श्रीमंत का कद बड़ा होगा या बौना यह तय होगा इन 19 सीटों से

Srimanta's height will be big or dwarf will decide from these 19 seats

उपचुनाव वाली 28 में से 19 सीटें ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव वाली

भोपाल/राजीव चतुर्वेदी/बिच्छू डॉट कॉम। प्रदेश की 28 सीटों पर उपचुनाव के लिए केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा तारीख की घोषणा की जा चुकी है। राजनीतिक दलों में चुनावी घमासान भी परवान चढ़ने लगा है। वहीं प्रदेश उपचुनाव की नौबत क्यों बनी इस पर भी चचार्ओं का बाजार गरम है। दरअसल ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थक मंत्रियों और विधायकों द्वारा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। सभी ने विधानसभा की सदस्यता से भी त्यागपत्र दे दिया। इस वजह से अल्पमत में आई कमलनाथ सरकार धड़ाम से गिर गई और प्रदेश में उपचुनावों की नौबत आ पड़ी। उपचुनाव में भाजपा ने सभी सिंधिया समर्थक 19 विधायकों को उम्मीदवार बनाया है। ऐसे में ये उपचुनाव सिंधिया की प्रतिष्ठा के साथ-साथ (सिंधिया राजघराने की) की भी हैसियत का ग्राफ बताएंगे। ज्योतिरादित्य का कद बढ़ेगा या बौना होगा इस बात को सिंधिया समर्थक ये 19 सीटों पर खड़े प्रत्याशियों की जीत-हार के परिणाम तय करेंगे। हालांकि संघ और भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे बढ़ाने में कोई कमी नहीं रखेगा। मुख्यमंत्री शिवराज चौहान और प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा की जोड़ी द्वारा कांग्रेस की अब तक की गई घेराबन्दी में सफल होती दिख रही है। इन 19 सीटों के नतीजे यदि सिंधिया के पक्ष में आते हैं, तो वे भाजपा में निर्णायक की भूमिका में नजर आ सकते हैं।
लेकिन यदि चुनाव नतीजे संभावनाओं के अनुरूप नहीं रहे तो खतरे भी उतने ही बड़े हैं। ये चुनौती सिर्फ ज्योतिरादित्य सिंधिया अकेले तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसे सिंधिया परिवार की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा है। हाल ही में भाजपा ने उपचुनाव के लिए स्टार प्रचारकों की जो लिस्ट जारी की है, उसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम 10 वे क्रम पर है। सबसे ऊपर प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा का नाम है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय ये भी है कि आखिर सिंधिया का नाम इतना नीचे क्यों है ? क्या भाजपा में सिंधिया को लेकर खेमेबाजी शुरू हो गई है। अगर ऐसा है भी तो ये स्थितियां उपचुनाव के परिणामों को प्रभावित कर सकतीं हैं।

चुनाव प्रचार के रथ में सिंधिया का पोस्टर नहीं
हाल ही में भाजपा द्वारा सभी 28 सीटों पर हाईटेक प्रचार के लिए रथ रवाना किए, जिसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और वीडी शर्मा के पोस्टर हैं, सिंधिया का पोस्टर नहीं है। ऐसे में जनता के पास जो मेसेज जाएगा उससे चुनाव पर प्रभाव जरूर पड़ेगा। क्योंकि जिन्होंने कांग्रेस के एक गुट के साथ बगावत कर भाजपा की सरकार बनवाई, उसे तवज्जो क्यों नहीं मिल रही जबकि उपचुनाव वाली 28 सीटों में 22 पर वे उम्मीदवार मैदान में हैं, जिन्होंने बगावत का झंडा उठाया था। बहरहाल भाजपा स्टार प्रचारकों की लिस्ट को लेकर कोई भी जवाब दे सकती है, परंतु सिंधिया को ऐसे समय मे क्रम में नीचे रखने का जो संदेश जनता में चला गया है उसे वापस नहीं लिया जा सकता। भाजपा को इसकी भरपाई करनी होगी। कांग्रेस ने भी इस मसले को
जमकर उठाया है।

