2200 करोड़ का घोटाला लॉक…!

2200 Crore Scam Lock…!

बुंदेलखंड पैकेज में भ्रष्टाचार करने वाले दो सैकड़ा से अधिक अफसरों की करतूतों की फाइल बंद

बुंदेलखंड को चमन करने के लिए वर्ष 2008 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने 7400 करोड़ रूपए का पैकेज दिया था। इसमें से मप्र के 6 जिलों के लिए 3860 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गई थी और इस राशि से विशेष पैकेज के तहत बुंदेलखंड के जिलों में विभिन्न प्रकार के कार्यों के माध्यम से विकास किया जाना था। इसमें से 80 फीसदी राशि अधिकारियों के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। लेकिन आज तक भ्रष्टाचार करने वाले अफसरों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है। अब तो इस महाघोटाले की जांच की फाइल भी बंद हो गई है।

विनोद कुमार उपाध्याय/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)।
देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में शामिल बुदेलखंड के विकास के लिए मिले पैकेज में से मप्र के जिन छह जिलों में काम होना था उनमें सागर, छतरपुर, दमोह, टीकमगढ़, पन्ना और दतिया शामिल हैं। सागर में 840 करोड़, छतरपुर में 918 करोड़, दमोह में 619 करोड़, टीकमगढ़ में 503 करोड़, पन्ना में 414 करोड़ और दतिया में 331 करोड़ का काम होना था लेकिन कुल फंड की 80 फीसदी राशि यानी करीब 2200 करोड़ रुपए भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। लेकिन अभी तक भ्रष्टाचार करने वाले 200 से अधिक अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ आज तक कार्रवाई नहीं हो सकी है। इस साल जनवरी-फरवरी में राज्य आर्थिक अपराध ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने इस महाघोटाले की जांच शुरू की थी, लेकिन जांच आगे नहीं बढ़ सकी और अब जांच बंद हो चुकी है।
मप्र के बुंदेलखंड को केंद्र से विशेष पैकेज के रूप में 3860 करोड़ रुपए मिले थे। यह राशि मप्र के छह जिलों में सिंचाई, खेती, जलसंरचना, पशुपालन आदि पर खर्च की गई। मगर इतनी राशि के बावजूद कहीं भी कोई बदलाव नजर नहीं आया है। इस मामले को लेकर टीकमगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता पवन घुवारा ने मुख्य तकनीकी परीक्षक (सतर्कता) विभाग से शिकायत की। इस मामले की जांच हुई। सात विभागों के 200 अफसरों-कर्मचारियों को कटघरे में खड़ा किया गया है या यूं कहें कि उन्हें अनियमितता के लिए प्रारंभिक तौर पर दोषी पाया गया है। वन विभाग के 31 अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय जांच की गई। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के 15 कर्मचारियों को अनियमितता में लिप्त पाया गया। जल संसाधन विभाग के 91 अधिकारी घेरे में आए। उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के दो अफसरों को अनियमितता में लिप्त होने का आरोपपत्र जारी किया गया। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के 22 अधिकारियों व कर्मचारियों को आरोपपत्र जारी किए गए। वहीं वन विभाग के 34 अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ जांच हुई, लेकिन किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई।

