डिस्टलर्स की गोद में आबकारी विभाग
शाहनवाज खान / बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)। मध्यप्रदेश सरकार गले-गले तक कर्ज में डूबी है। प्रदेश में निर्माण एजेंसियों का बजट 40 फीसदी तक कम किए जाने से विकास कार्य ठप है। आम जनता को महंगाई से राहत दिलाने के लिए सरकार डीजल पर वेट टैक्स कम करने को तैयार नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में प्रदेश का आबकारी विभाग राजस्व बढ़ाने की बजाय सरकार को नुकसान पहुंचा कर डिस्टलर्स को लाभ पहुंचा रहा हैं। अरुण पाण्डे जब विभागीय आयुक्त थे, तब उन्होंने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया था। श्री पाण्डे ने राजस्व भी बढ़ाया था। इसके बावजूद उनकी छुट्टी इसलिए कर दी गई, क्योंकि वे डिस्टलर्स को लाभ देकर सरकार का राजस्व कम नहीं करना चाहते थे। इससे साफ हो गया है कि आबकारी विभाग डिस्टलर्स के हाथों की कठपुतली बन कर उनके इशारे पर काम कर सरकार को चूना लगा रहा है।
क्या है नियम?
मप्र आबकारी विभाग द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार देशी मदिरा क्रय के लिए प्रति वर्ष प्रति प्रूफ लीटर पर अधिकतम तीन रुपए तक की वृद्धि की जा सकती है। विभाग द्वारा उपलब्ध जानकारी के अनुसार विगत दस वर्ष में इस नियम का पालन करते हुए प्रति प्रूफ लीटर मदिरा की दर में तीन रुपए की वृद्धि कभी नहीं की गई। (देखें चार्ट) लेकिन वर्ष 2009-10 के लिए विभाग ने लगभग 8.00 रुपए की मूल्यवृद्धि सीधे कर दी, जिससे शासन को राजस्व हानि हुई, जबकि डिस्टलर्स की बल्ले-बल्ले हो गई। गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में दिनांक 1 अप्रैल 2009 से 31 अप्रैल 2010 के लिए मदिरा के थोक प्रदाय के लिए प्रदेश के सभी 24 प्रदाय क्षेत्रों के लिए आबकारी विभाग ने निविदाएं आमंत्रित की थीं। इसके लिए कुल 70 निविदाएं प्राप्त हुई थीं। जिनमें से 24 निविदाएं स्वीकृत की गई थीं।
ठेकेदारों का तर्क
आबकारी आयुक्त कार्यालय, ग्वालियर की नोटशीट में बताया गया कि मप्र डिस्टलर्स एसोसिएशन के अनुसार विगत चार महीनों में मोलासिस और कोयले के दामों में अप्रत्याशी वृद्धि हुई है। एसोसिएशन ने वेस्टर्न कोल फील्ड के बिल प्रस्तुत कर बताया कि कोयले के बेसिक दाम अक्टूबर 2007 में 1672 रुपए प्रति मेट्रिक टन थे, जो जनवरी 2008 में बढ़कर 2991 रुपए हो गए हैं। इसलिए एसोसिएशन ने प्रति प्रूफ लीटर मदिरा पर सीधे लगभग 8.00 रुपए की वृद्धि की मांग की, जिसे विभाग ने जायज मान लिया और उसे स्वीकृति दे दी। इस संबंध में आबकारी विभाग के ही सूत्र बताते हैं कि कोयले की मूल्यवृद्धि का बहाना झूठा है, क्योंकि मध्यप्रदेश की डिस्टलरियों में कहीं भी कोयले का इस्तेमाल नहीं होता है। डिस्टलरियों में पदस्थ रहने वाले आबकारी विभाग के अमले ने आज तक कोयले का इस्तेमाल होते नहीं देखा है। फिर विभाग ने डिस्टलर्स एसोसिएशन के तर्क को मान्य क्यों कर लिया? इसका निगोसिएशन क्यों नहीं किया गया?
अरुण पाण्डे को क्यों हटाया?
सूत्र बताते हैं कि तत्कालीन आबकारी आयुक्त अरुण पाण्डे डिस्टलर्स एसोसिएशन के उक्त तर्क से सहमत नहीं थे। वे प्रति पू्रफ लीटर पर एक से डेढ़ रुपए की वृद्धि ही करने के पक्ष में थे, जबकि ठेकेदार लगभग 8.00 रुपए वृद्धि चाहते थे। जब ठेकेदारों को यह आभास हो गया कि अरुण पाण्डे के आयुक्त रहते उनके हित नहीं सध सकते, तो उन्होंने 'ऊपरी स्तर' पर लॉबिंग की और पाण्डे का तबादला करवा दिया।
सवाल यह है कि जिस अधिकारी के कार्यकाल में विभागीय राजस्व बढ़ा था और जो शासन के हितों का संरक्षण कर रहा था, तो उसे आनन-फानन में क्यों हटा दिया गया? क्या इससे यह नहीं लगता कि ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए इस खेल में ऊपर बैठे लोग भी शरीक हैं? सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि इसमें विभागीय सचिव, प्रमुख सचिव से लेकर मुख्यमंत्री के इनर सर्किल के लोगों की भूमिका भी संदिग्ध है। यदि इस मामले की गहराई से जांच की जाए तो बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार उजागर हो सकता है, लेकिन यहां यह प्रश्न उठता है कि यह जांच कौन करे? डिस्टलर्स को अनुचित लाभ पहुंचाने के इस खेल में ऊपर से नीचे तक सब मिले हुए हैं। यदि ऐसा नहीं है तो सरकार इस भ्रष्टाचार की जांच क्यों नहीं करती?
