मंडी की 350 करोड़ की अतिशय राशि, बढ़ सकता है टकराव

भोपाल (राधेश्याम दांगी/बिच्छू डॉट कॉम)। मंडी बोर्ड अधिनियम संशोधन लागू होने से बेजा खफा मध्यप्रदेश की मंडियों और मंडी बोर्ड में कार्यरत अधिकारी-कर्मचारी मंडी बोर्ड की अतिशय राशि में से 350 करोड़ रुपए उनकी पेंशन के लिए आरक्षित किए जाने को लेकर शिवराज सरकार से टकराव के मूड में आ गए हैं। गांव-गांव निजी मंडियां खोले जाने के फैसले से आहत मंडियों में किसानों की उपज खरीदने वाले प्रदेश के एक लाख लाइसेंस धारी व्यापारियों ने सरकार से दो-दो हाथ करने के लिए आमदा हैं। दरअसल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तीन महीने पहले मध्यप्रदेश की सत्ता में काबिज होते ही मंडी बोर्ड अधिनियम में संशोधन (मॉडल एक्ट संबंधी अध्यादेश) लागू करने का ऐलान किया है। मंडी बोर्ड के अधिकारियों-कर्मचारियों में इस फैसले के बाद से सरकार के खिलाफ बेजा आक्रोश है। मंडियों के कर्मचारियों-अधिकारियों का कहना है कि राज्य सरकार के इस फैसले से किसानों को तो फायदा होगा, लेकिन मंडी बोर्ड और मंडियों में कार्यरत हजारों कर्मचारियों-अधिकारियों के साथ प्रदेश के एक लाख से ज्यादा लाइसेंसधारी व्यापारियों का भविष्य खतरे में आ जाएगा। इसलिए इन मंडी कर्मचारियों-अधिकारियों ने मंडी बोर्ड को आय के रूप में प्राप्त होने वाली हजारों करोड़ों रुपए की अतिशय राशि में से 350 करोड़ रुपए पेंशन के लिए आरक्षित करने की डिमांड शुरू कर दी है। या फिर इन कर्मचारियों-अधिकारियों का कहना है कि उन्हें प्रस्तावित विपणन संचालनालय में शामिल कर राज्य शासन का कर्मचारी घोषित किया जाना चाहिए।
जानबूझकर रोका प्रस्ताव
मंडी बोर्ड के सूत्रों के अनुसार मंडी बोर्ड और मंडियों में कार्यरत कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए अभी पेंशन के लिए कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए ये कर्मचारी-अधिकारी सेवानिवृत्ति पर क्षतिपूर्ति के रूप में पेंशन के निर्धारण की डिमांड कर रहे हैं। बताते हैं कि इसके लिए प्रस्ताव भी तैयार हो गया है, लेकिन मंडी बोर्ड के एमडी संदीप यादव प्रस्ताव की नस्तियां राज्य सरकार को नहीं भेज रहे हैं।

मंडियों में हो सकता है कामकाज ठप
बताते हैं कि राज्य सरकार के मंडी बोर्ड अधिनियम संशोधन के खिलाफ आंतरिक तौर पर मंडियों और मंडी बोर्ड के अधिकारियों-कर्मचारियों में इतना आक्रोश खदबदा रहा है कि वे कभी भी कामकाज बंद कर मंडियों को ठप कर सकते हैं।

मंडी व्यापारी, हम्माल-तुलावटी भी नाराज
इधर खबर यह भी है कि मंडी बोर्ड अधिनियम संशोधन लागू होने का सीधा असर प्रदेश के एक लाख लाइसेंस धारी उन व्यापारियों पर भी पड़ने वाला है जो रोजाना मंडियों में किसानों से उनकी उपज की खरीददारी करते हैं। इन व्यापारियों का कहना है इस नए अधिनियम के तहत राज्य सरकार ने गांव-गांव में निजी मंडियों को खोलने का प्रावधान किया है। राज्य सरकार के इस फैसले से न सिर्फ राज्य सरकार की कृषि मंडियों का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा, बल्कि एक लाइसेंस धारी व्यापारियों, लाखों हम्मालों और तुलावटियों सहित प्रदेश के करीब एक करोड़ लोगों का रोजगार संकट आ जाएगा।

सरकार भी कर रही अनसुनी
मंडियों और मंडी बोर्ड में कार्यरत कर्मचारियों और अधिकारियों का आरोप है कि वे अपनी डिमांड को लेकर कृषि मंत्री, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और मंडी बोर्ड प्रबंध संचालक के समक्ष गुहार लगा चुके हैं। लेकिन राज्य शासन का रवैया उपेक्षा पूर्ण बना हुआ है। सरकार को किसानों की चिंता है, लेकिन जो कर्मचारी-अधिकारी किसानों को सेवा-सुविधा उपलब्ध करा रहे हैं, उनकी उपेक्षा कर रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि सरकार नया मंडी बोर्ड अधिनियम संशोधन लागू कर गांव-गांव निजी मंडियां खोलकर निजी कंपनियों को बढ़ावा देना चाहती है। जो कि न किसानों के हित में है और न राज्य सरकार की मंडियों में कार्यरत अधिकारियों-कर्मचारियों के हित हैं।

विधानसभा घेरेंगे मंडी कर्मचारी
राज्य सरकार के मंडी बोर्ड अधिनियम संशोधन के फैसले के खिलाफ अब प्रदेश की मंडियों और मंडी बोर्ड के नौ हजार से ज्यादा कर्मचारियों और अधिकारियों ने संयुक्त संघ मोर्चा के बैनर तले 16 जुलाई को प्रदेशभर में आंदोलन का ऐलान किया है। मोर्चा के संयोजक बीबी फौजदार ने कहा कि मंडियों के कर्मचारी-अधिकारी इस दौरान जिलों में रैलियां निकालेंगे और कलेक्टरों को ज्ञापन देकर अपना आक्रोशित जताएंगे। इसके बाद प्रदेशभर के मंडी कर्मचारी-अधिकारी भोपाल में एकत्र होकर 21 जुलाई को विधानसभा पर प्रदर्शन करेंगे।

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