कांग्रेस को आरक्षित सीटों पर अधिक भरोसा

Congress has more confidence in reserved seats


भोपाल/ राकेश व्यास/बिच्छू डॉट कॉम। प्रदेश की जिन 27 सीटों पर उपचुनाव होना है , उनमें से 11 सीटें आरक्षित श्रेणी की हैं। यह वे सीटें हैं जिसमें अधिकांश बीते आम चुनाव में कांग्रेस के खाते में गई थीं। यही वजह है कि कांग्रेस को उपचुनाव में भी इन्हीं सीटों पर सर्वाधिक भरोसा है। यह वे सीटें हैं जो जिस दल के खते में जाएंगी उसकी सरकार में स्थिति मजबूत होगी। यही वजह है कि कांग्रेस के साथ ही भाजपा की नजर भी इन सीटों पर विशेष रूप से लगी हुई है। इन आरक्षित 11 सीटों मे से नौ अनुसूचित जाति और दो अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। भाजपा इन सीटों पर जीत दर्ज कर अपने बहुमत के आंकड़े को बढ़ाना चाहती है, तो कांग्रेस भी अपने को मजबूत करने के लिए इन्हीं सीटों पर पूरा जोर लगा रही है। दरअसल कांग्रेस को पता है कि अगर वह इन सीटों पर फिर से जीत हासिल कर लेती है, तो उसके लिए कुछ हद तक सत्ता में वापसी की राह आसान हो सकती है। इन आरक्षित वर्ग की सीटों में मुरैना जिले की अंबाह, भिंड की गोहद, ग्वालियर जिले की डबरा, अशोकनगर जिले की अशोकनगर, दतिया जिले की भांडेर, शिवपुरी जिले की करैरा, इंदौर जिले की सांवेर, आगर मालवा जिले की आगर, रायसेन जिले की सांची अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित हैं तो अनूपपुर और बुरहानपुर जिले की नेपानगर अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इनमें से बीते चुनाव में भाजपा को सिर्फ आगर में ही सफलता मिल सकी थी। आगर में एक बार फिर कांग्रेस ने विपिन बानखेड़े को तैदान में उतारा है। इन सीटों में से अधिकांश पर कांग्रेस ने बेहतर प्रत्याशी उतारने का प्रयास किया है, जबकि भाजपा की तरफ से आगर को छोड़कर कांग्रेस के बागियों को उतारा जाना तय है।

यह है कांग्रेस की आशा की वजह
इन आरक्षित सीटों पर कांग्रेस की आशा की वजह है बीते चुनाव में मिले मत और जीत का भारी भरकम अंतर। उसके लगभग सभी प्रत्याशियों ने भाजपा को मतों के हिसाब से काफी पीछे छोड़ दिया था। अंबाह सीट पर बीते चुनाव में कांग्रेस के कमलेश जाटव ने निर्दलीय नेहा किन्नर को सात हजार से अधिक मतों से हराया था । यहां पर भाजपा को तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा था। लगभग इसी तरह गोहद सीट पर रणवीर जाटव ने शिव सरकार के मंत्री लाल सिंह आर्य को 23 हजार 989 मतों से हराया था। सबसे अधिक मतों से कांग्रेस की इमरती देवी ने डबरा सीट पर जीत दर्ज की थी। उन्होंने भाजपा प्रत्याशी कप्तान सिंह को 57 हजार 446 मतों से हराया था। करैरा में भी कांग्रेस प्रत्याशी जसमंत जाटव ने 14 हजार 824 मतों से जीत हासिल की थी। इसी तरह से अनूपपुर में कांग्रेस प्रत्याशी रहे बिसाहूलाल सिंह को 11 हजार से अधिक मतों से जीत मिली थी। इनमें से सिर्फ आगर सीट पर उसकी हार का अंतर महज 2490 मतों का रहा था। कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि इन सीटों पर कांग्रेस का अपना वोट बैंक है जो प्रत्याशियों की जगह पार्टी को मिलता है।

संगठन पर है भाजपा को भरोसा
उधर भाजपा को अपने मजबूत संगठन पर भरोसा है। भाजपाई रणनीतिकारों का मानना है कि श्रीमंत के भाजपा में आने से कांग्रेस कमजोर हुई है ,जबकि भाजपा मजबूत हुई है। उसका मानना है कि बूथस्तर तक कार्यकर्ताओं की मजबूत टीम होने की वजह से उसे जीत मिलना तय है। यही नहीं भाजपा मान रही है कि बीते चुनाव में कांग्रेस की सीटें श्रीमंत के फेक्टर के चलते ही आयी थीं। इस बार श्रीमंत भाजपा के साथ हैं, लिहाजा अब भाजपा को फायदा होना तय है। हालांकि भाजपा को इन सीटों पर अपने हारे हुए नेताओं की नाराजगी पार्टी के लिए परेशानी बनी हुई है। संगठन इन नेताओं को मनाने का प्रयास कर रही है, क्योंकि पार्टी जानती है कि हारे हुए नेता चुनाव में सक्रिय नहीं हुए तो पार्टी की जीत आसान नहीं होगी।

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