कहां गया वह मानवीय चेहरा
अपने दूसरे कार्यकाल का पहला साल पूरा करने के बाद यूपीए सरकार इस बात के लिए अपनी पीठ जरूर थपथपा सकती है कि उसने विपक्ष के हर दांव की हवा निकाल कर, उसके खेमे में तोडफ़ोड़ कर फिलहाल सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखी है, लेकिन सच यह है कि वह उस आम आदमी का विश्वास खोती जा रही है, जिसके भीतर ढेरों आशाएं जगाकर वह दोबारा दिल्ली का सिंहासन पाने में कामयाब हुई थी। अपने पहले कार्यकाल में नरेगा और दूसरी कुछ योजनाओं के जरिए यूपीए ने खुद को गांवों और गरीबों के हमदर्द के तौर पर पेश किया था। साधारण जन ने सरकार के रवैये में अपने लिए उम्मीदें देखीं और इसे एक बार फिर सत्ता सौंप दी।
मंत्रियों का बड़बोलापन
ऐसा लग रहा था कि सरकार ने जो कार्य शुरू किए थे, उन्हें अब वह मजबूती से आगे बढ़ाएगी। उसने जो सदिच्छाएं दिखाईं, वे कार्यरूप में परिणत होंगी पर हुआ उलटा। यूपीए-2 की शुरुआत के साथ ही सरकार और जनता के बीच एक स्पष्ट फांक पैदा हो गई। आज अनेकमंत्री अपने रंग-ढंग में जन प्रतिनिधि से ज्यादा नौकरशाह नजर आ रहे हैं। हालांकि यह स्थिति कमोबेश यूपीए-1 के समय से ही बन गई थी। तब भी एक तरह की 'अराजनीतिकÓ सरकार नजर आती थी पर आज की तरह उसमें बेरुखी नहीं दिखती थी, न ही उसके नुमाइंदों में इस कदर बड़बोलापन था। लेकिन यूपीए-2 के कुछ मंत्री तो जनता के प्रति संवेदनशील रुख अपनाने के बजाय अपने आचरण और बयानों से उसके जख्मों पर नमक छिड़कने में लगे हुए हैं, जिससे सरकार की पहले वाली प्रो-पीपल इमेज का मुलम्मा उतरने लगा है।
संवेदनशीलता की कमी
सबसे पहले तो केंद्रीय मंत्रियों एसएम कृष्णा और शशि थरूर (अब भूतपूर्व) के महंगे होटलों में ठहरने की बात सामने आई। उन्होंने अपने इस कदम को सही ठहराकर अपनी ही पार्टी के सादगी अभियान को कठघरे में खड़ा कर दिया। थरूर यहीं तक नहीं रुके, उन्होंने कैटल क्लास वाली टिप्पणी करके आम आदमी की भावनाओं पर गहरा आघात किया। उसके बाद महंगाई को लेकर कृषि मंत्री शरद पवार ने जो रवैया दिखाया उससे भी जनता को काफी ठेस लगी। वह लोगों को आश्वासन कहां से देते, उलटे और डराते ही रहे। वह चीनी की कीमत बढऩे की बात करते रहे और कीमत बढ़ती रही। जब उनसे पूछा गया कि यह सिलसिला कब तक चलेगा तो उन्होंने कहा कि वह कोई ज्योतिषी तो हैं नहीं जो भविष्यवाणी कर सकें। रेल मंत्री ममता बनर्जी ने तो अपने महकमे को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं। सरकार के पहले महीने में बीस दिन वह दिल्ली से गायब रहीं। अब भी वह राजधानी में नहीं रहना चाहतीं। मंत्रिमंडल की बैठकों में उनकी कोई खास दिलचस्पी नहीं है। रेलवे से जुड़े कई अहम फैसले उनकी गैर मौजूदगी में लिए गए। पिछले दिनों जब नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ की घटना घटी तो उन्होंने लोगों के आंसू पोंछने के बजाय उलटे उन्हीं के ऊपर दोष मढ़ दिया। