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बृहस्पतिवार का व्रत

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आज बृहस्पतिवार था, इसलिए पूजा को आज काम पर नहीं जाना था...
बच्चे के जागने की आवाज़ से पूजा जल्दी से चारपाई से उठी और उसने बच्चे को पालने में से उठाकर अपनी अलसायी-सी छाती से लगा लिया, ''मन्नू देवता ! आज रोना नहीं, आज हम दोनों सारा दिन बहुत-सी बातें करेंगे...सारा दिन...।''
यह सारा दिन पूजा को हफ्ते में एक बार नसीब होता था। इस दिन वह मन्नू को अपने हाथों से नहलाती थी, सजाती थी, खिलाती थी और उसे कन्धे पर बिठाकर आसपास के किसी बगीचे में ले जाती थी।
यह दिन आया का नहीं, मां का दिन होता था...
आज भी पूजा ने बच्चे को नहला-धुलाकर और दूध पिलाकर जब चाबीवाले खिलौने उसके सामने रख दिए, तो बच्चे की किलकारियों से उसका रोम-रोम पुलकित हो गया...
चैत्र मास के प्रारम्भिक दिन थे। हवा में एक स्वाभाविक खुशबू थी, और आज पूजा की आत्मा में भी एक स्वाभाविक ममता छलक रही थी। बच्चा खेलते-खेलते थककर टांगों पर सिर रखकर ऊंघने लगा, तो उसे उठाकर गोदी में डालते हुए वह लोरियों जैसी बातें करने लगी ''मेरे मन्नू देवता को फिर नींद आ गई...मेरा नन्हा-सा देवता...बस थोड़ा-सा भोग लगाया, और फिर सो गया...।''
पूजा ने ममता से विभोर होकर मन्नू का सिर भी चूम लिया, आंखें भी, गाल भी, गरदन भी और जब उसे उठाकर चारपाई पर सुलाने लगी तो मन्नू कच्ची नींद के कारण जागकर रोने लगा।
पूजा ने उसे उठाकर फिर कन्धे से लगा लिया और दुलारने लगी, ''मैं कहीं नहीं जा रही, मन्नू ! आज मैं कहीं नहीं जाऊंगी...।''
लगभग डेढ़ वर्ष के मन्नू को शायद आज भी यह अहसास हुआ था कि मां जब बहुत बार उसके सिर व माथे को चूमती है, तो उसके बाद उसे छोड़कर चली जाती है।
और कन्धे से कसकर चिपटे हुए मन्नू को वह हाथ से दुलारते हुए कहने लगी, ''हर रोज़ तुम्हें छोड़कर चली जाती हूं न...जानते हो कहां जाती हूं ? मैं जंगल में से फूल तोडऩे नहीं जाऊंगी, तो अपने देवता की पूजा कैसे करूंगी ?''
और पूजा के मस्तिष्क में बिजली के समान वह दिन कौंध गया जब एक 'गेस्ट हाउस' की मालकिन मैडम डी. ने उसे कहा था ''मिसिज़ नाथ। यहां किसी लड़की का असली नाम किसी को नहीं बताया जाता। इसलिए तुम्हें जो भी नाम पसन्द हो, रख लो।''
और उस दिन उसके मुंह से निकला था ''मेरा नाम पूजा होगा।'' गेस्ट हाउसवाली मैडम डी. हंस पड़ी थी''हां, पूजा ठीक है, पर किस मन्दिर की पूजा ?''
और उसने कहा था ''पेट के मन्दिर की।''
मां के गले से लगी बांहों ने जब बच्चे की आंखों में इत्मीनान की नींद भर दी, तो पूजा ने उसे चारपाई पर लिटाते हुए, पैरों के बल चारपाई के पास बैठकर अपना सिर उसकी छाती के निकट, चारपाई की पाटी पर रख दिया और कहने लगी ''क्या तुम जानते हों, मैंने अपने पेट को उस दिन मन्दिर क्यों कहा था ? जिस मिट्टी में से किसी देवता की मूर्ति मिल जाए, वहां मन्दिर बन जाता है तू मन्नू देवता मिल गया तो मेरा पेट मन्दिर बन गया...।'' और मूर्ति को अध्र्य देने वाले जल के समान पूजा की आंखों में पानी भर आया, ''मन्नू, मैं तुम्हारे लिए फूल चुनने जंगल में जाती हूं। बहुत बड़ा जंगल है, बहुत भयानक, चीतों से भरा हुआ, भेडिय़ों से भरा हुआ, सांपों से भरा हुआ...।''
और पूजा के शरीर का कम्पन, उसकी उस हथेली में आ गया, जो मन्नू की पीठ पर पड़ी थी...और अब वह कम्पन शायद हथेली में से मन्नू की पीठ में भी उतर रहा था।
उसने सोचा मन्नू जब बड़ा हो जाएगा, जंगल का अर्थ जान लेगा, तो मां से बहुत नफऱत करेगा तब शायद उसके अवचेतन मन में से आज का दिन भी जागेगा, और उसे बताएगा कि उसकी मां किस तरह उसे जंगल की कहानी सुनाती थी  जंगल के चीतों की, जंगल के भेडिय़ों की और जंगल के सांपों की तब शायद...उसे अपनी मां की कुछ पहचान होगी। पूजा ने राहत और बेचैनी का मिला-जुला सांस लिया। उसे अनुभव हुआ जैसे उसने अपने पुत्र के अवचेतन मन में अपने दर्द के एक कण को अमानत की तरह रख दिया हो...
पूजा ने उठकर अपने लिए चाय का एक गिलास बनाया और कमरे में लौटते हुए कमरे की दीवारों को ऐसे देखने लगी जैसे वह उसके व उसके बेटे के चारों ओर बनी हुई किसी की बहुत ही प्यारी बांहें हों...उसे उसके वर्तमान से भी छिपाकर बैठी हुई...
पूजा ने एक नजऱ कमरे के उस दरवाज़े की तरफ़ देखा जिसके बाहर उसका वर्तमान बड़ी दूर तक फैला हुआ था...
शहर के कितने ही गेस्ट हाउस, एक्सपोर्ट के कितने ही कारखाने एअर-लाइन्स के कितने ही दफ़्तर और साधारण कितने ही कमरे थे, जिनमें उसके वर्तमान का एक-एक टुकड़ा पड़ा हुआ था...
परन्तु आज बृहस्पतिवार था जिसने उसके व उसके वर्तमान के बीच में एक दरवाज़ा बन्द कर लिया था।
-  अमृता प्रीतम
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