वन विभाग में फर्जीवाड़ा
- टाइगर स्टेट का दर्जा खो रहा प्रदेश। -कागजी संस्थान डकार रहे हैं करोड़ों। - संरक्षित क्षेत्र में खुदाई का मामला दफन।
महेश बागी /बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)। देश-दुनिया का गौरव मध्यप्रदेश 'टाइगर स्टेट' का दर्जा खो रहा है। वन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार, आला अफसरान की कामचोर प्रवृत्ति और कागजी संस्थानों के कारण यह सब हो रहा है। एक ओर जहां बाघों की मौत के नित नए मामले सामने आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर संरक्षित क्षेत्र में अवैध उत्खनन भी किया जा रहा है। हालात इतने बदतर हैं कि सरकार में बैठे लोग ही वृक्षों का सफाया करने और अवैध उत्खनन में लगे हैं। इसी के साथ बाघों का शिकार भी किया जा रहा है, जिससे उनके अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है।
ढेर सारा अमला
कहने को सरकार ने वन तथा बाघों के संरक्षण के लिए बड़ा अमला जुटा रखा है। इसके अलावा सरकार ने चार फंड प्रोटेक्शन भी बना रखे हैं, जिसमें राज्य शासन के साथ केंद्र सरकार, अंतरराष्ट्रीय संस्था और राज्य का इमर्जेंसी फंड भी है। सरकार ने वाइल्ड लाइफ मानीटरिंग कमेटी अलग से गठित कर रखी है।
इसी के साथ एक सलाहकार समिति भी है, जिसका गठन वर्ष 2003 में किया गया था। वन संरक्षण के लिए स्थापना फंड भी है। जबलपुर में वाइल्ड लाइफ हेल्थ, मानीटरिंग, डायग्नोसिस और रिसर्च सेल भी कार्यरत है। 1995 में वन विभाग ने टाइगर सेल भी बनाया था। विभाग की मदद करने के लिए वाइल्ड लाइफ इंटेलीजेंस ब्यूरो और एंटी पोचिंग ब्यूरो भी है। इन सबके अलावा एक स्वयंसेवी संगठन मप्र टायगर फाउंडेशन सोसायटी भी कार्यरत है।
फिर भी घट रहे हैं बाघ
इतना भारी भरकम अमला और बजट होने के बावजूद प्रदेश में बाघों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। उनका शिकार किए जाने के भी कई उदाहरण सामने आए हैं, जिनमें से एक भी व्यक्ति को न दोषी ठहराया गया और न ही विभाग के किसी अधिकारी के विरुद्ध कोई कार्रवाई हो सकी। सिवनी जिले के पेंच अभयारण्य में बीते तेरह माह में 19 बाघों की मौत हो चुकी है। इसमें कान्हा में तीन बाघों की मौतें भी शामिल हैं।
प्रदेश में कितने बाघ?
प्रदेश के जंगलों में कितने बाघ हैं, इसे लेकर भी वन विभाग के अधिकारी अलग-अलग दावे करते हैं। 1998 की गणना के अनुसार तब प्रदेश में कुल 6 हजार बाघ थे। इस प्रकार दुनियाभर में बाघों की संख्या का दस प्रतिशत मध्यप्रदेश में बताया गया। इसी कारण प्रदेश को 'टाइगर स्टेट' का दर्जा मिला। प्रदेश में बाघों की इतनी बड़ी संख्या यहां के पर्यावरण का आईना मानी गई। अब कोई अधिकारी तीन हजार तो कोई चार हजार बाघ होना बता रहा है। इस वर्ष फरवरी में फिर इनकी गणना किया जाना तय हुआ है।
पोस्टमार्टम स्पेशलिस्ट नहीं
मध्यप्रदेश को टाइगर स्टेट का दर्जा हासिल होने और उनके संरक्षण के लिए भारी बजट और अमला होने के बावजूद बाघों की मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा है। हालात इतने बदतर हैं कि मृत बाघों का पोस्टमार्टम करने के लिए विभाग के पास एक भी विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं है।
