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शिव मंडली का सैर सपाटा

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मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, अपने  मंत्रियों, अधिकारियों और उनकी पत्नियों तथा बच्चों का दल ग्यारह दिवसीय विदेश यात्रा से लौट आया है। इस दल ने इटली, जर्मनी और न्यूजीलैण्ड का दौरा कर विदेशी निवेशकों को मध्यप्रदेश आने का न्यौता दिया। जब ये निवेशक यहां आएंगे, तब सरकार द्वारा इन्वेस्टर्स मीट का आयोजन किया जाएगा। शिव मंडली के विदेश दौरे पर शुरू से ही सवाल उठाए जा रहे थे। दौरे में मुख्यमंत्री और अधिकारियों की पत्नी के साथ-साथ बच्चे भी गए थे। इनका विदेशी निवेशकों से क्या वास्ता रहा? अपने पिछले कार्यकाल में भी शिवराज ने अपने पसंदीदा अफसरान के साथ विदेश दौरे किए थे। इसके बाद प्रदेश में इन्वेस्टर्स मीट के पांच आयोजन किए गए थे, जिन पर करोड़ों रुपए फूंक गए थे। इन इन्वेस्टर्स मीट में सरकार ने करोड़ों के एमओयू साइन किए जाने का दावा किया था। इनमें से कितने एमओयू सार्थक रहे? सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं है।
सवाल यह है कि जब पिछले बार किए गए विदेश दौरे और इन्वेस्टर्स मीट का कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला, तो फिर से विदेश दौरे करने की क्या तुक थी? क्या यह विकास के सब्ज़बाग दिखाकर सैर सपाटा करना नहीं था? इससे पहले सरकार को यह बताना था कि पिछले विदेश दौरे और इन्वेस्टर्स मीट आयोजन से प्रदेश में कितने उद्योग स्थापित हुए? ऐसा नहीं किया गया, जिसका सीधा अर्थ यह है कि सरकार विकास के सपने दिखाकर जन-धन पर मौज-मजे कर रही है। जिस प्रदेश का खजाना खाली हो और  जो गले-गले तक कर्ज में डूबा हो, उस प्रदेश के मुख्यमंत्री, मंत्री, अधिकारियों का पत्नियों-बच्चों के साथ विदेश दौर करना कहां तक न्यायसंगत है?
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश में उद्योग स्थापित करवाना चाहते हैं, किंतु उद्योगों के लिए जो मूलभूत सुविधाएं जरूरी हैं, उनके लिए उनकी सरकार कुछ नहीं कर रही है। प्रदेश में न पर्याप्त पानी है और न ही सड़कें और बिजली की तो यह हालत है कि मेंटनेंस के नाम पर राजधानी में ही बिजली कटौती की जा रही है। गांवों-कस्बों में तो छह घंटे तक भी बिजली के दर्शन नहीं हो रहे हैं। शिवराज सिंह खराब कोयले के नाम पर न्याय यात्रा की नौटंकी भी कर चुके हैं और अब उनकी सरकार विदेश से ऐसा कोयला खरीद रही है, जिससे विद्युत संयंत्र के बॉयलर फटने की आशंका जताई गई है। जिस कंपनी के मार्फत यह कोयला खरीदा जा रहा है, वह तीन रुपए यूनिट की बिजली सरकार को सात रुपए यूनिट में बेच चुकी है। इस मामले में तत्कालीन मुख्य सचिव राकेश साहनी पर भी गंभीर आरोप लगे थे, किंतु सरकार ने उसकी जांच नहीं करवाई। फिर अब उसी विवादित कंपनी से विदेशी कोयला खरीदना कितना उचित है?
मध्यप्रदेश में सड़क, पानी और बिजली की स्थिति को देखते हुए देश-प्रदेश के उद्योगपति ही यहां उद्योग लगाने को तैयार नहीं हंै। ऐसे में विदेशी निवेशक क्या यहां झक मारने आएंगे? हां, वे आएंगे जरूर, इन्वेस्टर्स मीट के नाम पर वे बड़ी होटलों में ठहरेंगे, महंगा खाना खाएंगे और मंच पर भाषणबाजी करने के बाद हाथ पोंछ कर निकल जाएंगे। कुछ निवेशक एमओयू साइन करेंगे और सरकार उन्हें उपलब्धि बता कर अपनी पीठ थपथपाएगी, किंतु होगा कुछ नहीं। अलबत्ता सरकारी खजाने पर कुछ करोड़ रुपयों का बोझ जरूर बढ़ जाएगा। यह है शिवराज सरकार के प्रदेश के विकास का सच, जिसमें डुगडुगी तो खूब पीटी जाती है, मगर हाथ कुछ नहीं आता है? क्या इसी तरह बनेगा स्वर्णिम मध्यप्रदेश?
यदि मुख्यमंत्री वास्तव में प्रदेश का विकास करना चाहते हैं तो उन्हें आसमानी सोच से ज़मीनी धरातल पर उतरना होगा। उनमें प्रदेश के औद्योगिकीकरण का माद्दा है तो प्रदेश में सड़क निर्माण को प्राथमिकता देनी होगा। जिन क्षेत्रों में औद्योगिक इकाइयां लगाने की संभावनाएं हैं, वहां बड़े-बड़े तालाब खुदवाने होंगे और सबसे अधिक ध्यान विद्युत उत्पादन पर देना होगा। भाजपा जब पिछली बार सत्ता में आई थी, तब उसने बिजली संकट सौ दिन में हल करने का वादा किया था। पूरे पांच साल तक सत्ता में रहने के बाद भाजपा अपना वादा पूरा नहीं कर पाई। इसके विपरीत स्थिति बद से बदतर होती चली गई। क्या शिवराज सिंह चौहान में इतना नैतिक साहस है कि वे इस नाकामी की जिम्मेदारी स्वीकार करें?
सच पूछा जाए तो इस मुख्यमंत्री के पास विकास का कोई नजरिया है और न ही कुछ करने की कुव्वत। सिर्फ नौटंकियां कर सुर्खियों में बने रहने का श$गल उन पर सवार है। कभी सायकल चलाने, कभी कोयला उठाकर न्याय यात्रा करने, कभी अपना मध्यप्रदेश बनाने और कभी स्वर्णिम मध्यप्रदेश की नौटंकियों की हकीकत आम जनता देख चुकी है। ताजा विदेश यात्रा के बाद अब इन्वेस्टर्स मीट की नौटंकी होगी और आम जनता फिर ठगी जाएगी। ऐसी सरकार जितनी जल्दी जाए, उसी में प्रदेश की भलाई है।

- महेश बागी

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