ईओडब्ल्यू ने बंद की जांच
प्रदेश में पूर्ववर्ती कमलनाथ सरकार ने बुंदेलखंड पैकेज में हुए भ्रष्टाचार की जांच ईओडब्ल्यू को दी थी। ईओडब्ल्यू ने विभिन्न स्रोतों से मिले दस्तावेजों की जांच-पड़ताल शुरू की तो उसमें घालमेल ही घालमेल नजर आए। कार्यों व खरीदी गई सामग्री की गुणवत्ता, मजदूरी के भुगतान में हुई गड़बडिय़ों आदि के आकलन के आधार पर करीब 80 प्रतिशत यानी करीब 2200 करोड़ के भ्रष्टाचार की बात सामने आई। लेकिन जांच आगे नहीं बढ़ पाई। परंतु ईओडब्ल्यू को इस घोटाले से संबंधित जो दस्तावेज मिले है उनमें कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। पैकेज से सबसे ज्यादा राशि 1340 करोड़ रुपए जल संसाधन विभाग को मिले थे। इस राशि से उन्हें 6 जिलों में नहर निर्माण और सिंचाई परियोजनाओं के लिए खर्च करने थे। जांच की गई तो सामने आया कि विभाग द्वारा बनवाए गए ज्यादातर बांध और तालाबों में घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया। ये ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाएंगे और भी कई बड़ी तकनीकी खामियां मिली थी। इसके अलावा वन विभाग को चेकडेम के लिए 180 करोड़ रुपए दिए थे। पन्ना और छतरपुर में खुलासा हुआ था कि विभाग ने अपने कामों के लिए जिन वाहनों का इस्तेमाल ट्रक, डंपर के रूप में बताया। वे दरअसल मोटरसाइकिल और स्कूटर थे। वन विभाग द्वारा कोर एरिया में बनाए गए तालाब खोदे ही नहीं गए। इसी तरह पीएचई में 300 में से 100 करोड़ रुपए में गड़बड़ी मिली। कृषि विभाग के तहत 614 करोड़ से डीजल पंप वितरण, मंडी का निर्माण, वेयर हाउस आदि के कामों में भी शिकायतें मिली। ग्रामीण विकास विभाग के 209 करोड़ रुपए के काम ग्राउंड पर दिखाई ही नहीं दिए।

2012 में अनियमितताएं सामने आईं
सूत्र बताते हैं कि केंद्र सरकार से मिले पैकेज को क्रियान्वित करने के लिए सरकार ने विभागवार योजना बनाकर काम शुरू करवाया। लेकिन अधिकारियों ने कागजों पर विकास का खाका तैयार कर फंड को ठिकाने लगाना शुरू कर दिया। पहली बार साल 2012 में बुंदेलखंड पैकेज की अनियमितताएं सामने आई। इस मामले की पहली जांच चीफ टेक्निकल एक्जामनर विजिलेंस (सीटीईवी) द्वारा की गई। नेशनल रेनफेड एरिया अथॉर्टी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) जेएस सामरा ने दोनों प्रदेशों के जिलों में दौरा कर निर्माण कार्यों में अनियमितताएं होने की रिपोर्ट दोनों राज्यों को भेजी थी, लेकिन राज्यों ने इस जांच पर कोई ठोस एक्शन नहीं लिया। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के जिलों में पैकेज के तहत खोदे गए तालाब, कुएं, बकरी पालन से लेकर हर एक मद में घोटाले के आरोप सामने आने के बाद भी राज्य सरकारें इस मामले को लेकर गंभीर नहीं दिखीं। 2014 में टीकमगढ़ के समाजसेवी पवन घुवारा ने इस मामले में आरटीआई से मिली जानकारियों के आधार पर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। इस याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बुंदेलखंड पैकेज में हुए घोटालों की जांच के लिए निर्देश जारी कर दिए। हाईकोर्ट के निर्देश पर गठित जांच टीम ने 2017 में जो रिपोर्ट जारी की उसमें पैकेज की धनराशि में बड़े पैमाने पर घोटाला होने की पुष्टि हो गई। जांच टीम ने साफ तौर पर 350 स्टाप डैम के निर्माण में भारी अनियमितता होने का खुलासा किया। मप्र के छह जिलों में 1250 नलजल योजनाओं में से एक हजार नलजल योजनाएं पूरी तरह से बंद पाई गईं, जबकि पैकेज का पैसा खर्च कर इनको चालू बताया गया था। इस मामले में आरटीआई लगाकर हाईकोर्ट से जांच कराने वाले पवन घुवारा कहते हैं जल संसाधन विभाग को 1340 करोड़, पीएचई विभाग के 300 करोड़, ग्रामीण विकास विभाग के 209 करोड़ खर्च, कृषि विभाग के तहत 614 करोड़, वन विभाग को जारी 180 करोड़ के कुल फंड की 80 फीसदी राशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई।

