श्रीमंत समर्थक हरल्लों को नहीं मिलेगी सत्ता में भागीदारी

Pro-Srimanta Harallas will not get participation in power
  • इमरती, कंसाना और दंडोतिया के सियासी भविष्य पर संकट की छाया

    भोपाल/राजीव चतुर्वेदी/बिच्छू डॉट कॉम। श्रीमंत समर्थक उन तीन मंत्रियों पर इन दिनों बड़ा राजनैतिक भविष्य का संकट नजर आ रहा है, जो उपचुनाव में जीत हासिल नहीं कर सके हैं। इसकी वजह है भाजपा संगठन द्वारा उन्हें सत्ता की भागीदारी से दूर रखने का किया गया फैसला। इसकी वजह से अब उनकी निगम मंडल में होने वाली नियुक्ति पूरी तरह से खतरे में पड़ गई है। माना जा रहा है कि मकर संक्रांति के बाद प्रदेश की सत्ता और पार्टी संगठन में बहुप्रतीक्षित फैसले होने हैं। यही वजह है कि इन फैसलों पर सभी की नजरें लगी हुई हैं। माना जा रहा है कि इन श्रीमंत समर्थक इन नेताओं को अपने इलाके में ही सक्रिय रहकर अभी से खुद को मतदाताओं में मजबूत पकड़ बनाने का मौका देगी। दरअसल उपचुनाव में हारने वाले यह तीनों ही नेता हर हाल में सत्ता में भागीदारी चाहते हैं। पहले इन तीनों ही हारने वाले मंत्रियों को निगम मंडलों में जगह मिलने की पूरी संभावना बनी हुई थी , लेकिन अब वह पूरी तरह से समाप्त हो गई है। हालांकि इनके लिए श्रीमंत खेमे से सरकार पर दबाव बनाया हुआ है। दरअसल भाजपा संगठन को उन्हें दूर रखने के पीछे की वजह है उपचुनाव में हार के बाद अगर उन्हें निगम मंडलों की कमान दी जाती है , तो न केवल पार्टी कार्यकर्ताओं में निराशा बढ़ेगी, बल्कि आमजन में गलत संदेश जाएगा।
    गौरतलब है कि श्रीमंत के साथ ही उनके समर्थक विधायक भी कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे। इन सभी श्रीमंत समर्थकों ने विधायक पद से इस्तीफा देकर उपचुनाव लड़ा था। इनमें से इमरती देवी, एंदल सिंह कंसाना और गिर्राज दंडोतिया चुनाव हार गए , जिसकी वजह से उन्हें मंत्री पद भी खोना पड़ गया है। उपचुनावी हार से अब उनका सियासी भविष्य संकट में पड़ा हुआ है।
    इनके अलावा चार और पूर्व विधायक हैं, जो राज्यसभा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा में शामिल होने के बाद उपचुनाव में खेत रहे हैं। यह विधायक भी अपना राजनैतिक पुर्नवस की इच्छा जता रहे हैं। उधर पार्टी का कहना है कि उन्हें उपचुनाव में न केवल मौका दिया गया, बल्कि संगठन ने उन्हें चुनाव जिताने के लिए हर तरह का सहयोग भी दिया है। इसके बाद भी जहां पूर्व विधायक जीत नहीं सके, उनके लिए किसी योग्य दावेदार को कैसे दरकिनार किया जा सकता है।
    भाजपा में ही दावेदारों की लंबी लाइन
    श्रीमंत समर्थकों को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने से मूल रुप से भाजपाई विधायकों को इस बार कम ही जगह मिल पाई है। श्रीमंत समर्थकों की वजह से कई प्रमुख दावेदार अब भी मंत्रिमंडल से बाहर रहने को मजबूर बने हुए हैं। ऐसे में उनकी नाराजगी दूर करने के लिए सरकार व संगठन मिल कर उनके निगम मंडलों के अलावा संगठन में पदाधिकारी बनाने की तैयारी कर रही है। अगर इन तीनों ही हारे मंत्रियों को निगम मंडलों में जगह दी जाएगी तो यहां पर भी असंतोष पैदा हो सकता है।
    मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार
    सत्ता में भागीदारी किसे देना है और किसे नहीं यह वैसे तो मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार होता है, लेकिन अप्रत्यक्ष रुप से इस तरह के मामलों में संगठन की राय का महत्वपूर्ण रोल रहता है। हालांकि पार्टी नेताओं का कहना है कि मंत्रिमंडल में विधायकों को शामिल करने का या अन्य नेताओं को निगम मंडल में समाहित करने का फैसला मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। स्वाभाविक तौर पर ये फैसला मेरिट के आधार पर होगा, जिसमें वरिष्ठता योग्यता, वैचारिक प्रतिबद्धता और उपयोगिता का मूल्यांकन होगा।
    कंसाना व इमरती ने नहीं दिया था इस्तीफा
    निगम मंडलों के दावेदारों में जो श्रीमंत समर्थकों के नाम बताए जा रहे हैं उनमें इमरती देवी और कंसाना ऐसे पूर्व मंत्री हैं जिन्होंने चुनाव हारने के बाद भी इस्तीफा नहीं दिया था ,बल्कि वे कार्यकाल पूरा होने का इंतजार करते रहे। इसकी वजह से सरकार व संगठन में असहज स्थिति बन गई थी। यही नहीं इमरती देवी अपने बयानों के अलावा अन्य कारणों से मंत्री रहते विवादों में बनी रहती थीं। उन्हें सत्ता में भागीदारी से दूर रखने की एक यह भी वजह बताई जा रही है। उनके इन मामलों की वजह से ही संगठन भी उनके पक्ष में नही हैं। इसी वजह से संगठन ने उनको सत्ता से दूर रखकर उन्हें पार्टी की नीति व रीति का ज्ञान कराना चाहती है। संगठन चाहता है कि पहले ऐसे नेता इस तरह के मामलों में पारंगत होने के बाद ही बाद सत्ता में भागीदार बनें।

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