तीन दशक बाद भी अधूरी है विभागीय जांच

Departmental inquiry is incomplete even after three decades

अब मंत्रालय से गायब हुई फाइल

भोपाल/अनिरुद्ध सोनोने/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र में प्रशासनिक लापरवाही किस हद तक है , इससे ही समझा जा सकता है कि एक अफसर की विभागीय जांच छह माह में पूरी करने के नियम के बाद भी तीन दशक बाद भी पूरी नहीं हो सकी है। जांच पूरी होने का इंतजार करते -करते अफसर की मौत तक हो चुकी है। अब परिजनों ने जब इस मामले को आला अफसरों को बताया तो जांच संबंधित फाइल ही नहीं मिल रही है। इसकी वजह है अब मृत अफसर की 85 वर्षीय पत्नी लंबित भुगतान के लिए मंत्रालय के चक्कर काटने पर मजबूर बनी हुई है।
दरअसल गजेंद्रनाथ छोकर वर्ष 191 में लोक निर्माण विभाग के अधीक्षण यंत्री के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। इसके ठीक पहले नवंबर, 190 में उन्हें अनियमितता के मामले में आरोप पत्र जारी किए गए थे। इस वजह से सेवानिवृत्त होने पर मिलने वाले उनके तमाम भुगतान रोक दिए गए थे। उन्हें सिर्फ गुजर-बसर के लिए नॉमिनल पेंशन दी जा रही थी। इस बीच अधूरी जांच के दौरान उनकी बीते साल अगस्त में मौत हो गई। नियमानुसार किसी भी अधिकारी-कर्मचारी की मृत्यु होने पर उसके खिलाफ चल रहीं सभी जांचें बंद कर लंबित सभी भुगतान कर दिए जाते हैं। गत 23 सितंबर को छोकर की पत्नी ने परिजनों के साथ भुगतान को लेकर मंत्रालय में विभागीय उप सचिव नियाज अहमद खान से भेंट की थी। जब खान ने अपने स्टाफ से छोकर की जांच संबंधी फाइल तलब की , तो पता चला कि उनकी विभागीय जांच संबंधी कोई फाइल विभाग में है ही नहीं। इसके बाद इसका रिकार्ड प्रमुख अभियंता कार्यालय से मांगा गया तो वहां से भी कह दिया गया कि छोकर की विभागीय जांच से संबंधित कोई रिकॉर्ड उनके पास भी नहीं है। अब रिकार्ड न मिलने से उनका भुगतान अटका हुआ है। छोकर का विभागीय जांच का पूरा रिकॉर्ड गायब होने से विभाग और प्रमुख अभियंता कार्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इस दौरान यह भी पता चला है कि प्रमुख अभियंता कार्यालय की ओर से बीते सालों में छोड़कर की विभागीय जांच के संबंध में 15 पत्र लोक निर्माण विभाग को भेजे गए थे , लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस अवधि में विभाग में पदस्थ उप सचिवों ने भी इस मामले में कोई रुचि नहीं ली। इसमें भी खास बात यह है कि विभाग में बाबू मोहनलाल वर्मा 14 साल तक जिस सीट पर लगातार पदस्थ रहे , पत्रों का जवाब नहीं देने का उन्हें जिम्मेदार माना जा रहा है। अब जाकर उनकी सीट बदली गई है।

कई बार दे चुके हैं दस्तक
गजेंद्रनाथ छोकर की तीन बेटियां हैं। उनके दामाद राजीव डंग का कहना है कि उनके ससुर के निधन के बाद सालभर में परिजन कई बार मंत्रालय में लंबित भुगतान को लेकर संपर्क कर चुके हैं, पर अब तक भुगतान नहीं हुआ है। अब विभागीय जांच का रिकॉर्ड नहीं होना बताया जा रहा है। हालांकि अफसरों ने इसके जल्द निराकरण का आश्वासन दिया है।

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