विवादों मेें रहने के बावजूद स्वामी अग्निवेश ने की प्रगतिशील समाज की कल्पना

नई दिल्ली, बिच्छू डॉट कॉम । स्वामी अग्निवेश का विगत दिवस निधन हो गया। अब वो हमारे बीच नहीं रहे। उनके जीवन को देखें तो किसी सीधे-सपाट निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल होगा। वे ऐसी शख्सियत थे जो जमीन से जुड़कर बंधुआ मुक्ति की अलख जगाते थे तो वहीं, बिग बॉस का हिस्सा बनने से भी गुरेज नहीं करते थे। उन्होंने भगवा चोला तब पहना, और आजीवन पहनते रहे। स्वामी अग्निवेश बीसवीं सदी के भारत में आखिर के उन दो-ढ़ाई दशकों में उभरे और कई बार सुर्खियों में आए जो देश में सामाजिक-राजनीतिक मोर्चे पर भारी उथल-पुथल से भरे दशक थे।
कई बार विवादों से भले ही नाता जुड़ा पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि स्वामी अग्निवेश ने एक प्रगतिशील समाज की कल्पना की और उसे साकार करने में हमेशा जुटे रहे। दक्षिण भारत के एक सवर्ण परिवार में जन्म लेने वाले वेपा श्याम राव ने बाद के अपने जीवन में स्वामी अग्निवेश के रूप में हिंदी पट्टी को अपनी कर्मभूमि बनाते हुए दलितों, वंचितों, शोषितों की आवाज बनने को अपना लक्ष्य बनाया। इस शख्स की पहचान न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर तक सीमित रही बल्कि अंतरराष्ट्रीय फोरमों पर भी वे खासे लोकप्रिय रहे। खास कर बंधुआ मजदूरों की रिहाई के लिए किए गए उनके प्रयासों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरपूर मान्यता मिली।
वे जातिवाद के खिलाफ मुखर रहे:
आर्य समाजी अग्निवेश हमेशा ही रूढि़वादिता और जातिवाद के खिलाफ मुखर रहे। बंधुआ मुक्ति मोर्चा का गठन कर बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराने के उनके कई अभियानों के किस्से वर्तमान समय में भी बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाकों में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं को उत्साहित करते हैं। उन्हें करीब से जानने वालों में कई ऐसा भी मानते हैं कि वे समर्पित जरूर थे लेकिन उनमें प्रचार की भी भूख थी। यही वजह थी कि वे हर उस मंच पर पहुंचने की कोशिश करते थे जहां कैमरा हो! चाहे वह अन्ना हजारे का आंदोलन रहा हो या फिर बिग बॉस का शो।
हिन्दूवादी होने का आभास देते थे: अपने भगवा चोले में वे हिन्दूवादी होने का आभास देते थे तो वहीं जातिप्रथा के खिलाफ और दलितों के मंदिर प्रवेश के हक में उनके तर्क उनकी बिल्कुल विपरीत छवि पेश करते थे। बीते साल झारखंड में उनपर हमला हुआ तो आरोप कुछ हिन्दूवादी संगठनों पर लगा क्योंकि स्वामी अग्निवेश एक खास किस्म की राजनीतिक शैली के विकसित होने के मुखर आलोचक थे। वे नक्सलवादियों से सरकार के सुलह-समझौते में मध्यस्थता निभाने में भूमिका निभाते थे, क्योंकि सरकार को लगता था कि वे माओवादियों के करीबी हैं। वहीं, माओवादियों के कई शुभचिंतकों का मानना रहा कि वे सरकार के हित में ज्यादा और नक्सलियों के पक्ष में कम रहे। उनके चले जाने के साथ ही इन बातों का अब कोई मतलब नहीं रहा लेकिन इतना निर्विवाद है कि सामाजिक मुद्दों पर इतनी बेबाकी से अपनी राय रखनेवाला उनके जैसे किसी शख्स की कमी हमेशा खलेगी।
स्वामी अग्निवेश का जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ था:
अग्निवेश एक ऐसा व्यक्तित्व थे जिनका जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ, छत्तीसगढ़ में जो बड़े हुए और जिन्होंने आर्य सभा नाम से हरियाणा में अपनी पार्टी बनाई। चुनाव लड़कर जीते और मंत्री भी बने लेकिन फिर राजनीति से तौबा कर समाज सेवा में जुट गए। इस सबके बावजूद बदलाव की राजनीति की उनकी पैरोकारी और प्रयासों में कमी नहीं आई। ऐसी विविधताओं से भरा था अग्निवेश का जीवन।

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