सिंधिया घराने की नाक का सवाल है
प्रदेश के उपचुनाव ज्योतिरादित्य अकेले नहीं बल्कि सिंधिया राजघराने की नाक का सवाल है। क्योंकि ग्वालियर चंबल अंचल की 16 सीटों के अलावा मालवा निमाड़ अंचल की 7 सीटें भी उनके ही प्रभाव वाली ही हैं। ये क्षेत्र भी सिंधिया राजघराने की टेरिटरी में रहा है और चुनाव के वक्त उनके प्रभाव को तवज्जो मिलती रही है। ऐसे में ज्योतिरादित्य सिंधिया की राजनीति के लिए ये 19 सीटों के उपचुनाव जीवन-मरण का सवाल बन गया है। अब दस नवंबर को उपचुनाव के नतीजे बताएंगे कि सिंधिया का वर्चस्व अभी कायम है या वहाँ कोई विपरीत प्रभाव पड़ा है।

कांग्रेस सहानुभूति के सहारे मैदान में
कांग्रेस ने सिंधिया समर्थकों को ‘गद्दार’ और बिकाऊ का नारा दिया था। लेकिन कुछ समय चलने के बाद ही इसका प्रभाव कम होता गया। ऐसे में कमलनाथ को मतदाताओं को आकर्षित करने सहानुभूति का ही सहारा है। जबकि भाजपा ग्वालियर में अपना वार रूम बनाकर धमखम के साथ मैदान में डटी है। रोज एक्शन प्लान बनते हैं और उनपर अमल करने पूरी फौज जुटी है। वहीं कमलनाथ अब तक वार रूम बनाने की रणनीति पर ही अमल नहीं कर सके। प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता केके मिश्रा जरूर ग्वालियर में डेरा डाले हुए हैं और पूरी मुस्तैदी के साथ डटे हुए हैं। कमलनाथ खुद मेहनत में पीछे नहीं है। 28 सीटों का माइक्रो मैनेजमेंट वे खुद कर रहे हैं। परंतु मतदाताओं को रिझाने में वे कितने कामयाब होंगे ये तो नतीजे ही तय करेंगे।

ये 19 सीटें हैं महत्वपूर्ण
उपचुनाव में भाजपा ने जिन 19 सिंधिया समर्थकों को प्रत्याशी बनाया है वह अहम है। जिनमें सबसे ज्यादा 16 सीटें ग्वालियर चंबल अंचल की हैं। ये 19 सीटें हैं ग्वालियर, डबरा (अजा), बमोरी, सुरखी, सांची (अजा), सांवेर (अजा), मुरैना, दिमनी, अंबाह (अजा), मेहगांव, गोहद (अजा), ग्वालियर (पूर्व), भांडेर (अजा), करैरा (अजा), पोहरी, अशोक नगर (अजा), मुंगावली, जौरा एवं बदनावर हैं। इन्हीं सीटों के परिणामों को सिंधिया की राजनीति की अग्निपरीक्षा भी माना जा सकता। यदि वे इस परीक्षा में सफल होते हैं, तो उनके लिए भाजपा के नए दरवाजे खुल जाएंगे। लेकिन यदि ऐसा नहीं होता है, तो उपचुनाव की हार का सारा खामियाजा सिंधिया पर थोपा जाएगा। ऐसी स्थिति में उनके साथी भी उनसे किनारा कर सकते हैं। उपचुनाव की 28 में से 19 सीटें ऐसी हैं, जो सीधे सिंधिया-घराने के प्रभाव में है। भाजपा ने भी इनका दारोमदार पूरी तरह से सिंधिया को सौंप दिया। सिंधिया की भविष्य की राजनीति के लिए भी ये चुनाव परिणाम निर्णायक होंगे। ये उपचुनाव सीधे-सीधे ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने के फैसले को सही और गलत ठहराने की परीक्षा भी है।

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