ढोंग और चोचलेबाजी का तिलिस्म
मैं तो लिख-लिख कर थक गया हूं। बार-बार लिखने पर ऐसा लगता है कि मैं भैंस के आगे बीन बजा रहा हूं। मुख्यमंत्री की प्राथमिकताएं क्या हैं, यह समझ में नहीं आता। वे भ्रष्टाचार को मिटाने की बात किस बूते पर करते हैं, जब कि उनके इर्द-गिर्द ही भ्रष्टों का बोलबाला हो। कृष्ण करे तो लीला और दूसरे करें तो गुण्डाई। संभवत: यही सूत्र वाक्य है शिवराज का। उनके अपनों के लिए भ्रष्टाचार और दुराचार की परिभाषा बदल जाती है। इन सब पर पर्दा डालने के लिए शिवराज ढोंग और चोचलेबाजी का तिलिस्म रचते हैं।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान! इस नाम की ·ी प्रतिध्वनि अब आम जनता में पाखंड की प्रतिमूर्ति के रूप में सामने आती है। उनकी लाख कोशिश है कि वे सिर्फ और सिर्फ प्रदेश के विकास के लिए जुटे हुए हैं, उन्हें सिवाय जनता के कल्याण के अलावा और कुछ नहीं सूझता। जनता को अब यह साफ-साफ नजर आने लगा है कि मुख्यमंत्री सिर्फ और सिर्फ नौटंकीबाज और पाखंड की प्रतिमूर्ति हैं। पूरे प्रदेश में शिव बाबू नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के मंजे हुए कलाकार के रूप में सामने आ रहे हैं। मप्र का प्रशासन तंत्र मोटे तौर पर ऐसा नजर आता है मानो पूरे तंत्र में भ्रष्टाचार की दीमक लग गई हो। मैं उन्हें नौटंकीबाज इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जिस घर की औलादें दुष्चरित्र, भ्रष्ट और दुराचारी हो जाएं तो उस घर का बाप समाज में जिस तरह अपनी औलादों के कुकर्मों को छिपाता है और उनकी प्रशंसा के ·कीदे गढ़ता है, वही उपक्रम शिवराज सिंह कर रहे हैं। एक कहावत है कि आप सोते हुए को जगा सकते हैं, लेकिन जो सोने का बहाना कर रहा हो उसे कैसे जगाएंगे। शिवराज को सब मालूम है कि कौन भ्रष्ट है, कौन दूध का धुला है, कौन दूध का नहीं धुला है, कौन कितने पैसे कमा रहा है, कौन दलाल है, कौन भड़वा है। सब मालूम है। फिर भी जिस तरह से एक पाखंडी अपने अंत:करण का निस्पृह भाव प्रदर्शित करता है, वैसा ही वे करते हैं। ऐसा क्यों है? समझ में नहीं आता। मुख्यमंत्री निवास से लेकर सचिवालय तक चंद भ्रष्टों की कोटरी ने उन्हें घेर रखा है। सिर्फ उनको छोड़कर शिवराज पूरी नौकरशाही को भ्रष्ट बताने में जुटे हुए हैं। मैं तो लिख-लिख कर थक गया हूं। बार-बार लिखने पर ऐसा लगता है कि मैं भैंस के आगे बीन बजा रहा हूं। मुख्यमंत्री की प्राथमिकताएं क्या हैं, यह समझ में नहीं आता। वे भ्रष्टाचार को मिटाने की बात किस बूते पर करते हैं, जबकि उनके इर्द-गिर्द भ्रष्टों का बोलबाला हो। कृष्ण करे तो लीला और दूसरे करें तो गुण्डाई। संभवत: यही सूत्र वाक्य है शिवराज का। उनके अपनों के लिए भ्रष्टाचार और दुराचार की परिभाषा बदल जाती है। इन सब पर पर्दा डालने के लिए शिवराज ढोंग और चोचलेबाजी का तिलिस्म रचते हैं।
अभी हाल ही में ऐसे कई घटनाक्रम हुए हैं जिससे जनमानस में प्रदेश सरकार·की छवि धूमिल हुई है, लेकिन कर क्या सकते हैं। अभी तो वे सत्ता में हैं, मध्यप्रदेश उन राज्यों में शुमार हो गया है जहां सर्वाधिक इनकम टैक्स, सीबीआई और सेंट्रल एक्साइज के छापे पड़े हैं। भाजपा के नेता उत्सवधर्मी हो गए हैं। खूब चंदा वसूली कर रहे हैं। नव-सामंतों की तरह अपने जलसों में गोलियां चलवा रहे हैं, लड़कियों के नाच करवा रहे हैं, इससे शिवराज को कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जिस बाप की औलादें बिगड़ जाएं तो वह उनके दुष्कर्मों को ढांकता ही है।
उन्हें किसी की चिंता नहीं है। पाखंड से सराबोर शिवराज की आंखों पर पट्टी नहीं बंधी है। वे ऐसा उपक्रम कर रहे हैं मानो उन्हें कुछ मालूम ही नहीं है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि ऐसा कब तक चलेगा? इसका जवाब आने वाले चुनाव में जनता ही देगी, क्योंकि ये जनता है, सब जानती है।