वन विभाग ने खोदे तालाब, मौके पर नहीं मिले
दस्तावेजों की पड़ताल में यह बात सामने आई है कि वन विभाग द्वारा कोर एरिया में बनाए गए तालाब खोदे ही नहीं गए। हाईकोई के निर्देश पर जब टीम जांच करने निकली तो वह वन विभाग द्वारा खोदे गए कई तालाबों को जमीन पर नहीं ढ़ूंढ़ पाई। इसी तरह पीएचई में 300 में से 100 करोड़ रुपए में गड़बड़ी मिली। कृषि विभाग के तहत 614 करोड़ से डीजल पंप वितरण, मंडी का निर्माण, वेयर हाउस आदि के कामों में भी शिकायतें मिली। ग्रामीण विकास विभाग के 209 करोड़ रुपए के काम ग्राउंड पर दिखाई ही नहीं दिए। वन विभाग ने 180.37 करोड़ रुपए की राशि से पैकेज के तहत 6 जिलों में कार्य किए गए। छतरपुर जिले में बड़ामलहरा एवं बक्स्वाहा विकासखण्ड में बुंदेलखंड पैकेज के अंतर्गत कराए गए कार्यो में नवीन तालाब निर्माण में किए गए पिचिंग कार्य में निधारित गुणवत्ता का पत्थर नहीं लगाया गया, सामग्री क्रय की प्रक्रिया त्रटिपूर्ण रही। कक्ष पी-82 में भुगतान किए गए व्हाउचर्स क्रमांक एम-179 20 फरवरी 2012 में मजदूरों के हस्ताक्षर तो है, लेकिन बिना राशि इन्द्राज किए श्रमिकों के हस्ताक्षर कराए गए, जिसकी लागत 479981 रुपए हैं। इसी कक्ष में जेसीबी द्वारा कराए गए कार्यो का भुगतान बिना जेसीबी नंबर दर्शाए किया गया है। छतरपुर जिले में दिदौनिया जलाशय से 375.90 लाख रुपए की लागत से नहरों का निमार्ण किया गया, जांच में पाया गया कि, पुलियों में पाइप के अपस्ट्रीम एवं डाउन स्ट्रीम में सिल्ट जमा होने से नहर में डिजाइन डिस्चार्ज के अनुसार पानी प्रवाहित करने में अवरोध उत्पन्न हो रहा है। वहीं, 3136.10 लाख रुपए से रनगुंवा बांध की नहरो का लाइनिंग कार्य में नहर के सर्विस रोड़ के टॉप लेवल को मेन्टेन कर लिए जाने के बाद सर्विस रोड पर डब्लूबीएम रोड निर्माण के दौरान पुन: मिट्टी डालना दर्शाकर भुगतान कर दिया गया। इसी तरह से बरियापुर बायी तट में 545.90 करोड़ रुपए से मुख्य नहर का 49 किलोमीटर तक सीसी लाइनिंग निर्माण कार्य की जांच चलित प्रयोग शाला द्वारा की जाने पर सीसी लाइनिंग की स्ट्रेंग्थ निर्धारित मापदण्ड से कम पाई गई और लाइनिंग कार्य में दरारें भी पाई गई। इसी तरह सिंहपुर बैराज योजना में 260.63 करोड़ रुपए से मध्यम योजना की जांच में पाया कि शासन की बिना अनुमति के 1.15 करोड का भुगतान किया गया। वहीं, 802.03 लाख रुपए की खिरिया बुजुर्ग तालाब योजना तहसील बक्स्वाहा की जांच में वास्तविक सिंचाई न होने की शिकायत सही पाई गई।

