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संदेह और भय को निरस्त करने की साधना

हमारे व्यवहार की मधुरता में बाधा डालने वाले दो कारण तत्व हैं, संदेह और भय। जहां संदेह और भय नहीं है, वहां संबंध अच्छा होता है और व्यवहार भी।
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स्वस्थ मन से स्वस्थ शरीर का निर्माण

तन और मन का गहरा संबंध है। एक स्वस्थ तो दूसरा भी स्वस्थ। एक रोगी, तो दूसरा भी रोगी। दोनों एक-दूसरे पर निर्भर है। असल में शारीरिक स्थितियों और बाहरी घटनाओं से मन प्रभावित होता है और मानसिक स्थितियों और घटनाओं से तन प्रभावित होता है।...
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सामूहिक चिंतन ही स्वस्थ समाज का निर्माण

इस प्रकार आज विश्व में जहां भी विषम परिस्थितियां हैं, उनके लिए विश्व के लोगों की सामूहिक सोच उत्तरदायी है। दूसरे लोगों के प्रति, दूसरे धर्म व संप्रदायों के अनुयायियों के प्रति तथा दूसरे राष्ट्रों और क्षेत्रों के लोगों के प्रति असहिष्णुता तथा अस्वीकृति के जो भाव हमारे भीतर बसे हुए हैं, वही इस विश्व में तनाव का प्रमुख कारण हैं। क्या यह स्थिति अपरिहार्य है? इसको टाला नहीं जा सकता?...
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सुख बिना दुख नहीं, दुख बिना सुख नहीं

ईसा मसीह ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि हे प्रभु, हमें बुराइयों से बचा, पर परीक्षा में न डाल। वह जानते थे कि मनुष्य बहुत डरपोक है। उसे शरीर से इतना मोह है कि प्राण त्यागना तो दूर, थोड़ा सा शारीरिक कष्ट सहना पड़े, कोई आर्थिक क्षति हो जाए या इच्छापूर्ति में कोई प्रतिरोध दिखाई पड़े, तो वह विचलित हो जाता है। महर्षि पतंजलि ने योगशास्त्र में पांच क्लेशों का वर्णन किया है......
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सक्सेस मंत्र आपको खास बना देती है आपकी ह्यूमैनिटी

कभी ऐसा न सोचें कि जरूरत पडऩे पर वह व्यक्ति आपकी कोई मदद नहीं करेगा। और न ही कभी मन में बदले की भावना पालें। ऐसा करने से आप अपनी कीमती ऊर्जा को बेकार की चीजों में उलझाए रखेंगे। ...
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बड़े बड़ाई ना करें, बड़े न बोलें बोल

इस दुनिया में सबकी नजर दूसरों पर है। यदि हममें प्रतिभा है तो उसकी कद्र अवश्य होगी। जहां शहद हो, वहां चींटियां अवश्य आती हैं। खुशबू और प्रतिभा को छुपाकर नहीं रखा जा सकता। ...
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कृष्ण ने अपने परम सखा को क्लीव क्यों कहा था

पिछले दिनों एक नेता पर बलात्कार का आरोप लगा तो उसने कहा कि यह आरोप गलत है, क्योंकि वह नपुंसक है। इससे पहले एक तथाकथित ...
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सृजन में करें शक्ति का प्रयोग

इस संसार में प्रत्येक प्राणी और प्रत्येक पदार्थ का अस्तित्व तभी तक है, जब तक उसमें कोई शक्ति है। जगत में एक भी पदार्थ ऐसा ...
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प्रकृति की रक्षा करना ही हमारा धर्म है

प्रकृति हमें बहुत कुछ देती है। हम जो भी है वह प्रकृति की वजह से ही है। हमें यह ध्यान रखना जरूरी है कि बिना प्रकृति हम अपनी कल्पना नहीं कर सकते। ऐसे में हमारे लिए प्रकृति की रक्षा करना बेहद जरूरी है और यह हमारा धर्म है। ...
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चरित्र ही किसी को सभ्य बनाता है

चरित्र निर्माण की इस प्रक्रिया से जहां यह निर्धारित होता है कि कोई व्यक्ति आगे चलकर कैसा बनेगा, वहीं यह भी तय होता है कि ...
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सत्य और प्रेम से बदलेगा जीवन

वाणी और कर्म की एकता साधनी चाहिए। मन , वाणी और कर्म की एकता में लोभ और अहंकार जैसी बातें बहुत बाधाएं डालती हैं। इनके कारण हमारे व्यक्तित्व का उचित विकास नहीं हो पाता है। सत्य को वाणी का तप कहा गया है। इसका तात्पर्य है कि सत्य बोलने वाले व्यक्ति का मन निर्मल होना चाहिए। उसमें किसी से दुराव छिपाव या चोरी का भाव नहीं होना चाहिए। ...
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प्रेम को छुपाओ मत कह दो

एक रात को मैंने एक पुस्तक पढ़ी और उसके बाद मुझे अपराधबोध हुआ। मुझे लग रहा था कि उस पुस्तक में   लालन-पालन की जो तकनीकें ...
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स्वयं से प्यार

कोई भी व्यक्ति स्वयं से प्रेम नहीं करता। क्या तुमने कभी इसके बारे में सोचा है? क्या तुम स्वयं से प्रेम करते हैं? क्या तुम्हारे ...
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आत्म आलोचना की जड़

हमने खुद को दोष देना कहां से सीखा? हमने इसे दूसरे से सीखा है। अपने माता-पिता, शिक्षकों और बड़े भाई-बहनों से हमें हजारों नकारात्मक संदेश ...
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उपदेश नहीं, सच्च्े उदाहरण से सीखाएं

प्रश्न : हम बच्चों में किस तरह ऐसे संस्कार डालें कि वे शांति के महत्व को पहचानें और उसके लिए प्रयास करें? महाराज जी : ...
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अंधेरे का बंदी और रोशनी का साक्षी

प्लेटो एक ग्रीक दार्शनिक थे। उन्होंने बड़ी सुंदर कल्पना की है। कल्पना यह है कि पूरी मानवता एक गुफा के अंदर कैद है। वह वहां ...
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मनु स्मृति में पेड़ काटने पर दंड का विधान है

मत्स्य पुराण में कहा गया है कि लोक कल्याण की दृष्टि से दस कुओं के समान एक बावड़ी का महत्व है, दस बावडिय़ों के समान ...
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काम सौंपना सीखें

कोई भी आदमी सब कुछ नहीं कर सकता। बहरहाल, कई लोग हर काम खुद करने की कोशिश करते हैं। जाहिर है वे असफल होते हैं। ...
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धर्म-कर्म करने की आवश्यकता क्यों?

जीवन के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं- ज्ञान और दर्शन। ये दोनों ढंके हुए हैं, आवृत्त हैं। ज्ञान भी आवरण से मुक्त नहीं है और दर्शन ...
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यह कैसी विडंबना?

 किसी ने मुझे विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंहलजी द्वारा लिखित पुस्तक मनुस्मृति की एक प्रति भेजी। पढ़कर मन आल्हादित हो उठा। आजकल की ...
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