...लेकिन इन्हें शर्म नहीं आती
केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री प्रदीप जैन ने मय सबूत बता दिया है कि मध्यप्रदेश में रोजगार गारंटी योजना का पैसा नौकरशाही अय्याशी में फूंक रही है। यदि इस सरकार में शर्म नामक कोई चीज होती तो मुख्यमंत्री प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री को बाहर का रास्ता दिखा देते, लेकिन निर्लज्ज मंत्री अब जांच का हवाला देकर अपना दामन बचाने की कोशिश कर रहे हैं। उधर इंदौर के भूमि घोटाले की जांच लोकायुक्त ने शुरू कर दी है। अगर कांग्रेसी नेता और कोर्ट सजग नहीं होती तो यह मामला फाइलों में ही दफन रहता और लोकायुक्त तथा आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो जैसी शाखाएं मुंह ढांके सोती रहतीं। सौ करोड़ की सरकारी जमीन एक करोड़ रुपए में दिए जाने के इस मामले में सात साल से सरकार कंबल ओढ़े रही और अब भी कुछ कार्रवाई होगी, इसकी संभावना शून्य नजर आ रही है। अब तो आम जनता भी यह मानने लगी है कि जांच के नाम पर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। यदि ऐसा नहीं है तो डंपर कांड की जांच अब तक पूरी क्यों नहीं हुई? कोर्ट ने तो एक माह में जांच रिपोर्ट देने को कहा था और खुद शिवराज सिंह ने कहा था कि एक माह बाद दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा, लेकिन क्या हुआ? भ्रष्टाचार की सरकार में रिश्वत का दूध पानी की तरह समाहित हो गया। तीन साल में भी डंपर कांड की जांच रिपोर्ट सामने न आने से लगता है कि कहीं न कहीं दाल में काला है।
भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी का यह इकलौता मामला नहीं है। शिवराज सिंह ने गत दिनों पुलिस महानिरीक्षकों की बैठक में निर्देश दिए थे कि माफियाओं के खिलाफ सख्ती से अभियान चलाएं। यह अभियान कितना परवान चढ़ा, इसका एक मामला सामने आया है। बालाघाट में प्रशासन ने छापामार कार्रवाई कर मैगनीज का अवैध जखीरा पकड़ा। कायदे से यह कार्रवाई करने वाले अधिकारियों को पुरस्कृत किया जाना था, किंतु दस घंटे में ही उनके तबादले कर दिए गए, क्योंकि खनिज माफिया न सिर्फ भाजपा नेता है, बल्कि कोढ़ में खाज की तरह एक मंत्री का भांजा भी है। जाहिर है कि घुटना पेट की तरफ मुड़ा और दबंग अधिकारियों को तबादले का दंश झेलना पड़ा। भाजपा के नेता प्रदेश को किस तरह लूट रहे हैं, यह मुरैना में सामने आ चुका है, जहां अवैध खनन रोकने गए कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक पर गोलियां बरसाई गईं। इस मामले में कोई कार्रवाई इसलिए नहीं हुई, क्योंकि उक्त खनिज माफिया भाजपा का पूर्व मंत्री है। राजधानी से सटे होशंगाबाद जिले में नर्मदा से रेत खनन का मामला तो आए दकन सुर्खियों में रहता है, किंतु प्रशासन इसलिए नतमस्तक हैं, क्योंकि खनन करने वाले मुख्यमंत्री के रिश्तेदार बताए जाते हैं। इन सबसे बेखबर शिवराज सिंह नीरो की तरह चैन की बंसी बजा रहे हैं। स्वर्णिम मध्यप्रदेश बनाने के लिए वे कभी आदिवासियों के साथ गेड़ी नृत्य करने लगते हैं तो कभी गांव में खटिया पर बैठकर अमरूद काटने लगते हैं। इन हरकतों से प्रदेश का कितना विकास हो रहा है, यह सब जानते हैं। बस, शिव को पता नहीं है। भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में जब नरेंद्र मोदी छाए रहते हैं तो अपने शिव को जलन होने लगती है। इसलिए वे फर्जीवाड़ा कर यह बता देते हैं कि प्रदेश में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों का अनुपात बढ़ गया है और इस फर्जीवाड़े पर थोथी प्रशंसा पाकर गदगद हो जाते हैं। प्रदेश में कुपोषण से बच्चों की मौत का ग्राफ बढ़ता जाता है और सरकार विधानसभा में झूठे आंकड़े पेश कर अपनी उपलब्धि का ग्राफ बढ़ा बता देती है। इसी विधानसभा में महिला एवं बाल विकास मंत्री गलत जानकारी देकर भ्रष्ट नौकरशाही का बचाव करती दिखाई देती हैं। जिस प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति हाशिये पर हो, कुपोषण से बच्चे मर रहे हों, पानी के लिए हत्याएं हो रही हों, नौकरशाही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई हो, उस प्रदेश में मुख्यमंत्री विकास का दावा करें, तो हंसी आती है। वास्तविकता यह है कि मध्यप्रदेश के संसदीय इतिहास में इतनी भ्रष्ट, गैर जिम्मेदार, निकम्मी और पाखंडी सरकार पहले कभी नहीं रही। ताज्जुब इस बात का है कि सब कुछ देखते हुए भी भाजपा आलाकमान खामोश है। यह सरकार लालकृष्ण आडवाणी से लेकर नितिन गडकरी तक को धोखा दे चुकी है। फिर भी कोई कदम नहीं उठाया गया। इससे लगता है कि पार्टी आलाकमान ने मध्यप्रदेश से भाजपा का बोरिया बिस्तर समेट लेने की तैयारी कर ली है। यदि ऐसा नहीं है तो शिवराज सिंह जैसा शख्स मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज क्यों है?
भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी का यह इकलौता मामला नहीं है। शिवराज सिंह ने गत दिनों पुलिस महानिरीक्षकों की बैठक में निर्देश दिए थे कि माफियाओं के खिलाफ सख्ती से अभियान चलाएं। यह अभियान कितना परवान चढ़ा, इसका एक मामला सामने आया है। बालाघाट में प्रशासन ने छापामार कार्रवाई कर मैगनीज का अवैध जखीरा पकड़ा। कायदे से यह कार्रवाई करने वाले अधिकारियों को पुरस्कृत किया जाना था, किंतु दस घंटे में ही उनके तबादले कर दिए गए, क्योंकि खनिज माफिया न सिर्फ भाजपा नेता है, बल्कि कोढ़ में खाज की तरह एक मंत्री का भांजा भी है। जाहिर है कि घुटना पेट की तरफ मुड़ा और दबंग अधिकारियों को तबादले का दंश झेलना पड़ा। भाजपा के नेता प्रदेश को किस तरह लूट रहे हैं, यह मुरैना में सामने आ चुका है, जहां अवैध खनन रोकने गए कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक पर गोलियां बरसाई गईं। इस मामले में कोई कार्रवाई इसलिए नहीं हुई, क्योंकि उक्त खनिज माफिया भाजपा का पूर्व मंत्री है। राजधानी से सटे होशंगाबाद जिले में नर्मदा से रेत खनन का मामला तो आए दकन सुर्खियों में रहता है, किंतु प्रशासन इसलिए नतमस्तक हैं, क्योंकि खनन करने वाले मुख्यमंत्री के रिश्तेदार बताए जाते हैं। इन सबसे बेखबर शिवराज सिंह नीरो की तरह चैन की बंसी बजा रहे हैं। स्वर्णिम मध्यप्रदेश बनाने के लिए वे कभी आदिवासियों के साथ गेड़ी नृत्य करने लगते हैं तो कभी गांव में खटिया पर बैठकर अमरूद काटने लगते हैं। इन हरकतों से प्रदेश का कितना विकास हो रहा है, यह सब जानते हैं। बस, शिव को पता नहीं है। भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में जब नरेंद्र मोदी छाए रहते हैं तो अपने शिव को जलन होने लगती है। इसलिए वे फर्जीवाड़ा कर यह बता देते हैं कि प्रदेश में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों का अनुपात बढ़ गया है और इस फर्जीवाड़े पर थोथी प्रशंसा पाकर गदगद हो जाते हैं। प्रदेश में कुपोषण से बच्चों की मौत का ग्राफ बढ़ता जाता है और सरकार विधानसभा में झूठे आंकड़े पेश कर अपनी उपलब्धि का ग्राफ बढ़ा बता देती है। इसी विधानसभा में महिला एवं बाल विकास मंत्री गलत जानकारी देकर भ्रष्ट नौकरशाही का बचाव करती दिखाई देती हैं। जिस प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति हाशिये पर हो, कुपोषण से बच्चे मर रहे हों, पानी के लिए हत्याएं हो रही हों, नौकरशाही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई हो, उस प्रदेश में मुख्यमंत्री विकास का दावा करें, तो हंसी आती है। वास्तविकता यह है कि मध्यप्रदेश के संसदीय इतिहास में इतनी भ्रष्ट, गैर जिम्मेदार, निकम्मी और पाखंडी सरकार पहले कभी नहीं रही। ताज्जुब इस बात का है कि सब कुछ देखते हुए भी भाजपा आलाकमान खामोश है। यह सरकार लालकृष्ण आडवाणी से लेकर नितिन गडकरी तक को धोखा दे चुकी है। फिर भी कोई कदम नहीं उठाया गया। इससे लगता है कि पार्टी आलाकमान ने मध्यप्रदेश से भाजपा का बोरिया बिस्तर समेट लेने की तैयारी कर ली है। यदि ऐसा नहीं है तो शिवराज सिंह जैसा शख्स मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज क्यों है?
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