपये का ही प्रावधान किया गया है। इससे यह तय हो गया है कि इस बार राज्य सरकार द्वारा सहकारिता विभाग की योजनाओं को प्राथमिकता नहीं दी गई है।
ब्याज अनुदान में 474 करोड़ की कमी
सहकारी बैंकों द्वारा किसानों को दिए जाने वाले अल्पकालिक ऋण पर ब्याज अनुदान पर भी सरकार ने जमकर कैंची चलाई है। यही वजह है कि बीते साल किए गए 69 करोड़ के एवज में इस बार महज 225 करोड़ रुपये का ही प्रावधान किया गया है। दरअसल राज्य सरकार किसानों को शून्य फीसदी ब्याज पर अल्पकालिक ऋण देती है। इस ब्याज अनुदान की भरपाई सरकार द्वारा की जाती है। इसके बाद भी उसमें करीब 60 फीसदी से अधिक की कमी कर दी गई। इस मद में 700 करोड़ रुपये से अधिक की जरुरत होती है, लेकिन पर्याप्त राशि का प्रावधान न होने से सहकारी बैंकों को वित्तीय संकट से परेशान होना पड़ेगा। किसानों को जीरो फीसदी पर कर्ज देने की योजना से बैंक अधिक फायदे में रहते हैं। इसकी वजह है ब्याज की रकम का एक मुश्त सरकार से मिलना। यही नहीं बड़ी संख्या में किसान कर्ज तय समय में नहीं चुका पाते हैं , जिसकी वजह से बैंक उनसे सामान्य दर पर ब्याज वसूलते हैं।
मध्यकालिक ऋण पर भी देती है ब्याज अनुदान
प्राकृतिक आपदा के दौरान फसलों को नुकसान होने पर राज्य सरकार कई बार अल्पकालिक ऋण को कुछ समय के लिये स्थगित कर उसे मध्यकालिक ऋण में बदल देती है। इससे किसानों को फौरीतौर पर राहत मिल जाती है। इससे आपदा पीड़ित किसानों को कुछ राहत देने का प्रयास होता है। बीते साल इसके लिए 94 करोड़ 51 लाख रुपये दिए गए थे , लेकिन इस साल इसमें मामूली बढ़ोतरी कर 96 करोड़ 70 लाख रुपये कर दिया गया है।
मुख्यमंत्री ऋण समाधान योजना भी अछूती नहीं
विभाग के बजट में कटौती का गंभीर असर मुख्यमंत्री ऋण समाधान योजना पर भी पड़ा है। इस बार इस योजना की राशि में बड़ी कटौती कर दी गई है। बीते साल इस मद में 309 करोड़ 16 लाख रुपये दिए थे, जिसकी तुलना में इस बार मात्र 88 करोड़ रुपये का ही प्रावधान किया गया है। इसी तरह राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम द्वारा दिए जाने वाले कर्ज पर ब्याज के लिए 22 करोड़ 40 लाख रुपये का इंतजाम किया किया गया है, जो बीते साल के मुकाबले दस करोड़ रुपए कम है। इस कटौती का असर विभाग की योजनाओं पर पड़ने के साथ ही सहकारी बैंकों पर भी पड़ना तय है।
अनुपूरक का इंतजार माना जा रहा है कि राज्य सरकार अगले
शीतकालीन सत्र के दौरान प्रथम अनुपूरक बजट लाने की तैयारी कर रही है। इसमें सहकारी बैंकों को दिए जाने वाली अंशपूंजी की राशि का इंतजाम किया जा सकता है। संभावना है कि इसके लिए सरकार द्वारा कम से कम 500 करोड़ रुपए का इंतजाम किया जा सकता है।

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