कुत्तों के डॉक्टर यह काम करते हैं। हाल ही में पेंच अभयारण्य में मृत बाघ के बारे में भी विभाग गलत जानकारी दे रहा है कि उसका पोस्टमार्टम कर विसरा जांच के लिए सागर तथा जबलपुर भेजा गया है, किंतु विभागीय सूत्र बताते हैं कि पोस्टमार्टम किया ही नहीं गया। मृत बाघ की अवस्था देखकर साफ कहा जा सकता था कि उसकी मौत जहर से हुई, जबकि विभागीय अधिकारी अधिक ठंड से मौत होना बता रहे हैं। इतना ही नहीं, उक्त बाघ का शव बगैर पोस्टमार्टम के जंगल में आग के हवाले कर दिया गया।
जंगल में खुदाई
वन विभाग वनों का संरक्षण कितनी मुस्तैदी से कर रहा है, इसका सनसनीखेज खुलासा हुआ है। वोडाफोन कंपनी ने शासन से अनुमति लिए बगैर राजधानी से सटे रातापानी अभयारण्य में ग्राम सिंघौरी में भूमिगत आप्टिकल फायबर केबल बिछाने के लिए साढ़े चार किलोमीटर लंबी खुदाई कर डाली और वनरक्षकों से लेकर अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगी। संरक्षित क्षेत्र में खुदाई की अनुमति केंद्र देता है, जबकि कंपनी ने राज्य को इसकी सूचना देना भी जरूरी नहीं समझा और खुदाई कर डाली।
एक्टिविस्ट ने किया विभाग का काम
आरटीआई एक्टिविस्ट सुश्री शेहला मसूद ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, वन मंत्री और वन विभाग के आला अफसरान को उक्त अवैध खुदाई की जानकारी 3 नवंबर 2009 को दी।
तेरह दिन बाद वन विभाग ने वन संरक्षक से जवाब मांगा। इसके बाद वन संरक्षक ने मौका-मुआयना कर खुदाई की पुष्टि की। 23 नवंबर को प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने वाइल्ड लाइफ प्रमुख नेगी को कार्रवाई करने के निर्देश दिए। तब जाकर सात गाड्र्स को निलंबित कर एसडीओ और डीएफओ को साफ बचा लिया गया। सुश्री शेहला ने वोडाफोन कंपनी पर कार्रवाई करने के लिए दबाव बनाया। इसके बाद वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 तथा वन संरक्षण अधिनियम 1980 के उल्लंघन का प्रकरण दर्ज किया गया। इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इससे स्पष्ट है कि वोडाफोन द्वारा की गई अवैध खुदाई को वरिष्ठ अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है।
क्या करती है टाइगर फाउंडेशन
1997 में बनी मप्र टाइगर फाउंडेशन सोसायटी ने विदेशी मुद्रा विनिमय में पंजीयन करवा रखा है। इस कारण उसे केंद्र के अलावा विदेशों से भी मदद मिलती है। इस सोसायटी के कर्ता-धर्ता वन संरक्षण-निरीक्षण के नाम पर विशेष विमान से वन क्षेत्रों का दौरा करते हैं। बताया जाता है कि सोसायटी के कर्ता-धर्ता जंगलों में शराबखोरी और अय्याशी करते हैं तथा वन विभाग का अमला उनकी सेवा में जुटा रहता है। फाउंडेशन को विदेश से कितना अनुदान मिलता है और उसे कहां-किस पर, किस तरह खर्च किया जाता है, यह जानकारी मांगने पर भी नहीं दी जा रही है।
वेबसाइट भी अपडेट नहीं
वन अधिकारी अपने कर्तव्यों के प्रति कितने सजग हैं, यह इससे भी समझा जा सकता है कि विभाग की वेबसाइट भी अपडेट नहीं की जाती है। विभाग का मुख्यालय पिछले साल नए भवन में स्थानांतरित हो चुका है, किंतु विभागीय वेबसाइट में उसका पता अब भी तुलसी नगर स्थित पुराने भवन का दर्ज है।
मामला दफन करने का प्रमाण
वोडाफोन कंपनी द्वारा संरक्षित वन्य क्षेत्र में अवैध खुदाई करने के मामले को अफसरान ने दफन कर दिया है। जिस मामले में कंपनी के कर्ता-धर्ताओं को सजा होना थी, उस मामले में वन विभाग ने राजीनामा करते हुए कंपनी को संरक्षित क्षेत्र में पांच गुना नेट प्रेजेंट वैल्यू 19 लाख, 24 हजार 950 रुपए का भुगतान लेकर वनभूमि के उपयोग की अनुमति दे दी है। जबकि वन विभाग और राज्य प्रशासन को यह अधिकार ही नहीं है। यह अनुमति सिर्फ केंद्र सरकार ही दे सकती है।
