राज्य योजना आयोग 'शो पीस' बना
महेश बागी / बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)। प्रदेशवासियों को स्वर्णिम मध्यप्रदेश का ख्वाब दिखाने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के राज में प्रदेश का वास्तविक रूप में कितना विकास किया जा रहा है, इसका सनसनीखेज खुलासा हुआ है। हालात की बदतरी का आलम यह है कि जिस राज्य योजना आयोग पर प्रदेश के चहुंमुखी विकास का महत्वपूर्ण दायित्व है, उसकी दो साल से बैठक तक नहीं हुई है। खास बात यह भी है कि योजना आयोग के चेयरमैन का दायित्व मुख्यमंत्री के पास है। उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में आयोग का सिर्फ एक बार दौरा भर किया है। राज्य योजना आयोग स्टाफ की कमी से तो जूझ ही रहा है, साथ ही यहां पांच साल बीत जाने के बाद भी सूचना का अधिकार अधिनियम लागू नहीं हो सका है। इससे समझा जा सकता है कि मध्यप्रदेश का कैसा विकास हो रहा है।
आयोग के उद्देश्य
स्वतंत्रता प्राप्ति के मात्र तीन साल बाद ही केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन कर दिया था। मप्र में राज्य सूचना आयोग वर्ष 1972 में अस्तित्व में आया, जो राष्ट्रीय योजना आयोग के अधीन काम करता है। इसमें राज्य के मुख्यमंत्री पदेन चेयरमैन होते हैं। इसके अलावा एक उपाध्यक्ष तथा ग्यारह अंशकालिक सदस्य होते हैं। फिलहाल चार सदस्य ही मनोनीत हैं। आयोग का यह मुख्य उद्देश्य है कि वह जिला योजना समितियों के माध्यम से वहां के संसाधनों को मद्देनजर रखते हुए योजना बनाए और पूरे राज्य की योजनाओं को तैयार कर केंद्र को स्वीकृति के लिए भेजे, ताकि केंद्रीय अनुदान प्राप्त कर विकास कार्यों को अंजाम दिया जा सके। जिलों के विकास की तरक्की में क्या बाधाएं आ रही हैं, उनका अनुसंधान कर उन असमानताओं को दूर करने का प्रयास करे। सरकारी संसाधनों और योजनाओं का क्रियान्वयन तथा धनराशि के व्यय की निगरानी का दायित्व भी राज्य योजना आयोग का है। दीर्घ अवधि की योजनाओं के क्रियान्वयन में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के साथ खाद्यान्न, स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास आदि में से किस काम को प्राथमिकता के आधार पर तय करने का दायित्व भी है। इसके अलावा समय-समय पर प्रगति रिपोर्ट और सुझाव दे। इस प्रकार सभी विभागों की पंचवर्षीय योजनाएं बनाने, उन्हें क्रियान्वित करना तथा उनकी निगरानी करना आयोग का काम है।
स्टाफ का टोटा
राज्य योजना आयोग में अंशकालिक सदस्यों की कमी के साथ ही कर्मचारियों का भी टोटा है। हालांकि विभाग के लिए एक प्रमुख सचिव स्तर का अधिकारी भी है, किंतु बीते दो साल में इसकी एक बैठक तक नहीं हुई, योजनाएं बनाना और क्रियान्वयन कराना तो बहुत दूर की बात है। आयोग कार्यालय में श्रीमती किरण मिश्र अंडर सेक्रेटरी हैं, जबकि श्री त्यागी ऑफिस इंचार्ज हैं। इनसे निचले स्तर के कर्मचारियों का यहां भारी टोटा बताया जाता है।
कहां है सूचना का अधिकार
देश में वर्ष 2005 से सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हो गया है तथा प्रदेश के शासकीय कार्यालयों में भी इसे लागू करने के लिए लोक सूचना अधिकारी तथा अपीलीय अधिकारी नियुक्त किए गए हैं, किंतु राज्य योजना आयोग इस अधिनियम से अछूता है। आरटीआई एक्टिविस्ट सुश्री शेहला मसूद ने जब आयोग से संबंधित जानकारी के लिए निर्धारित प्रपत्र में आवेदन प्रस्तुत किया, तब पता चला कि यहां लोक सूचना अधिकारी ही नहीं है। ऐसे में अपीलीय अधिकारी नियुक्त करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। उन्होंने इस संबंध में राज्य सूचना आयुक्त के माध्यम से कार्यवाही करवाई, तब भी उक्त दोनों प्रभार किसी अधिकारी को नहीं सौंपे गए। अलबत्ता, अब यह होता है कि यदि कोई व्यक्ति वहां सूचना के अधिकार के तहत आवेदन देने जाता है तो वहां उपस्थित कोई भी अधिकारी-कर्मचारी खुद को लोक सूचना अधिकारी बता कर आवेदन ले लेता है। सूचना का अधिकार अधिनियम लागू होने संबंधी सूचना पटल तक नहीं लगे हैं। इन सारी गतिविधियों से समझा जा सकता है कि मध्यप्रदेश का विकास किस तरह हो रहा है। योजनाओं के अभाव में केंद्रीय मदद डूबत खाते में चली जाती है।
