पुलिस से बचे तो प्रशासन व ईडी के राडार पर आया एक हजार करोड़ का घोटालेबाज

One thousand crore scamster came on the radar of the administration and ED if he escaped from the police

भोपाल/राकेश व्यास/बिच्छू डॉट कॉम। प्रदेश का बहुचर्चित एक हजार करोड़ का घोटालेबाज भले ही सायबर और सीआईडी पुलिस से मिली भगत कर कार्रवाही से बच गया है, लेकिन अब वह जिला प्रशासन और इन्फोर्समेंट डेवलपमेंट (ईडी) के राडार पर आ चुका है। यह पूरा मामला इंदौर के अमित सोनी से जुड़ा हुआ है। उसके द्वारा करीब एक हजार करोड़ के शेयर मार्केट (अवैध डिब्बा कारोबार) में घोटाला किया गया है। हाल ही में ईडी द्वारा उसकी कई करोड़ की संपत्ति सीज कर दी गई है, जबकि जिला प्रशासन ने उसकी साझेदारी में संचालित एक अस्पताल पर छापा डाला जा चुका है। दरअसल अमित सोनी ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर इंदौर निवासी विशाल गर्ग, लोकेश शर्मा सहित उज्जैन, रतलाम के कई शेयर कारोबारियों के साथ शेयर के नाम पर यह ठगी करने का आरोप है।
अब यह मामला  हाईकोर्ट में है। इस मामले में जब शुरूआती जांच सायबर सेल और फिर सीआईडी द्वारा की गई तो, मिलीभगत कर बचने का रास्ता निकाल लिया गया था, लेकिन पीड़ित पक्ष के कई कारोबारी इससे पहले ही हाईकोर्ट और लोकायुक्त संगठन की श्रेणी में पहुंच गए, जिसकी वजह से एक बार फिर यह मामला गर्मा गया है। इस बीच ईडी ने अमित सोनी के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत कार्यवाही करते हुए इंदौर तथा अन्य इलाकों में स्थित उसकी करोड़ों की प्रॉपर्टी को सीज कर दिया है। बताया जाता है कि आॅनलाइन ठगी के इस मामले के तार दुबई तथा अन्य देशों से जुड़े होने और हवाला के माध्यम से काला धन यहां से वहां भेजने की वजह से ईडी ने स्वत: ही इस मामले में संज्ञान लिया है।
सायबर सेल से सीआईडी को भेज दिया था मामला
इस करोड़ों की आॅनलाइन ठगी की शिकायत स्टेट सायबर सेल में होने के बाद वहां अफसरों में विवाद की स्थिति बन जाने से इसे जांच के लिए सीआईडी को सौंप दिया गया था। इस मामले में पीड़ित  कारोबारियों का कहना है कि अगर इसकी जांच सायबर सेल करती तो हवाला का बड़ा मामला सामने आ सकता था। उनका कहना है कि सायबर सेल में इस तरह के फ्रॉड के इन्वेस्टिगेशन की हाईटैक तकनीक और उपकरण है, जबकि सीआईडी में इस तरह की कोई सुविधा नहीं है। यह मामला सीधे सायबर क्राइम का है, जिसकी जांच सीआईडी के बजाय सायबर सेल द्वारा ही कराई जानी थी। खास बात यह है कि सीआईडी में पदस्थ आनंद मोहन दीवान को इसकी जांच सौंपी गई है, जबकि अब तक मुख्यालय से अभी इसके आदेश नहीं दिए गए हैं। बाद में इसकी जांच विनोद शर्मा को दी गई, लेकिन इस जांच का जो प्रतिवेदन दिया गया है वह संयुक्त रुप से दोनों अधिकारियों की जांच का है। इस वजह से सायबर सेल के साथ ही सीआईडी की जांच भी संदेहास्पद हो गई है। इसकी वजह से अब इस मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग उठने लगी है।  

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