केवल नोटिस जारी कर मामला दबा दिया
ईओडब्ल्यू के सूत्रों के अनुसार अनियमितताएं सामने आने के बाद प्रदेश के 200 से अधिक जिम्मेदार अधिकारियों को घोटाले का दोषी माना गया, लेकिन इस रिपोर्ट पर शासन स्तर से सिर्फ अधिकारियों को नोटिस जारी कर कार्रवाई को पूरी तरह से दबा दिया गया। पवन घुवारा की मानें तो सभी दोषी बताए गए अधिकारियों पर एफआईआर उसी समय हो जानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। जबकि इस पैकेज के क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार की सारी हदें पार की गई थी। योजनाएं जमीन पर पहुंचते-पहुंचते कैसे दम तोड़ जाती हैं बुंदेलखंड पैकेज इसका जीवंत दस्तावेज बनकर सामने आया है। दस्तावेजों की पड़ताल में यह तथ्य सामने आया है कि स्कूटर और मोटरसाइकिल के नंबरों पर 5-5 टन के पत्थर ढोकर घोटालेबाजों ने भ्रष्टाचार का रिकॉर्ड बनाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। कागजों में कुएं खोद दिए गए तो समतल पथरीली जमीन कागजों में तालाब होने की गवाही देती मिली, लेकिन जांच में हुए खुलासों पर न तो प्रशासनिक अफसर गंभीर दिखे और न ही राज्य सरकार। पन्ना जिले में 9 वाटर शेड के कार्यों के भौतिक सत्यापन और वाउचर के परीक्षण में यह बात साबित हो गई कि वन विभाग ने निर्माण कार्यों में सभी नियम कायदों को ताक पर रख दिया। अनियमितता इस कदर बरती गई कि जांच अधिकारियों ने रिपोर्ट में यह तक दावा कर दिया कि बुंदेलखंड पैकेज के कार्य शासकीय विभाग के अनुसार ना करते हुए किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह निपटाई गई। फर्जी वाउचर द्वारा भुगतान करने की कोई भी सीमा ही नहीं रखी गई। इसके उदाहरण देते हुए जांच अधिकारी रिपोर्ट में कहते हैं कि कार्यों के दौरान लगभग 48 वाहनों का उपयोग दर्शाया गया। जांच समिति के 5 मार्च 2013 को जारी पत्र में जिला परिवहन अधिकारी पन्ना को वाहनों की पुष्टि करने के लिए लिखा गया, लेकिन पन्ना के आरटीओ ने जांच टीम के प्रशिासनिक अफसरों को कोई जवाब नहीं दिया। यह आश्चर्यजनक बात ही थी कि तत्कालीन आरटीओ पन्ना द्वारा महत्वपूर्ण जानकारियां आखिर क्यों छुपाई गई? इसके बाद जांच अधिकारियों ने एमपी आरटीओ की वेबसाइट से इन वाहनों की पड़ताल की तो वह हैरान रह गए। रिकॉर्ड के अनुसार 6 वाटर शेड में ही 25 वाहनों का रजिस्ट्रेशन होना नहीं पाया गया। 23 वाहन में से अधिकांश वाहन ऐसे हैं, जो कि वाउचर में दर्शाए गए प्रकार से एकदम भिन्न हैं। जैसे कि वाउचर के अनुसार ट्रैक्टर एवं जेसीबी दर्शाए गए हैं, लेकिन आरटीओ रजिस्ट्रेशन के अनुसार यह वाहन मोटरसाइकिल, स्कूटर, स्कूटी, पेप ऑटो रिक्शा और इंडिगो टैक्सी के नाम पर दर्शाए गए हैं। यानि कि यह साफ हो रहा था कि 5-5 टन के पत्थर जिन वाहनों पर ढोए गए हैं वह कोई हैवी वाहन नहीं बल्कि स्कूटर और बाइक जैसे दो पहिया वाहन ही हैं।