भोपाल (डीएनएन)। देश-दुनिया का गौरव मध्यप्रदेश 'टाइगर स्टेट' का दर्जा खो रहा है। वन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार, आला अफसरान की कामचोर प्रवृत्ति और कागजी संस्थानों के कारण यह सब हो रहा है। एक ओर जहां बाघों की मौत के नित नए मामले सामने आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर संरक्षित क्षेत्र में अवैध उत्खनन भी किया जा रहा है। हालात इतने बदतर हैं कि सरकार में बैठे लोग ही वृक्षों का सफाया करने और अवैध उत्खनन में लगे हैं। इसी के साथ बाघों का शिकार भी किया जा रहा है, जिससे उनके अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है।
ढेर सारा अमला
कहने को सरकार ने वन तथा बाघों के संरक्षण के लिए बड़ा अमला जुटा रखा है। इसके अलावा सरकार ने चार फंड प्रोटेक्शन भी बना रखे हैं, जिसमें राज्य शासन के साथ केंद्र सरकार, अंतरराष्ट्रीय संस्था और राज्य का इमर्जेंसी फंड भी है। सरकार ने वाइल्ड लाइफ मानीटरिंग कमेटी अलग से गठित कर रखी है।
इसी के साथ एक सलाहकार समिति भी है, जिसका गठन वर्ष 2003 में किया गया था। वन संरक्षण के लिए स्थापना फंड भी है। जबलपुर में वाइल्ड लाइफ हेल्थ, मानीटरिंग, डायग्नोसिस और रिसर्च सेल भी कार्यरत है। 1995 में वन विभाग ने टाइगर सेल भी बनाया था। विभाग की मदद करने के लिए वाइल्ड लाइफ इंटेलीजेंस ब्यूरो और एंटी पोचिंग ब्यूरो भी है। इन सबके अलावा एक स्वयंसेवी संगठन मप्र टायगर फाउंडेशन सोसायटी भी कार्यरत है।
फिर भी घट रहे हैं बाघ
इतना भारी भरकम अमला और बजट होने के बावजूद प्रदेश में बाघों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। उनका शिकार किए जाने के भी कई उदाहरण सामने आए हैं, जिनमें से एक भी व्यक्ति को न दोषी ठहराया गया और न ही विभाग के किसी अधिकारी के विरुद्ध कोई कार्रवाई हो सकी। सिवनी जिले के पेंच अभयारण्य में बीते तेरह माह में 19 बाघों की मौत हो चुकी है। इसमें कान्हा में तीन बाघों की मौतें भी शामिल हैं।
प्रदेश में कितने बाघ?
प्रदेश के जंगलों में कितने बाघ हैं, इसे लेकर भी वन विभाग के अधिकारी अलग-अलग दावे करते हैं। 1998 की गणना के अनुसार तब प्रदेश में कुल 6 हजार बाघ थे। इस प्रकार दुनियाभर में बाघों की संख्या का दस प्रतिशत मध्यप्रदेश में बताया गया। इसी कारण प्रदेश को 'टाइगर स्टेट' का दर्जा मिला। प्रदेश में बाघों की इतनी बड़ी संख्या यहां के पर्यावरण का आईना मानी गई। अब कोई अधिकारी तीन हजार तो कोई चार हजार बाघ होना बता रहा है। इस वर्ष फरवरी में फिर इनकी गणना किया जाना तय हुआ है।
पोस्टमार्टम स्पेशलिस्ट नहीं
मध्यप्रदेश को टाइगर स्टेट का दर्जा हासिल होने और उनके संरक्षण के लिए भारी बजट और अमला होने के बावजूद बाघों की मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा है। हालात इतने बदतर हैं कि मृत बाघों का पोस्टमार्टम करने के लिए विभाग के पास एक भी विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं है।
कुत्तों के डॉक्टर यह काम करते हैं। हाल ही में पेंच अभयारण्य में मृत बाघ के बारे में भी विभाग गलत जानकारी दे रहा है कि उसका पोस्टमार्टम कर विसरा जांच के लिए सागर तथा जबलपुर भेजा गया है, किंतु विभागीय सूत्र बताते हैं कि पोस्टमार्टम किया ही नहीं गया। मृत बाघ की अवस्था देखकर साफ कहा जा सकता था कि उसकी मौत जहर से हुई, जबकि विभागीय अधिकारी अधिक ठंड से मौत होना बता रहे हैं। इतना ही नहीं, उक्त बाघ का शव बगैर पोस्टमार्टम के जंगल में आग के हवाले कर दिया गया।
