श्रीमंत ने प्रचार से ब्रेक क्यों लिया

Why did Srimanth take a break from campaigning

प्रणव बजाज

ये सबको पता है कि प्रदेश में उपचुनावों की बजह श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया बने हैं। उन्होंने ही अपने समर्थक, मंत्री और विधायकों के साथ भाजपा ज्वाईन कर ली जिससे कांग्रेस की कमलनाथ सरकार अल्पमत में आई और गिर गई। अब उपचुनावों श्रीमंत समर्थक ही भाजपा की ओर से सबसे ज्यादा 19 सीटों पर मैदान में हैं। ऐसे में चुनाव प्रचार के ऐनवक्त पर सिंधिया के ब्रेक लिए जाने से सिर्फ राजनीतिक गलियारों में ही नहीं बल्कि मीडिया जगत में भी यह चर्चा का विषय है। सिंधिया अचानक गायब हो गए। चुनाव प्रचार की कमान पूरी तरह से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने संभाल रखी है। हालांकि सिंधिया भाजपा में आने के बाद से ही काफी सक्रिय रहे हैं। चुनाव प्रचार की शुरुआत में वे ग्वालियर-चंबल अंचल की लगभग आधा दर्जन सीटों पर रैलियां, सभाएं और बैठकें कर कार्यकर्ताओं में जोश भर चुके हैं। वहीं सूत्रों की खबर है कि सिंधिया ने संघ की सलाह पर चुनाव प्रचार की मुख्य धारा से ब्रेक लिया है। बहरहाल चुनावों के लिए अंतिम पखवाड़े का प्रचार चल रहा है। ऐसे में मतदान के पहले श्रीमंत किस रूप में क्षेत्र में आएंगे देखना बाकी है।

चुनाव में जीत दिलाता है जनता का विश्वास न कि पैसा
देश सरकार के मंत्री चुनाव प्रबंध समिति के संयोजक भूपेंद्र सिंह का कहना है कि चुनाव पैसे से नहीं बल्कि जनता के विश्वास से जीते जाते हैं। उन्होंने कहा कि यदि पैसे से चुनाव में जीत हो जाती तो देश के बड़े उद्योगपति आज सांसद और विधायक बने होते। बता दें, कि प्रदेश में 28 विधानसभा सीटों पर होने जा रहे उपचुनावों में प्रचार के दौरान राजनीतिक दलों और नेताओं में पैसा, गद्दार, बड़ा, छोटा, नंगा-भूखा जैसे शब्दों का प्रचलन चरम पर है।

महिलाओं को टिकट देने में दलों ने की कंजूसी
प्रदेश के 28 सीटों पर होने जा रहे उपचुनाव में महिलाओं को बराबरी का हक देने का दावा करने वाली राजनीतिक पार्टियों ने 10 प्रतिशत महिलाओं को भी टिकट नहीं दिए हैं। केवल कांग्रेस और भाजपा ने 3-3 सीटों पर महिलाओं को मैदान में उतारा है। वहीं बसपा ने एक भी महिला को टिकट नहीं दिया है। जबकि 2018 के चुनाव में इन दोनों ही बड़े दलों ने 10 फ़ीसदी टिकट महिलाओं को दिए थे। इनमें से 8 प्रतिशत महिलाएं चुनाव जीतकर सदन में आई थी। बता दें, कि सभी राजनीतिक पार्टियां पिछले कई वर्षों से लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 30 फीसदी आरक्षण दिए जाने की मांग करती रही है। वहीं जब चुनाव आते हैं तो पार्टियां महिलाओं को टिकट देने में कंजूसी दिखाती हैं।

एमपीपीएससी भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी पकड़ी
मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा की गई सहायक प्राध्यापक भर्ती प्रक्रिया 2017 में बड़ी गड़बड़ी सामने आई है। दरअसल सूची में आरक्षण की गणना में गड़बड़ी हुई है। शासन ने कोर्ट से आरक्षण का फार्मूला सुधारकर दिसंबर तक नई प्रावीण्य ने सूची जारी करने का समय मांगा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब प्रावीण्य सूची ही गलत है तो उसके आधार पर चयनित उम्मीदवार पद पर अब कैसे रह सकते हैं। बता दें, कि शिवराज सरकार के दौर में जारी प्रावीण्य सूची के आधार पर ही नियुक्ति आदेश जारी हुए थे। उसके बाद निःशक्त उम्मीदवारों ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी थी कि आरक्षण की गणना ही गलत हुई है। इस पर मई में उच्च न्यायालय ने निर्णय सुना दिया कि आरक्षण की गणना में गलती हुई है। तब शासन ने हलफनामा दे दिया कि दिसंबर तक न्यायालय के निर्णय अनुसार नई प्रावीण्य सूची बनाकर नियुक्ति दी जाएगी। उल्लेखनीय है कि शासन ढाई हजार से ज्यादा सहायक प्राध्यापकों को इस प्रक्रिया से नियुक्त कर चुका है। यदि निःशक्त उम्मीदवारों के 6 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाता है तो करीब 34 नए उम्मीदवार चयन सूची में जगह पाएंगे। इससे करीब 200 अन्य उम्मीदवारों पर असर पड़ेगा।

Related Articles