पशुपालन व उद्यानिकी में भी मिली गड़बड़ी
पैकेज के तहत 151.27 करोड़ रुपए की राशि से 6 जिलो में बकरी पालन, मुर्रा सांड और डेयरियां के विकास के लिए कार्य किया गया। डबल्ब संख्या बकरी इकाई में कमजोर बकरियां प्रदाय के कारण भारी संख्या में बकरियां की मृत्यु होना पाया गया। छतरपुर जिले 15.44 प्रतिशत मृत्यु दर पाई गई। इसके साथ ही मुर्रा वितरण में छतरपुर जिले में 15.88 प्रतिशत मृत्यु दर पाई गई। जांच रिपोर्ट के अनुसार निर्धारित प्रतिशत से अधिक मृत्यु होना इस बात का प्रमाण है कि ठेकेदारों द्वारा हितग्रहियों को स्वस्थ मुर्रा एवं बकरियां प्रदान नहीं की गई । योजना अनुसार राशि को सीधे हितग्राहियों के खाते में जमा किया जाना था, लेकिन छतरपुर जिले में अनुदान राशि 8371665 रुपए उपसंचालक पशु चिकित्सा सेवाएं छतरपुर द्वारा हितग्राहियों के खाते में जमा न करते हुए पशु चिकित्सा सहायक शल्यज्ञों के निजी खातों में जमा की गई, जो कि एक गंभीर आर्थिक अनियमितता है।

लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग में भी गड़बड़ी
299.51 करोड़ रुपए की राशि से 6 जिलों में कराए गए कार्यों की जांच में पाया गया कि, छतरपुर जिले में रेण्डम आधार पर प्रत्येक विकासखण्ड की दो योजनाओं का परीक्षण किया गया। छतरपुर जिले में 10 ग्रामों में नलजल योजना के तहत पाइप लाइन निर्धारित गुणवत्ता की नहीं डाली गई। हाईकोटे के निर्देश पर मुख्य तकनीकी परीक्षक मध्यप्रदेश की जांच रिपोर्ट में उल्लेख है कि अफसरों ने बुंदेलखंड पैकेज के तहत योजनाएं तैयार करने में अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वहन नहीं किया। यही कारण है कि 1287 में से 997 नलजल योजनाएं पूर्णत: व्यर्थ रही। जिसमें से छतरपुर जिले में 150 योजनाओं का लाभ लोगों को नहीं मिल पा रहा है। जांच में पाया गया कि, अफसरों ने न तो सामान की गुणवत्ता परखी, न भौतिक सत्यापन किया, न साइट विजिट की, न ही पाइन लाइन बिजली पंपों की गुणवत्ता परखी।

कृषि विभाग में भी जमकर गड़बड़ी
कृषि विभाग को बुन्देलखण्ड पैकेज से 614.36 करोड़ की राशि दी गई थी , जिसमें वेयर हाउस, मंड़ी निर्माण, उद्यानिकी, डीजल पम्प वितरण, आदि कार्य कराये जाने थे। उक्त संबंध में मुख्य तकनीकि परीक्षक द्वारा आंशिक जांच कराई गई, जिसमें पाया गया कि नौगांव में कार्यालय भवन, मैनेजर आवास गृह, चौकीदार भवन, वाटर पोर्श और बड़ामलहरा में केन्टीन, कृषक सूचना केन्द्र, पम्प हाउस का हस्तांतरण नहीं किए जाने से संरचनाएं क्षतिग्रस्त हो रही हैं। इसके अलावा छतरपुर जिले में माइको एरीगेशन योजना में बांटे गए स्प्रिंकलर एवं ड्रिप सेट की कुल संख्या 1059 के विरूद्ध दो चरणों में किए गए सत्यापन में 339 हितग्रहियों का मौके पर भौतिक सत्यापन किया गया, जिसमें कुल 101 कृषकों को कम सामान प्राप्त होना तथा 40 कृषकों को बिल्कुल भी सामान प्राप्त नहीं होना पाया गया। कलेक्टर द्वारा की गई जांच विवरण के आधार पर उप समिति द्वारा किए गए आंकलन में छतरपुर जिले के अंतर्गत हेराफेरी की संभावित राशि रुपए 65.24 लाख है।

ग्रामीण विकास विभाग में ये अनियमितताएं
छतरपुर जिले के ग्राम पतरा में श्यामरी नदी पर स्टाप डेम, कुटिया बेरी घाट स्टाप डेम का निर्माण विकासखण्ड राजनगर, बगमरिया घाट इमली चौक कुटी स्टाप डेम विकासखण्ड बिजावार, खजरी घाट दौरियां स्टाप डेम नौगांव विकासखण्ड, बिलरिया घाट पंचमनगर स्टाप डेम लवकुशनगर, गंगायच व विक्रमपुर स्टाम डेम राजनगर की जांच की गई। जांच में निर्माण में अनियमतिता पाई गई।