जंगल में खुदाई
वन विभाग वनों का संरक्षण कितनी मुस्तैदी से कर रहा है, इसका सनसनीखेज खुलासा हुआ है। वोडाफोन कंपनी ने शासन से अनुमति लिए बगैर राजधानी से सटे रातापानी अभयारण्य में ग्राम सिंघौरी में भूमिगत आप्टिकल फायबर केबल बिछाने के लिए साढ़े चार किलोमीटर लंबी खुदाई कर डाली और वनरक्षकों से लेकर अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगी। संरक्षित क्षेत्र में खुदाई की अनुमति केंद्र देता है, जबकि कंपनी ने राज्य को इसकी सूचना देना भी जरूरी नहीं समझा और खुदाई कर डाली।
एक्टिविस्ट ने किया विभाग का काम
आरटीआई एक्टिविस्ट सुश्री शेहला मसूद ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, वन मंत्री और वन विभाग के आला अफसरान को उक्त अवैध खुदाई की जानकारी 3 नवंबर 2009 को दी।
तेरह दिन बाद वन विभाग ने वन संरक्षक से जवाब मांगा। इसके बाद वन संरक्षक ने मौका-मुआयना कर खुदाई की पुष्टि की। 23 नवंबर को प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने वाइल्ड लाइफ प्रमुख नेगी को कार्रवाई करने के निर्देश दिए। तब जाकर सात गाड्र्स को निलंबित कर एसडीओ और डीएफओ को साफ बचा लिया गया। सुश्री शेहला ने वोडाफोन कंपनी पर कार्रवाई करने के लिए दबाव बनाया। इसके बाद वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 तथा वन संरक्षण अधिनियम 1980 के उल्लंघन का प्रकरण दर्ज किया गया। इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इससे स्पष्ट है कि वोडाफोन द्वारा की गई अवैध खुदाई को वरिष्ठ अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है।
क्या करती है टाइगर फाउंडेशन
1997 में बनी मप्र टाइगर फाउंडेशन सोसायटी ने विदेशी मुद्रा विनिमय में पंजीयन करवा रखा है। इस कारण उसे केंद्र के अलावा विदेशों से भी मदद मिलती है। इस सोसायटी के कर्ता-धर्ता वन संरक्षण-निरीक्षण के नाम पर विशेष विमान से वन क्षेत्रों का दौरा करते हैं। बताया जाता है कि सोसायटी के कर्ता-धर्ता जंगलों में शराबखोरी और अय्याशी करते हैं तथा वन विभाग का अमला उनकी सेवा में जुटा रहता है। फाउंडेशन को विदेश से कितना अनुदान मिलता है और उसे कहां-किस पर, किस तरह खर्च किया जाता है, यह जानकारी मांगने पर भी नहीं दी जा रही है।
वेबसाइट भी अपडेट नहीं
वन अधिकारी अपने कर्तव्यों के प्रति कितने सजग हैं, यह इससे भी समझा जा सकता है कि विभाग की वेबसाइट भी अपडेट नहीं की जाती है। विभाग का मुख्यालय पिछले साल नए भवन में स्थानांतरित हो चुका है, किंतु विभागीय वेबसाइट में उसका पता अब भी तुलसी नगर स्थित पुराने भवन का दर्ज है।
मामला दफन करने का प्रमाण
वोडाफोन कंपनी द्वारा संरक्षित वन्य क्षेत्र में अवैध खुदाई करने के मामले को अफसरान ने दफन कर दिया है। जिस मामले में कंपनी के कर्ता-धर्ताओं को सजा होना थी, उस मामले में वन विभाग ने राजीनामा करते हुए कंपनी को संरक्षित क्षेत्र में पांच गुना नेट प्रेजेंट वैल्यू 19 लाख, 24 हजार 950 रुपए का भुगतान लेकर वनभूमि के उपयोग की अनुमति दे दी है। जबकि वन विभाग और राज्य प्रशासन को यह अधिकार ही नहीं है। यह अनुमति सिर्फ केंद्र सरकार ही दे सकती है।
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