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने चीन में गृह मंत्रालय की आलोचना कर अपनी ही सरकार की स्थिति हास्यास्पद बना दी। ऐसा करके वह एक चीनी कंपनी की तरफदारी करते हुए नजर आए। कुछेक अपवाद को छोड़ दें तो ज्यादातर मंत्री न तो खुद को कुशल प्रशासक साबित कर पा रहे हैं, न जिम्मेदार राजनेता। कुछेक मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के भी आरोप हैं। मंत्रियों को क्या कहें, खुद प्रधानमंत्री ने अब तक ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे साधारण आदमी इस सरकार से अपना जुड़ाव महसूस कर सके। महंगाई जैसे अहम मुद्दे पर उन्होंने पल्ला झाड़ लिया। देश जानता है कि पीएम कई मामलों में लाचार हैं, पर उनसे दो मीठे बोल बोलना भी गवारा न हुआ। कई अखबारों और चैनलों के सर्वे में उन्हें सफल प्रधानमंत्री बताया गया है। जो पीएम महत्वपूर्ण फैसले न ले सके, जो अपने ही भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई न कर सके, जो महंगाई की जिम्मेदारी कृषि मंत्री पर टाल दे, जो एक साल में संसद सत्र के दौरान तीन अहम मौकों पर अनुपस्थित रहे, वह भी अगर लोकप्रिय है, तो समझा जा सकता है कि देश में नेतृत्व का संकट कितना गहरा है। डॉ. सिंह ने अमेरिका से दोस्ती मजबूत करने और पाकिस्तान से संबंध सुधारने पर ज्यादा जोर दिया है जो कि जरूरी हो सकता है, लेकिन उन्होंने इतनी ही ऊर्जा घरेलू समस्याओं को दूर करने में खर्च की होती तो शायद इसका ज्यादा फायदा होता।
आज महंगाई के मोर्चे पर सरकार धराशायी नजर आ रही है। आतंकवादी घटनाओं पर रोक तो लगी है लेकिन दंतेवाड़ा में दूसरी बार अपनी खूनी कार्रवाई से माओवादियों ने साबित कर दिया है कि प्रशासन का उन पर कोई जोर नहीं चल रहा। बहरहाल इस स्थिति में भी जनता से संवाद बनाने की जिम्मेदारी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी महासचिव राहुल गांधी ने संभाल रखी है। सोनिया गांधी सरकार के मानवीय चेहरे को बचाए रखना चाहती हैं। लेकिन यह काम इतना आसान नहीं रह गया है। एक जवाबदेह राजनेता के रूप में वह जिस रूप में सोच रही हैं, उसी रूप में उनकी 'अराजनीतिकÓ सरकार नहीं सोचती।
मुश्किल है राह
सूचना के अधिकार को लेकर उनमें और प्रधानमंत्री के बीच मतभेद को इसी रूप में देखा जा सकता है। सोनिया गांधी ने इस कानून को लागू कराने में अहम भूमिका निभाई थी लेकिन मनमोहन सिंह और उनकी टीम इसमें संशोधन कर जनता को मिले अधिकार में कटौती करना चाहती है। इसी तरह फूड सिक्युरिटी बिल को लेकर सोनिया गांधी के प्रस्तावों पर वित्त मंत्रालय सवाल उठा रहा है। प्रश्न है कि क्या सोनिया गांधी यूपीए सरकार को जनता के प्रति संवेदनशील बना पाएंगी? क्या वह अपने सहयोगी दलों के मंत्रियों को जवाबदेह बना पाएंगी? सियासी मजबूरियों के बीच एक बेहतर सरकार देना उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। अगर सरकार और जनता के बीच पैदा हो रही खाई को पाटने की तत्काल कोशिश नहीं की गई तो यूपीए सरकार के लिए आगे की राह और मुश्किल हो सकती है।
ठ्ठ संजय कुंदन



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