अब बजेगा पांच राज्यों के चुनावों का बिगुल

नगीन बारकिया

बिहार विधानसभा के चुनावों से निपटने के बाद अब सभी की निगाहें 2021 में होने वाले विधानसभा चुनावों की ओर केंद्रित हो गई हैं। राजनीतिक दलों ने अपना टारगेट तय कर लिया है। हालााकि इन चुनावों में पांच राज्य शामिल होंगे लेकिन ये सभी क्षेत्रीय दलो की दृष्टि से ज्यादा महत्वपूर्ण रहेगे। ये राज्य हैं बंगाल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और केरल। इनमें राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस की दृष्टि से असम और पुडुचेरी में उनकी प्रतिष्ठा दाव पर रहेगी। शेष में बंगाल में ममता और तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक को अपनी इज्जत बचाना है। केरल में वाममोर्चा को अपनी एकमात्र सरकार बचाना है। हालाकि वर्तमान राजनीतिक हालातों को देखते हुए इन सभी राज्यों में मुकाबले काफी कड़े होने की संभावनाएं नजर आ रही हैं। बंगाल में भाजपा ने ममता बेनर्जी के खिलाफ तगड़ी तैयारी कर रखी है तो तमिलनाडु में दोनों द्रमुक दलों में ताकत की परीक्षा फिर से होना है और ऐसा लगता है वहां धुरी कोई नया नेता ही बनेगा। लगता है निकट भविष्य में फिर से चुनावी हलचल शुरू हो सकती है। इनके अलावा मप्र में हुए उपचुनावों के बाद प्रदेश में स्थानीय निकायों के चुनाव की रणभेरी भी किसी भी दिन बज सकती है। उपचुनावों ने काफी कुछ कहानी तो कह दी है लेकिन इन परिणामों के आधार पर कोई अनुमान लगाना काफी जल्दबाजी होगी।

कांग्रेस में नट बोल्ट कसने की जरूरतः सुबोधकांत
कांग्रेस में नेताओं का आपस में वार- पलटवार का सिलसिला तेज हो गया है। संगठन में कसावट लाने के लिए हर छोटा बड़ा नेता अपने तरीके से कार्य करने की सलाह देने में लगा है। अभी तक कपिल सिब्बल ने जिस तरह कांग्रेस आलाकमान पर तंज कसा था और कहा था कि कांग्रेस नेतृत्व ने पार्टी की हार को ही अपनी नीयती मान लिया है। इस पर पार्टी में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी उसके बाद अब एक और पूर्व केंद्रीय मंत्री तथा झारखंड कांग्रेस के कद्दावर नेता सुबोधकांत सहाय ने पार्टी संगठन पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ट्रांजिशन पीरियड से गुजर रही है। नट-बोल्ट टाइट करने की जरूरत है। संगठन का मामला ढीला चल रहा है। इसके लिए संगठन की ओवरआयलिंग की आवश्यकता है। पार्टी में वैचारिक भिन्नता हो सकती है, लेकिन कोई दुश्मन नहीं है। सुबोधकांत ने कहा कि सत्ता संघर्ष कैसे साथ चले, इसे कांग्रेस को सीखना होगा। सिर्फ कागजों पर संघर्ष से काम नहीं बनेगा और न ही चुनाव जीत पाएंगे।

क्या बंगाल में ओवैसी ममता के साथ जोड़ी बनाएंगे?
बिहार विधानसभा चुनाव में पांच सीटें जीतने से उत्साहित एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने अब पश्चिम बंगाल में अपने पैर पसारने की तैयारी शुरू कर दी है। उन्होंने मौका देखकर सीएम ममता बेनर्जी के सामने भाजपा को हराने का प्रस्ताव रखा है। उन्होंने कहा है कि वे बंगाल में बीजेपी को पराजित करने में उनकी मदद कर सकते हैं। बिहार में अच्छी जीत के बाद ओवैसी का आत्मविश्वास काफी बढ़ गया है और अब उनकी नजर बंगाल पर है। एआईएमआईएम की नजर अल्पसंख्यक आबादी वाले मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तरी दिनाजपुर पर है। इसके अलावा भी वे उन सीटों पर नजर घुमा रहे हैं जिन पर अल्पसंख्यक बहुलता में हैं। ओवैसी की इन गतिविधियों पर भाजपा भी बारीक नजर रखे हुए है तथा उसके नेताओं ने भी इस दृष्टिकोण से विचार विमर्श करना शुरू कर दिया है। भाजपा सूत्रों का कहना है कि उन्हें इस बात का अंदाजा था कि ओवैसी बंगाल में हाथ पैर अवश्य मारेंगे।

महज दो घंटे के मंत्री रहे मेवालाल
बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले। यह पंक्तियां हाल ही में बिहार में शिक्षा मंत्री पद का कार्यभार संभालने वाले मेवालाल चौधरी पर एकदम फिट बैठती है। उनका किस्सा भी बड़ा ही रोचक और दर्दीला कहा जा सकता है। मेवालाल को मात्र दो घंटे बाद ही अपनी कुर्सी से हाथ धोना पड़ा। भ्रष्टाचार के आरोपों पर घिरे जेडीयू विधायक मेवालाल चौधरी नीतीश की कैबिनेट में सबसे अमीर मंत्री थे। सूत्रों के मुताबिक खुद नीतीश कुमार ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए कहा। गुरुवार को उन्होंने दोपहर 12:30 पर शिक्षा मंत्री का पद संभाला और फिर दो बजे तक उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। तब तक तो मेवालाल चौधरी के घर पर ‘मंत्री’ की नेमप्लेट भी नहीं लगी थी और शुभचिंतकों के लाए हुए लड्डू और गुलदस्ते अपनी मुस्कुराहट भी मंद नहीं कर पाए थे। फूल मुरझाए भी नहीं थे और उनकी महक भी नहीं गई थी लेकिन उससे पहले ही उनकी मंत्री की कुर्सी चली गई। अब इस बात को लेकर चर्चा गर्म है कि जब मुख्यमंत्री को मेवालाल का इतिहास भूगोल पता था तो फिर मेवालाल की और सरकार की इस तरह फजीहत कराने की क्या जरूरत थी।

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