भाजपा में भोपाल और इंदौर की वजह से अटका टिकट का फॉर्मूला

Stuck ticket formula in BJP because of Bhopal and Indore

भोपाल/प्रणव बजाज/बिच्छू डॉट कॉम। अगले माह नगरीय निकाय चुनावों की घोषणा की संभावना को देखते हुए अभी से दोनों प्रमुख राजनैतिक दल भाजपा और कांग्रेस ने अपनी चुनावी तैयारियों को तेज कर दिया है। इस वजह से अभी से प्रत्याशी तय करने की कवायद पर दोनों दलों द्वारा पूरा जोर लगाना शुरू कर दिया गया है। इस वजह से बड़े शहरों में महापौर पद को लेकर रणनीति बनाई जा रही है, लेकिन इसमें प्रभावशाली नेताओं द्वारा परिजनों और विधायकों द्वारा खुद के लिए टिकट की दावेदारी किए जाने से टिकट का फार्मूला तय नहीं हो पा रहा है। भाजपा में तो भोपाल के अलावा इंदौर में महापौर पद के दावेदारों की वजह से यह मामला सुलझ नहीं पा रहा है। दरअसल स्थानीय समीकरणों के साथ सूबे की सियासत के गुणा-भाग भी इन चुनावों में अहम मायने रखते हैं। इसके अलावा प्रत्याशी तय करते समय बड़े नेताओं की पसंद, जीत व खर्च की क्षमता और अन्य समीकरणों को ध्यान में रखकर ही प्रत्याशी का नाम तय किया जाता है। कांग्रेस ने जरूर इंदौर का प्रत्याशी तय कर दिया है, लेकिन भाजपा में अभी फार्मूला का काम ही अटका हुआ है।

भोपाल में महापौर पद के यह चेहरे दावेदार
राजधानी भोपाल में भाजपा की ओर से विधायक कृष्णा गौर, राजो मालवीय, सुषमा साहू, कमलेश यादव, सविता सोनी, उपमा राय की दावेदारी मानी जा रही है, तो कांग्रेस की ओर से पूर्व महापौर विभा पटेल, संतोष कंसाना, शाब्सिता जकी का नाम सामने आ रहा है। भोपाल में हाल के दस सालों तक भाजपा का तो इसके पहले के दस सालों तक लगातार कांग्रेस का कब्जा रह चुका है। 1999-2000 में कांग्रेस से विभा पटेल फिर वर्ष 2004-05 में सुनील सूद जीते थे, उसके बाद भाजपा से कृष्णा गौर और फिर आलोक शर्मा महापौर बन चुके हैं।

भाजपा कर सकती है नया प्रयोग
माना जा रहा है कि भाजपा इस बार बड़े शहरों में शामिल भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में नया प्रयोग कर सकता है। यह प्रयोग नए चेहरों के रुप में किए जाने की संभावना है। माना जा रहा है कि इस बार प्रत्याशी चयन में वरिष्ठों को दरकिनार किया जा सकता है। इसका प्रयोग भाजपा द्वारा संगठन में किया जा चुका है। इसी वजह से ही भोपाल में सुमित पचौरी और इंदौर में गौरव रणदीवे का चयन जिलाध्यक्ष के रुप में किया गया है।

किस दल का क्या हो सकता है फॉर्मूला  
प्रत्याशी चयन के लिए भाजपा में जो फॉर्मूला तय किया जा सकता है उसमें  जिताऊ चेहरा, उम्र, हारे न हों, विधायक न हों और उनका नाम रायशुमारी में आने के साथ ही उनकी खर्च करने की क्षमता पर खरे उतरते हों, उधर कांग्रेस में प्रत्याशी चयन में जिताऊ चेहरा, आर्थिक क्षमता, सर्वे में नाम, दिग्गज नेताओं की पसंद को आधार बनाया जा सकता है।

इंदौर से यह हैं दावेदार  
महानगर इंदौर से भाजपा की ओर से पूर्व आईडीए अध्यक्ष मधु वर्मा , पूर्व विधायक सुदर्शन गुप्ता , गोविंद मालू, विधायक रमेश मेंदोला, गोपीकृष्ण नेमा, कृष्णमुरारी मोघे के नाम चर्चा में हैं जबकि कांग्रेस से महापौर पद के लिए विधायक संजय शुक्ला का नाम घोषित किया जा चुका है। इंदौर नगर निगम पर वर्ष 2000 से भाजपा का कब्जा है। यहां पर अंतिम बार कांग्रेस की ओर से 1995 में मधुकर वर्मा ने जीत हासिल की थी।

जबलपुर में इनकी दावेदारी  
भाजपा की ओर से संघ के डॉ. जितेंद्र जामदार, पूर्व महापौर प्रभात साहू, कमलेश अग्रवाल, महिला मोर्चा की अश्विनी परांजपे, पूर्व महापौर सदानंद गोडबोले की दोवादारी मानी जा रही है, जबकि कांग्रेस से विधायक तरुण भनोत के भाई गौरव भनोत, सौरभ शर्मा, आलोक मिश्रा, विधायक विनय सक्सेना, जगत बहादुर अन्नू, बाबू विश्वनाथ को दावेदार माना जा रहा है। जबलपुर नगर निगम पर कांग्रेस का अंतिम बार 1999 में महापौर विश्वनाथ दुबे बने थे। इसके बाद से ही भाजपा का कब्जा रहा है।

ग्वालियर में यह नाम चर्चा में
बीजेपी से पूर्व महापौर समीक्षा गुप्ता, पूर्व मंत्री मायासिंह, सुमन शर्मा, पूर्व महिला आयोग सदस्य प्रमिला वाजपेयी, खुशबू गुप्ता। वहीं कांग्रेस से जिलाध्यक्ष देवेंद्र शर्मा की पत्नी रीमा, सतीश सिकरवार की पत्नी शोभा, अशोक सिंह की पत्नी राजेश रानी के अलावा रश्मि पंवार, रुचि राय दावेदार हैं। ग्वालियर नगर निगम का रिकार्ड रहा है कि कांग्रेस से वर्ष 1965 में विष्णुमाधव भागवत आखिरी महापौर थे। तब से अब तक भाजपा का कब्जा है। इस सीट को छीनने में कांग्रेस को काफी मशक्कत करनी पड़ सकती है।
श्रीमंत फैक्टर भी करेगा प्रभावित: राज्यसभा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया का फैक्टर दोनों पार्टियों को प्रभावित करेगा। कांग्रेस के लिए यह पहला चुनाव होगा, जब ग्वालियर-चंबल में सिंधिया समर्थकों को टिकट देने का दबाव नहीं रहेगा। भाजपा को अप्रत्यक्ष रूप से सामना करना होगा। अब तक सीधे तौर पर सिंधिया ने दखलंदाजी नहीं की है, लेकिन पार्टी परिवर्तन के बाद सिंधिया खेमे को काफी उम्मीदें हैं।

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