भोपाल (डीएनएन)। प्रदेशवासियों को स्वर्णिम मध्यप्रदेश का ख्वाब दिखाने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के राज में प्रदेश का वास्तविक रूप में कितना विकास किया जा रहा है, इसका सनसनीखेज खुलासा हुआ है। हालात की बदतरी का आलम यह है कि जिस राज्य योजना आयोग पर प्रदेश के चहुंमुखी विकास का महत्वपूर्ण दायित्व है, उसकी दो साल से बैठक तक नहीं हुई है। खास बात यह भी है कि योजना आयोग के चेयरमैन का दायित्व मुख्यमंत्री के पास है। उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में आयोग का सिर्फ एक बार दौरा भर किया है। राज्य योजना आयोग स्टाफ की कमी से तो जूझ ही रहा है, साथ ही यहां पांच साल बीत जाने के बाद भी सूचना का अधिकार अधिनियम लागू नहीं हो सका है। इससे समझा जा सकता है कि मध्यप्रदेश का कैसा विकास हो रहा है।
आयोग के उद्देश्य
स्वतंत्रता प्राप्ति के मात्र तीन साल बाद ही केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन कर दिया था। मप्र में राज्य सूचना आयोग वर्ष 1972 में अस्तित्व में आया, जो राष्ट्रीय योजना आयोग के अधीन काम करता है। इसमें राज्य के मुख्यमंत्री पदेन चेयरमैन होते हैं। इसके अलावा एक उपाध्यक्ष तथा ग्यारह अंशकालिक सदस्य होते हैं। फिलहाल चार सदस्य ही मनोनीत हैं। आयोग का यह मुख्य उद्देश्य है कि वह जिला योजना समितियों के माध्यम से वहां के संसाधनों को मद्देनजर रखते हुए योजना बनाए और पूरे राज्य की योजनाओं को तैयार कर केंद्र को स्वीकृति के लिए भेजे, ताकि केंद्रीय अनुदान प्राप्त कर विकास कार्यों को अंजाम दिया जा सके। जिलों के विकास की तरक्की में क्या बाधाएं आ रही हैं, उनका अनुसंधान कर उन असमानताओं को दूर करने का प्रयास करे। सरकारी संसाधनों और योजनाओं का क्रियान्वयन तथा धनराशि के व्यय की निगरानी का दायित्व भी राज्य योजना आयोग का है। दीर्घ अवधि की योजनाओं के क्रियान्वयन में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के साथ खाद्यान्न, स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास आदि में से किस काम को प्राथमिकता के आधार पर तय करने का दायित्व भी है। इसके अलावा समय-समय पर प्रगति रिपोर्ट और सुझाव दे। इस प्रकार सभी विभागों की पंचवर्षीय योजनाएं बनाने, उन्हें क्रियान्वित करना तथा उनकी निगरानी करना आयोग का काम है।
स्टाफ का टोटा
राज्य योजना आयोग में अंशकालिक सदस्यों की कमी के साथ ही कर्मचारियों का भी टोटा है। हालांकि विभाग के लिए एक प्रमुख सचिव स्तर का अधिकारी भी है, किंतु बीते दो साल में इसकी एक बैठक तक नहीं हुई, योजनाएं बनाना और क्रियान्वयन कराना तो बहुत दूर की बात है। आयोग कार्यालय में श्रीमती किरण मिश्र अंडर सेक्रेटरी हैं, जबकि श्री त्यागी ऑफिस इंचार्ज हैं। इनसे निचले स्तर के कर्मचारियों का यहां भारी टोटा बताया जाता है।
कहां है सूचना का अधिकार
देश में वर्ष 2005 से सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हो गया है तथा प्रदेश के शासकीय कार्यालयों में भी इसे लागू करने के लिए लोक सूचना अधिकारी तथा अपीलीय अधिकारी नियुक्त किए गए हैं, किंतु राज्य योजना आयोग इस अधिनियम से अछूता है। आरटीआई एक्टिविस्ट सुश्री शेहला मसूद ने जब आयोग से संबंधित जानकारी के लिए निर्धारित प्रपत्र में आवेदन प्रस्तुत किया, तब पता चला कि यहां लोक सूचना अधिकारी ही नहीं है। ऐसे में अपीलीय अधिकारी नियुक्त करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। उन्होंने इस संबंध में राज्य सूचना आयुक्त के माध्यम से कार्यवाही करवाई, तब भी उक्त दोनों प्रभार किसी अधिकारी को नहीं सौंपे गए। अलबत्ता, अब यह होता है कि यदि कोई व्यक्ति वहां सूचना के अधिकार के तहत आवेदन देने जाता है तो वहां उपस्थित कोई भी अधिकारी-कर्मचारी खुद को लोक सूचना अधिकारी बता कर आवेदन ले लेता है। सूचना का अधिकार अधिनियम लागू होने संबंधी सूचना पटल तक नहीं लगे हैं। इन सारी गतिविधियों से समझा जा सकता है कि मध्यप्रदेश का विकास किस तरह हो रहा है। योजनाओं के अभाव में केंद्रीय मदद डूबत खाते में चली जाती है।
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