पैकेज का ठीक से क्रियान्वयन न होने के कारण पलायन
बुंदेलखंड को दिए गए इतने बड़े राहत पैकेज के सही तरीके से खर्च नहीं होने के कारण हर साल लाखों की संख्या में स्थानीय लोग रोजगार की तलाश में पलायन होने पर मजबूर हो रहे हैं। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, इस क्षेत्र में लगभग 60 से 70 प्रतिशत लोग कृषि पर जीवित रहते हैं, बहुत से लोगों के पास खेती खराब होने के बाद कुछ नहीं बचता है। ऐसे में क्षेत्र से पलायन अब एक दुष्चक्र बन गया है। बुंदेलखंड के पारंपरिक तालाबों की बनावट यहां के प्राकृतिक हालात को देखते हुए की गई थी। ये तालाब इस तरह बनाए गए थे कि एक तालाब के पूरा भरने पर उससे निकला पानी अगले तालाब में अपने आप चला जाता था, यानी बारिश की एक-एक बूंद संरक्षित हो जाती थी। अब यहां के अधिकतर पारंपरिक तालाब सूख गए हैं। 2004 से 2008 तक बुंदेलखंड में भयंकर सूखा पड़ा, जिसे देखते हुए सरकार ने बुंदेलखंड पैकेज की घोषणा की थी। यह पैकेज काफी बड़ा और कई परतों में है। इसमें 11 विभाग हैं। हर विभाग में कई योजनाएं बनाई गईं। माना गया कि बुंदेलखंड क्षेत्र सूखा प्रभावित इलाका है, इसलिए पैकेज को सूखा से निपटने के लिए डिजाइन किया गया। लेकिन, विडंबना यह है कि पैकेज निर्माण में स्थानीयता व पारंपरिकता का ध्यान नहीं रखा गया। पैकेज में विभाग, मद या योजना के लिए स्थानीय स्तर से किसी से सुझाव नहीं मांगा गया, सीधे केंद्रीय स्तर से योजनाएं बनाई गईं। इसमें कृषि, सिंचाई व बागवानी सहित 11 विभागों की योजनाओं पर फोकस किया गया। सिंचाई विभाग ने कुओं, नहरों या चेकडैम का लक्ष्य रखा। यह सब पहले से तय था, लेकिन गांव की जरूरत या प्राकृतिक हालात पर ध्यान नहीं दिया गया। करोड़ों खर्च करके मंडियों का निर्माण तो कर दिया गया, लेकिन इसमें अनाज कहां से आएगा, इस पर विचार नहीं किया गया। पूरे पैकेज में जनता से दूरी और पर्यावरण मानकों की घोर अनदेखी की गई, जिसके कारण भी यह पूरी तरह से असफल हो गया। बुंदेलखंड पैकेज को जमीन पर उतारने वाले पूर्व केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री प्रदीप जैन आदित्य कहते हैं कि तत्कालीन केंद्र सरकार ने बुंदेलखंड पैकेज के क्रियान्वयन में भरपूर मदद की, लेकिन राज्य सरकार ने काफी अनदेखी। योजना को केंद्र भेजता है, लेकिन उसके सही क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य की है, जिसमें उसने लापरवाही की। बाद के समय भी किसी भी सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

