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दवा खरीदी में फिर घोटाला

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इरफान जाफरी/ बिच्छू डॉट कॉम.     
रायसेन (डीएनएन)। स्वास्थ्य विभाग में फिर दवाई खरीदी घोटाला उजागर हुआ है। राजधानी से सटे रायसेन जिले में स्वास्थ्य विभाग द्वारा दर्जनभर दवाइयां दुगने से भी ऊंचे दामों पर खरीदी गईं। सूचना तो यह भी है कि जितनी दवाइयां खरीदी जाना बताया गया है, जिले में उतनी दवाइयां कंपनी द्वारा भेजी ही नहीं गई। यानी ऊंची दरों पर दवाइयां खरीदने के साथ दवाओं की संख्या में भी गोलमाल कर लाखों रुपए के वारे-न्यारे अधिकारियों द्वारा किए गए हैं।
पूरे देश में भ्रष्टाचार को लेकर बदनाम मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार का रोग तमाम प्रयासों के बावजूद जड़ से खत्म नहीं हो पा रहा है। पिछले महीनों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा स्वास्थ्य विभाग में  भ्रष्टाचार को खत्म करने के सख्त कदम उठाए गए थे। इसका अफसरों पर कोई असर नहीं हुआ है। उल्टे प्रदेश के वीआईपी जिले रायसेन में ही बड़ा दवा घोटाला कर दिया गया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज के संसदीय क्षेत्र के जिले में पिछले महीने दवाइयों की खरीदी की गई। खरीदी में नियमों की आड़ लेकर ऊंचे दामों पर बड़ी मात्रा  में दवाइयां खरीदी ली गई, लेकिन 'बिच्छू' की पैनी नजरों से यह घोटाला छिप नहीं सका। पेश है भ्रष्टाचार को परत-दर-परत उजाकर करती यह रिपोर्ट।
रायसेन जिला अस्पताल में शासन की विभिन्न योजनाओं में मरीजों को देने के लिए पिछले महीने बड़ी मात्रा में दवाइयां खरीदी गई है। दवा खरीदी के मुख्य सूत्रधार जिला अस्पताल के सर्जन सह-अधीक्षक डॉ. सुधीर जेसानी ने इस घोटाले को बड़ी होशियारी से अंजाम दिया। पूरा खेल ऐसा खेला गया कि घोटाले को कोई पकड़ नहीं सके। स्वास्थ्य विभाग में दवा खरीदी के नियम बने हुए हैं।  इसके अलावा समय-समय पर खरीदी संबंधी निर्देश भी जारी होते रहते हैं। इन नियमों के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग में जिला स्तर पर खरीदी तीन तरह से की जा सकती है।
1. लघु उद्योग निगम के मार्फत
2. जिला स्तर पर टेंडर निकालकर
3. टेंडर नहीं हुए हों तो मेडिकल कॉलेज की सेंट्रल प्रोक्योरमेंट कमेटी द्वारा अनुमोदित दरों पर।
रायसेन जिला अस्पताल में दवा खरीदी के लिए पहला यानी लघु उद्योग निगम की मार्फत या फिर तीसरा तरीका मेडिकल कॉलेज की सेंट्रल प्रोक्योरमेंट कमेटी द्वारा तय दरों पर खरीदी की जा सकती थी, क्योंकि यहां पर स्थानीय स्तर पर दवाइयों के वार्षिक टेंडर नहीं हुए थे। जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. जेसानी यह अच्छे से जानते थे कि उपरोक्त दोनों तरीकों से दवा खरीदी की गई तो स्वयं के स्वार्थ सिद्ध नहीं हो पाएंगे। इसलिए डॉ. जेसानी ने टेंडर निकालकर दवा क्रय करने के तीसरे तरीके का इस्तेमाल किया। इसके लिए प्रमुख समाचार पत्रों के माध्यम से टेंडर की सूचना मई 2010 में जारी की गई। यह नोटिस भोपाल में भी प्रकाशित हुआ था। इस कारण बड़ी संख्या में कंपनियों ने जिला अस्पताल में टेंडर को लेकर जानकारी हासिल की। इस नए घटनाक्रम से डॉ. जेसानी घबरा गए, उन्हें लगा कि कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा चली तो रेट कम आएंगे और उन्हें (जेसानी) को कोई फायदा नहीं होगा। इसलिए उन्हीं अखबारों में एक और सूचना टेंडर निरस्त करने के दी गई। इस नोटिस के छपते ही कंपनियों की दौड़-भाग खत्म हो गई। जब मामला ठंडा पड़ गया तो स्थानीय स्तर पर रि-टेंडर का नोटिस छपवाया गया। चूंकि टेंडर स्थानीय स्तर पर प्रकाशित हुआ, इस कारण बड़ी दवाई कंपनियों को टेंडर की जानकारी ही नहीं मिल पाई। आखिर टेंडर में वैसा ही हुआ, जैसा डॉ. जेसानी चाहते थे। डॉ. जेसानी की पसंदीदा फर्म विंग एजेंसीस इंदौर के पक्ष में टेंडर मंजूर हो गया और दवाइयों की दरें भी मनमर्जी की कोड की गई।
जून में दे दिए आर्डर
जिला अस्पताल में दवा खरीदी के लिए टेंडर हो जाने के बाद जून से पहले हफ्ते से ही विंग एजेंसीस को आर्डर मिलना शुरू हो गया। यह आर्डर डॉ. जेसानी ने 5 जून 2010 को दिया। नंबर 357173, 3600-02, 3586-88, 357779, 3597-99, 3599-96, 357476, 3592-94 के द्वारा  8 दवाइयों व दो अन्य सामानों की खरीदी का आदेश दिया गया। (देखें सूची) आर्डर में एक महीने में आपूर्ति करने का निर्देश दिया गया।
स्टोर में हुआ था विरोध
जिला अस्पताल सह अधीक्षक डॉ. सुधीर जेसानी द्वारा महंगे दामों पर दवा खरीदी किए जाने का स्टोर में पदस्थ फार्मासिस्ट ने विरोध किया था, लेकिन डॉ. जेसानी ने स्टाफ की एक नहीं सुनी। वहीं विरोध करने वाले स्टाफ को भी क्रय शाखा से हटाकर अन्यत्र पदस्थ कर दिया।
सभी दवाइयों के दाम ऊंचे
यह जानकर हैरानी ही होगी कि जिला अस्पताल द्वारा जिन दवाइयों की खरीदी की गई, उनमें से कई के दाम दुगने से भी ज्यादा थे, जबकि इसके लिए बकायदा टेंडर भी हुआ। खैर टेंडर की गाथा ऊपर पहले ही बता चुके हैं। जिला अस्पताल द्वारा डिस्पोजेबल सिरिंज (5 एमएल) को 4.50 रुपए की दर पर खरीदा गया, उसकी दर 1.44 रुपए और 1.55 रुपए प्रति नग से ज्यादा नहीं है। इसी तरह अस्पताल के लिए डिस्पोजेबल ग्लब्स 16.60 प्रति नग की दर से खरीदे गए, जबकि यह बाजार में 5.90 रुपए और 6.00 रुपए में उपलब्ध हैं। इसी तरह दवाइयों के दामों की भी स्थिति है। एक टेबलेट नारफ्लाक्स ट्रीजेड की (10&10) का पत्ता यानी 100 गोलियां 389.00 में एक पत्ता की दर से खरीदी गई जबकि इसकी दर 114.50 रुपए और 145.00 से ज्यादा नहीं है। यही हाल सारी दवाइयों का है। एक भी टेबलेट ऐसी नहीं है जिसकी दर कम आई हो।

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