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जब वह अच्छी बेटी नहीं कहलाती

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पत्रकार निरुपमा पाठक की मौत ने साबित कर दिया है कि शिक्षित और संभ्रांत मिडिल क्लास अंदर से कितना पोंगापंथी और निर्मम है। सच्चाई यह है कि औरतों को लेकर उसका नजरिया खाप पंचायतों से बहुत अलग नहीं है। फर्क केवल इतना है कि मध्यवर्ग स्त्रियों को स्वतंत्रता देने का दिखावा करता है। वह खाप पंचायत की तरह अपनी बेटियों को मारने की हिम्मत तो नहीं रखता, पर उन्हें मानसिक रूप से प्रताडि़त कर मौत से कहीं ज्यादा कड़ी सजा देता है। गैर बिरादरी में शादी करना, दूसरी जाति के शख्स से कोई खास रिश्ता कायम करना हमारे समाज में अब भी गुनाह है, खास कर तब, जब ऐसा घर की बेटी करे।
मर्यादा के नाम पर
मध्यवर्ग का पाखंड देखिए, बेटी के बॉयफ्रेंड के लिए घरों में जगह नहीं होती, मगर बेटे की गर्लफ्रेंड को लेकर कोई खास आपत्ति नहीं की जाती। अगर उसका फोन आ जाए तो घर में कोई हंगामा नहीं होता, लेकिन बेटी के लिए किसी लड़के का फोन आ जाए तो तूफान खड़ा हो जाता है। बेटी से तरह-तरह के सवाल किए जाते हैं, उसे नसीहतें दी जाती हैं, चेतावनी दी जाती है। और ऐसा करते हुए घर की इज्जत, मान-मर्यादा और कथित संस्कारों का हवाला दिया जाता है। आज मिडल क्लास हाई सोसाइटी के समकक्ष खड़ा होने की होड़ में लगा हुआ है। वो अच्छे कपड़े पहनना चाहता है, महंगी गाडिय़ों में घूमना चाहता है, शानदार पार्टियों में नाचना चाहता है मगर विचार के स्तर पर बदलना नहीं चाहता। सामने वाले घर में अगर ऊंची आवाज में गाने बजें तो दरवाज़ा पीट कर वह पड़ोसी को सिविक सेंस का पाठ पढ़ा डालता है। लेकिन मौका लगते ही खुद दूसरों के घर के सामने कूड़ा फेंकने से बाज नहीं आता। वह रिएलिटी शोज में टीवी पर थिरक रहे बच्चों को देख कर कभी मुस्कराता है, कभी रोता है। किसी की जीत पर खुश, तो किसी की हार पर उदास होता है लेकिन अपनी ही बेटी की डांस क्लासेस ज्वाइन करने की मांग को सिरे से खारिज कर देता है।
अलग-अलग मापदंड
एक मिडिल क्लास परिवार के मां-बाप अपनी संतानों को पढ़ाते-लिखाते हैं, इस उम्मीद के साथ कि वे आगे चलकर उनका नाम 'रोशनÓ करेंगी, उनकी मर्जी से घर बसाएंगी। अगर बेटा है तो अच्छा दहेज लेंगे अगर बेटी है तो रुखसत कर के अपना फजऱ् उतारेंगे। मध्यवर्गीय समाज में अच्छी औलादें नहीं होतीं, यहां अच्छा बेटा या अच्छी बेटी होती है। अच्छा बेटा वो है, जो नशा न करे, सड़क पर मारपीट न करे, मन लगाकर पढ़े और वही कॅरियर अपनाए जो पैरंट्स चाहें। फिर शादी के बाद बीवी की तरफ से न बोले और माता-पिता का साथ देते हुए कभी कभार बीवी को डांट फटकार भी लगाता रहे। लेकिन अच्छी बेटी बनने की योग्यता की सूची और भी लंबी है।
