अफसरों के अभय से राठौर ने किए करोड़ों के खेल

Rathore made millions of games due to the fear of officers

जल-मल, जोन, ट्रेंचिंग ग्राउंड… जो जिम्मेदारी मिली उसी में कमा गए…
इंदौर/ विनोद शर्मा/प्रणव बजाज/बिच्छू डॉट कॉम। ट्रेंचिंग ग्राउंड के प्रोसेसिंग प्लांट पर फैली अव्यवस्थाओं को लेकर राम गुप्ता और उसके कारिंदे निगम के बड़े इंजीनियर पीएस कुशवाह और अभय राठौर को जिम्मेदार बता रहे हैं। कुशवाह ट्रेंचिंग ग्राउंड के मौजूदा प्रभारी हैं। जबकि लोकायुक्त के हाथों अपने काले साम्राज्य का खुलासा करवा चुके अभय राठौर ग्राउंड प्रभारी रह चुके हैं। इन दिनों निगम के टेक्निकल शाखा और शाला प्रकोष्ठ में अपना हुनर दिखाकर चांदी काट रहे है। छापे के बाद नगर निगम ने सजा के तौर पर अभय राठौर को ट्रेंचिंग ग्राउंड की जिम्मेदारी दी थी। राठौर ने वहां भी पैसा कमाने के रास्ते निकाले। उपयंत्री राम गुप्ता ने उनका भरपूर साथ दिया और कमाई के गुर सीखे। राठौर की कारगुजारी से स्वच्छता सर्वेक्षण में इंदौर की साख दांव पर लगते देख मुख्यालय ने उन्हें आईटी डिपार्टमेंट और शाला प्रकोष्ठ की जिम्मेदारी दे दी। यहां उन्हें अपना पुराना शागिर्द सब इंजीनियर हरीश कारपेंटर मिल गया। हरीश भी 2 साल से बिना मौके पर जाए ट्रेंचिंग ग्राउंड की कथित जिम्मेदारी संभाल रहा है। बायोमेट्रिक रिकार्ड से इसकी पुष्टि की जा सकती है। मुख्यालय में बैठे अफसर और बाबू दोनों के बड़े मददगार है। दोनों की जोड़ी शाला प्रकोष्ठ में खेल दिखा रही है। नियमों को दरकिनार कर लाखों के काम कराए जा रहे हैं। इसके लिए हरीश ने अपनी पारिवारिक फर्म खड़ी कर दी। किसी भी काम का एस्टीमेट खुद हरीश और राठौर बनाते हैं। इस पर टेंडर निकाले जाते हैं और उनकी शर्तों को इस तरह फ्रेम किया जाता है कि जिसका फायदा कारपेंटर की पारिवारिक फर्म को मिले। काम पर खर्च होने के बाद जो राशि बचती है वह दोनों में बट जाती है। वार्ड क्रमांक 10 के बालक विद्यालय की रिपेयरिंग के लिए निकाला गया टेंडर इसका बड़ा उदाहरण है। स्कूल का निर्माण कुछ साल पहले ही हुआ था। टेंडर 38 लाख का है जबकि किसी भी स्थिति में रिंग पर 10-12 लाख रुपए से ज्यादा खर्च नहीं होना है। मतलब बाकी की रकम दोनों के घर में ही जाना है । ऐसे कई काम है जिनकी जाँच जरुरी है।

पाइप, टैंकर, ट्यूबवेल घोटाले में नाम, हर बार सिर्फ विभाग बदला
– राठौर 1988 में निगम में मस्टरकर्मी बना। तब इसके मामा आरके सिंह कुशवाह अधीक्षण यंत्री थे। वर्ष 2000 में राठौर के इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के डिप्लोमा सर्टिफिकेट पर सवाल उठे।
-2000-01 में जल यंत्रालय में सब इंजीनियर था। कर्मचारियों से मिलकर खुद ही कई कामों की फाइलें बना ली और उस पर निगमायुक्त के फर्जी दस्तखत भी हो गए। परिषद ने एफआईआर का आदेश भी दिया, पर जांच अधूरी रहने से कार्रवाई नहीं हुई।
– निगम में ट्यूबवेल के नाम पर लाखों का भुगतान हुआ, जो हुए ही नहीं। इसमें भी नाम।
– 2004 तक विद्युत विभाग में रहा। फाइल संबंधी गड़बड़ी में विभाग बदला तो टैंकर प्रभारी बना।
– 2007-08 में यशवंत सागर के फूल कलारिया पंपिंग स्टेशन से 100 टन पाइप गायब होने के मामले में सस्पेंड हुआ।
– 2010-11 में यातायात सामग्री की खरीदी, उसके उपयोग, क्वालिटी और बाद में भुगतान को लेकर सामने आए सवा दो करोड़ रुपए के ट्रैफिक घोटाले में नाम। जांच अभी भी जारी
– 2015-16 : नर्मदा लाइन डालने और मेंटेनेंस करने के नाम पर राठौर ने करोड़ों रुपए के खेल किए। उसके बाद निगमायुक्त मनीष सिंह ने उन्हें हटाकर जोन की जिम्मेदारी दे दी।
– विजयनगर जोन पर रहते राठौर ने लाखों रुपए विकास कार्यों की फाइलों और केदारी के कामों से निकाले।
– स्वच्छ भारत मिशन की जिम्मेदारी तो कम्युनिटी और पब्लिक टॉयलेट (सीटीपीटी) निर्माण में खेल किया। इसी दौरान उनके घर लोकायुक्त का छापा पड़ा और कार्रवाई के दौरान राठौर के घर से मिले 20 लाख रुपए नकद मिले। पता चला कि अरसे से राठौर ने बैंक में जमा अपनी सैलरी निकाली ही नहीं है।

कई को लगाई नौकरी….
अभय कई लोगों को फर्जी तरीके से नौकरी लगवा चुका है. उसके घर ही 10 लोग काम करते है जिनकी तन्खा नगर निगम देता है. आयुक्य कार्यालय में बैठे लोगों की मदद से अभय को मनमाफिक पोस्टिंग और लूट की छुट मिलती रही।

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