भोपाल (डीएनएन)। मध्यप्रदेश सरकार गले-गले तक कर्ज में डूबी है। प्रदेश में निर्माण एजेंसियों का बजट 40 फीसदी तक कम किए जाने से विकास कार्य ठप है। आम जनता को महंगाई से राहत दिलाने के लिए सरकार डीजल पर वेट टैक्स कम करने को तैयार नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में प्रदेश का आबकारी विभाग राजस्व बढ़ाने की बजाय सरकार को नुकसान पहुंचा कर डिस्टलर्स को लाभ पहुंचा रहा हैं। अरुण पाण्डे जब विभागीय आयुक्त थे, तब उन्होंने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया था। श्री पाण्डे ने राजस्व भी बढ़ाया था। इसके बावजूद उनकी छुट्टी इसलिए कर दी गई, क्योंकि वे डिस्टलर्स को लाभ देकर सरकार का राजस्व कम नहीं करना चाहते थे। इससे साफ हो गया है कि आबकारी विभाग डिस्टलर्स के हाथों की कठपुतली बन कर उनके इशारे पर काम कर सरकार को चूना लगा रहा है।
क्या है नियम?
मप्र आबकारी विभाग द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार देशी मदिरा क्रय के लिए प्रति वर्ष प्रति प्रूफ लीटर पर अधिकतम तीन रुपए तक की वृद्धि की जा सकती है। विभाग द्वारा उपलब्ध जानकारी के अनुसार विगत दस वर्ष में इस नियम का पालन करते हुए प्रति प्रूफ लीटर मदिरा की दर में तीन रुपए की वृद्धि कभी नहीं की गई। (देखें चार्ट) लेकिन वर्ष 2009-10 के लिए विभाग ने लगभग 8.00 रुपए की मूल्यवृद्धि सीधे कर दी, जिससे शासन को राजस्व हानि हुई, जबकि डिस्टलर्स की बल्ले-बल्ले हो गई। गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में दिनांक 1 अप्रैल 2009 से 31 अप्रैल 2010 के लिए मदिरा के थोक प्रदाय के लिए प्रदेश के सभी 24 प्रदाय क्षेत्रों के लिए आबकारी विभाग ने निविदाएं आमंत्रित की थीं। इसके लिए कुल 70 निविदाएं प्राप्त हुई थीं। जिनमें से 24 निविदाएं स्वीकृत की गई थीं।
ठेकेदारों का तर्क
आबकारी आयुक्त कार्यालय, ग्वालियर की नोटशीट में बताया गया कि मप्र डिस्टलर्स एसोसिएशन के अनुसार विगत चार महीनों में मोलासिस और कोयले के दामों में अप्रत्याशी वृद्धि हुई है। एसोसिएशन ने वेस्टर्न कोल फील्ड के बिल प्रस्तुत कर बताया कि कोयले के बेसिक दाम अक्टूबर 2007 में 1672 रुपए प्रति मेट्रिक टन थे, जो जनवरी 2008 में बढ़कर 2991 रुपए हो गए हैं। इसलिए एसोसिएशन ने प्रति प्रूफ लीटर मदिरा पर सीधे लगभग 8.00 रुपए की वृद्धि की मांग की, जिसे विभाग ने जायज मान लिया और उसे स्वीकृति दे दी। इस संबंध में आबकारी विभाग के ही सूत्र बताते हैं कि कोयले की मूल्यवृद्धि का बहाना झूठा है, क्योंकि मध्यप्रदेश की डिस्टलरियों में कहीं भी कोयले का इस्तेमाल नहीं होता है। डिस्टलरियों में पदस्थ रहने वाले आबकारी विभाग के अमले ने आज तक कोयले का इस्तेमाल होते नहीं देखा है। फिर विभाग ने डिस्टलर्स एसोसिएशन के तर्क को मान्य क्यों कर लिया? इसका निगोसिएशन क्यों नहीं किया गया?
अरुण पाण्डे को क्यों हटाया?
सूत्र बताते हैं कि तत्कालीन आबकारी आयुक्त अरुण पाण्डे डिस्टलर्स एसोसिएशन के उक्त तर्क से सहमत नहीं थे। वे प्रति पू्रफ लीटर पर एक से डेढ़ रुपए की वृद्धि ही करने के पक्ष में थे, जबकि ठेकेदार लगभग 8.00 रुपए वृद्धि चाहते थे। जब ठेकेदारों को यह आभास हो गया कि अरुण पाण्डे के आयुक्त रहते उनके हित नहीं सध सकते, तो उन्होंने 'ऊपरी स्तर' पर लॉबिंग की और पाण्डे का तबादला करवा दिया।
सवाल यह है कि जिस अधिकारी के कार्यकाल में विभागीय राजस्व बढ़ा था और जो शासन के हितों का संरक्षण कर रहा था, तो उसे आनन-फानन में क्यों हटा दिया गया? क्या इससे यह नहीं लगता कि ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए इस खेल में ऊपर बैठे लोग भी शरीक हैं? सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि इसमें विभागीय सचिव, प्रमुख सचिव से लेकर मुख्यमंत्री के इनर सर्किल के लोगों की भूमिका भी संदिग्ध है। यदि इस मामले की गहराई से जांच की जाए तो बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार उजागर हो सकता है, लेकिन यहां यह प्रश्न उठता है कि यह जांच कौन करे? डिस्टलर्स को अनुचित लाभ पहुंचाने के इस खेल में ऊपर से नीचे तक सब मिले हुए हैं। यदि ऐसा नहीं है तो सरकार इस भ्रष्टाचार की जांच क्यों नहीं करती?
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