अच्छी बेटियां वो समझी जाती हैं जो को-एजुकेशन में तो पढ़ें लेकिन लड़कों से बातचीत न करें। अपने रिश्तेदारों के बीच गंवार न लगे पर ज्यादा मॉड भी न हों। शादी के बाद नौकरी का ख्याल दिल से निकाल कर अपनी सारी पढ़ाई और उपलब्धियों को भूल कर परिवार की देखरेख में लग जाएं। अगर वे जॉब करना चाहें, तो करें पर शाम 6 बजे तक घर जरूर आ जाएं। उन्हें घर का कामकाज भी अच्छे से आना चाहिए। वे छुट्टी के दिन किचन में हाथ बंटाए, खाना अच्छा पकाएं और हां, वे अंग्रेजी भी अच्छी बोलती हों।
अगर बेटे ने किसी को पसंद किया और घर से दूर जाकर अपनी जिंदगी बसा ली तो कुछ रोने-धोने, कुछ इमोशनल ब्लैकमेलिंग के बाद बहू को आधे मन से ही सही, अपना लिया जाता है। पर अगर बेटी ऊंची उड़ान भरने लगे, अगर वह प्यार मोहब्बत के चक्कर में पड़ जाए तो सवाल उठता है क्या करें? इज्जत के नाम पर उसकी बलि चढ़ा दें? हां क्यूं नहीं, क्योंकि इज्जत बड़ी मुश्किल से मिलती है, दुनिया में इज्जत कमाने में बरसों लग जाते हैं पर गंवाने में एक पल लगता है।
वैसे भी मिडिल क्लास के पास इज्जत के अलावा और है भी क्या। असल में मिडिल क्लास के पास आंख नहीं है कि वो बदलती दुनिया को देख सके, कान नहीं है कि मासूम ख्वाहिशों को सुन सके पर हां नाक जरूर है बेहद ऊंची और नुकीली। यह नाक ही उसका हथियार है। अगर किसी ने पंख फैला कर उडऩा चाहा तो इसी नुकीली नाक से उसके परों को काट दिया जाता है।  निरुपमा ने अपना शहर छोड़ते वक्त न जाने कितने ख्वाब सजाए होंगे। सोचा होगा जिंदगी में कुछ कर दिखाऊंगी सबसे जीत जाऊंगी। उसकी ज्यादातर सहेलियां, जिनके साथ वह बचपन में खेली, शादी के बंधन में बंध चुकी हैं या फिर किसी अच्छे रिश्ते के इंतजार में हैं। पर निरुपमा अलग थी। कुछ अलग करना चाहती थी। आगे बढऩा चाहती थी। उसने सोचा था अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जिएगी। माता-पिता ने हमेशा ही उसका साथ दिया, पढ़ाई के लिए कभी नहीं रोका। आगे बढऩे के रास्ते में रुकावट नहीं बने। उसके यहां लड़कियों को ज्यादा नहीं पढ़ाया जाता, फिर भी उसके पिता ने उसे घर से इतनी दूर भेजा। घर छोड़ते वक्त मन में एक डर था, पर आगे की जिंदगी के ख्वाब उसे अपनी तरफ खींच रहे थे।
दूर है मंजिल
उसके पिता का समाज में काफी रुतबा था। देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान में उनकी बेटी का दाखिला उनके रुतबे में इजाफा करता। पर रुतबे को बढ़ाने वाला प्लान ही उनके रुतबे को ले डूबने पर तुला था। निरुपमा की मौत सिर्फ एक इंसान की मौत नहीं है बल्कि उस सपने का खात्मा है, जो मुद्दतों बाद आम लड़कियों ने देखना शुरू किया है। सच कहा जाए तो लड़कियों को थोड़ी बहुत हासिल स्वतंत्रता दरअसल एक छलावा है। अपनी स्वतंत्र अस्मिता, अपनी अलग पहचान अभी भी लड़कियों के लिए एक स्वप्न ही है। जो स्त्री-पुरुष समानता के हिमायती हैं जो औरतों को उसका हक दिलाना चाहते हैं, वे इस पहलू पर गौर करें।  ठ्ठ फौजिया रियाज

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