Home | रंगशाला | ससुराल नहीं घर समझना

ससुराल नहीं घर समझना

Font size: Decrease font Enlarge font
तुम शादी होकर नए घर में आ गई हो, लेकिन इसे ससुराल नहीं घर समझना। देवर को छोटा भाई समझना, उसका नाम मत लेना भाई साब कहना, ननद को दीदी कहना, छोटे बच्चों से भी सम्मान से बात करना, इसे ससुराल नहीं घर समझना। हम कहें वैसा खाना बनाना, बिना पूछे कुछ मत बनाना, सबको खिलाना फिर खाना, इसे ससुराल नहीं घर समझना।
सब बात कर रहे हों तो अपना मत नहीं बताना, ससुरजी से नजरें मत मिलाना, जेठ से बराबरी से बात मत करना, हमेशा सिर ढँककर रखना, इसे ससुराल नहीं घर समझना। मायके की सारी बातें भूल जाना, माता-पिता का कभी जिक्र मत करना, भाई-बहनों की बातें मत छेडऩा, इसे ससुराल नहीं घर समझना। चुपचाप रहना, सबकी दो बातें सुनना, सबकुछ सहना, गुस्से को पी जाना और मुस्कराते रहना, इसे ससुराल नहीं घर समझना।
लघुकथा :  सीमा पांडे 'सुशी'
Rate this article
0