शोपीस बनीं ग्रामीण मंडियां
बुंदेलखंड पैकेज से करोड़ों रुपए खर्च करके 163 ग्रामीण अवस्थापना केंद्र का निर्माण कृषि उपज मंडी समिति द्वारा कराया गया है। प्रत्येक मंडी की लागत करीब 2 करोड़ रुपए है, लेकिन बनने के बाद सभी मंडियां बंद हैं। मंडियों के निर्माण का मुख्य उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य दिलाना है। हर जिले में मंडियों का निर्माण इस प्रकार किया गया है कि यह गांव के 10 किमी के दायरे में है। लेकिन ये मंडिया शोपीस बनकर रह गई हैं। सरकार का मानना है किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य नहीं मिलता, जिस कारण से किसान औने-पौने दामों पर अपनी उपज को बिचैलियों को बेच देते हैं। उम्मीद थी कि मंडियों के बनने से किसान अपनी उपज अपने गांव के नजदीक बेच सकेंंगे और उन्हें अच्छी आय होगी। लेकिन, हालात ठीक उल्टे हुए, जिन्हें देख किसान खुद को ठगा सा महसूस करता है। नई बनी मंडियों में किसान अपनी उपज बेचने जाता है तो उसे आढ़तिया ही नहीं मिलता। रक्सा और दतिया को जोडऩे वाली सडक़ पर रक्सा से 5 किमी दूर मुख्य रोड पर ही ग्रामीण अवस्थापना निधि से मंडी का निर्माण कराया गया है। मंडी का निर्माण 28 फरवरी 2013 में ही पूरा हो गया। इसकी निर्माण लागत 1.56 करोड़ रुपए आई। इसमें चार दुकानें बनाईं गईं हैं। दुकानें भी सभी को आवंटित हो चुकी हैं लेकिन, खुलती नहीं हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह खेती का न होना है। अंबाबाय गांव के पास बनी मंडी के बारे में किसान रामबहोर का कहना है कि जनप्रतिनिधियों ने इन मंडियों की ओर ध्यान ही नहीं दिया, जिसके कारण ये मंडियां वीरान हो गईं हैं।

पहली बारिश में ही नहर टूटी
टीकमगढ़ में बुंदेलखंड पैकेज के तहत जामनी नदी पर गांव हरपुरा से लेकर मडिया तक नहर का निर्माण किया गया है। 45.8 किमी लंबी इस नहर के लिए 37.95 करोड़ रुपए का बजट स्वीकृत किया गया। वर्ष 2011-12 से शुरू हुआ निर्माण का कार्य 15 जून 2016 को पूरा करना था, लेकिन यह 2017 तक पूरा नहीं हुआ। वहीं, घटिया निर्माण सामग्री के चलते 2016 में पहली ही बारिश में बोरी, शिवराजपुर, पडवार के पास नहर टूटकर बह गई है। इसकी जांच आज तक नहीं कराई गई। बांदा के सामाजिक कार्यकर्ता आशीष कुमार बताते हैं कि नहर टूटने के बाद भी प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। हमीरपुर के कुरारा ब्लॉक के खंडोर गांव में हैंडपंप के चारों ओर सोकपिट का निर्माण गया, लेकिन, निर्माण के बाद ही ये ध्वस्त हो गए। गांव वाले बताते हैं कि सोकपिट के निर्माण में घटिया निर्माण सामग्री का प्रयोग किया गया था। बुंदेलखंड सहित देश के दूसरे हिस्सों में पानी व सूखा मुक्ति पर वर्षों से कार्य कर रहे जल, जन जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय समन्वयक संजय सिंह का कहना है कि बुंदेलखंड में स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार, योजनाओं का नियोजन नहीं किया गया। इस कारण है कि यहां की जरूरत के हिसाब से योजना नहीं बनी। पैकेज वरदान साबित हो सकता था, अगर यहां की परंपरागत जल संरचनाओं का पुनरूद्धार कर दिया गया होता। पैकेज में ऐसी बहुत सी परियोजना शामिल की गईं, जिनमें लागत अधिक और लाभ बहुत कम था। आधारभूत संरचनाओं के विकास के नाम पर मंडी जैसे बड़े निर्माण प्रोजेक्टों को बनाया गया। जबकि यहां उत्पादन वृद्धि के लिए सिंचाई और कृषि में नवाचार के तौर पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया। पैकेज में अनयिमितता को देखते हुए तत्कालीन सरकार ने बुंदेलखंड पैकेज निगरानी कमेटी का गठन किया।

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