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आलोक श्रीवास्तव की ग़ज़ल

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असर बुजुर्गों की नेमतों का, हमारे अंदर से झांकता है,
पुरानी नदियों का मीठा पानी, नए समंदर से झांकता है।

न जिस्म कोई, न दिल न आंखें, मगर ये जादूगरी तो देखो,
हर एक शै में धड़क रहा है, हर एक मंजर से झांकता है।

लबों पे खामोशियों का पहरा, नजर परेशां उदास चेहरा,
तुम्हारे दिल का हर एक जज्बा, तुम्हारे तेवर से झांकता है।

चहक रहे हैं चमन में पंछी, दरख्त अंगड़ाई ले रहे हैं,
बदल रहा है दुखों का मौसम, बसंत पतझर से झांकता है।

गले में मां ने पहन रखे हैं, महीन धागे में चंद मोती,
हमारी गर्दिश का हर सितारा, उस एक जेवर से झांकता है।

थके पिता का उदास चेहरा, उभर रहा है यूं मेरे दिल में,
कि प्यासे बादल का अक्स जैसे किसी सरोवर से झांकता है।

वही आंगन, वही खिड़की, वही दर याद आता है,
मैं जब भी तन्हां होता हूं, मुझे घर याद करता है।

मेरे सीने की हिचकी भी, मुझे खुलकर बताती है,
तेरे अपनों को गांव में, तू अक्सर याद आता है।

जो अपने पास हो उसकी कोई कीमत नहीं होती,
हमारे भाई को ही लो, बिछड़कर याद आता है।

सफलता के सफर में तो कहां फुर्सत के, कुछ सोचें,
मगर जब चोट लगती है, मुकद्दर याद आता है।

मई और जून की गर्मी, बदन से जब टपकती है,
नवंबर याद आता है, दिसंबर याद आता है।

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