मप्र बनाओ अभियान की नौटंकी अभी स्थगित है, किंतु एक माह पहले वे नगर निगम के सफाई दरोगा की तरह व्यवहार कर रहे थे। कभी किसी गांव में अचानक हाथ में झाड़ू उठाकर सफाई में जुट जाते हैं तो कभी किसी कॉलेज के सामने लगा होर्डिंग खुद उतरवाने में लग जाते हैं। शिवराज खुद को समग्र स्वच्छ दिखाकर एक आदर्श मुखिया की तस्वीर प्रदर्शित करना तो चाहते हैं लेकिन दरअसल ये बहुत बड़े छलावे का तिलिस्म है और शायद जनता भी अब इसे ठीक तरह से समझने लगी है। इस ढोंग को समझने के लिए इन कुछ उदाहरणों को विस्तार से समझना होगा।
डिण्डौरी के शाहपुर गांव में झाड़ू लगाने की घटना को शिवराज खुद हमेशा बड़े उत्साह से बताते हैं। उनका तर्क हैं कि ‘जैसे ही मैंने शाहपुर में झाड़ू लगाई उसके अगले दिन वे जहां गए, वहां के लोगों ने पूरा गांव साफ कर लिया और कहने लगे आप झाड़ू मत लगाना हमारी नाक कट जाएगी’ जबकि हकीकत यह है कि शिवराज के वहां पहुंचने से पहले ही चापलूस अधिकारियों ने पूरा गांव साफ करवा के गांव वालों को ताकीद कर दी थी कि सारा श्रेय गांव वाले लें, जिससे मुख्यमंत्री प्रसन्न हो जाएं। अब बात मुख्यमंत्री के अश्लीलता के खिलाफ जारी अभियान की। भोपाल के नूतन कॉलेज के सामने एक ब्यूटी पॉर्लर का होर्डिंग जिसमें स्पा का विज्ञापन था, मुख्यमंत्री को अश्लील लगा और उनके निर्देश पर न केवल आनन-फानन में वो होर्डिंग हटवाया गया, बल्कि ब्यूटी पार्लर संचालिका के खिलाफ पुलिस में मामला भी दर्ज कर लिया गया। ऐसे में तय है कि यदि शिवराज आगामी दिनों में खजुराहो जाते हैं तो काम क्रीड़ारत मूर्तियों वाले मंदिर में या तो पर्दा डाल दिया जाएगा या फिर शिवराज बुतभंजक बन खुद ही सारी मूर्तियों को तोडऩा शुरू कर देंगे।
बतौर व्यक्ति शिवराज के आचरण की शुद्धता भले ही सतही तौर पर सराहे जाने लायक दिखे, लेकिन बतौर मुख्यमंत्री तो माहौल बेहद अराजक है। उनके साथ गुड़ में मक्खी की तरह चिपके रहने वाले मंत्रियों और अधिकारियों की अय्याशी और रंगीनमिजाजी पूरी सरकार को बदनाम कर रही है, लेकिन ये या तो शिवराज को दिखता नहीं या वे जानबूझकर आंख मूंदे हुए हैं। शिवराज काबीना के एक मंत्री ने खंडवा के पास मलगांव उत्सव में रशियन डांसर बुलवाकर बैले डांस करवाया। इसमें मंत्री जी ने भी एक गाना गाया। सब कुछ हुआ संत दातार साहब की समाधि के निकट। उन रशियन नृत्यांगनाओं का लिबास और भाव-भंगिमाएं बेहद उत्तेजक थीं। गौरतलब है कि इस कार्यक्रम में भारी तादाद में शिवराज की ‘बहन-बेटियां‘ भी मौजूद थीं जो स्पा के होर्डिंग से भी ज्यादा लज्जित हुई होंगी। लेकिन उन मंत्री महोदय के खिलाफ शिवराज एक शब्द नहीं निकाल पाएं, सिवाय इसके कि ‘अभी मैंने वो फुटेज देखे नहीं हैं, देखकर टिप्पणी करूंगा।’ दरअसल वो मंत्री महोदय दिल्ली दरबार के निकट हैं और उनका मंत्रिमंडल में समायोजन भी दिल्ली के रिमोट से हुआ है, ऐसे में पांव-पांव वाले भैया की उनसे पंगा लेने की क्या बिसात?
अब तीसरा उदाहरण देखें - 31 जनवरी को उज्जैन में सरकारी जमीन पर भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की सभा हुई। कार्यक्रम से दस मिनट पहले हैलीपेड पर शिवराज पत्रकारों को ज्ञान दे रहे थे कि सूबे के विकास में सबसे बड़ी बाधा है बिजली चोरी। उनके शब्द थे ‘डायरेक्ट लाइन से तार डालकर बिजली चुराने वाले प्रदेश के विकास को बाधित कर रहे हैं, उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करूंगा।’ जहां शिवराज ये बात कह रहे थे वहां से कुछ दूरी पर आडवाणी की सभा चोरी की बिजली से ही रोशन थी। कार्यक्रम में साउंड सिस्टम और पंखे चलाने के लिए मेन लाइन से सीधे तार डालकर तो बिजली चुराई ही गई, इसके अलावा खंभों पर बड़ी-बड़ी लाइट भी उसी चोरी की बिजली से जलाई गई।
ये बहुत छोटे-छोटे उदाहरण हैं जो यह दर्शाने के लिए काफी हैं कि छवि मांझने में जुटे शिवराज की सत्ता कितनी तिलिस्मी है। इन दिनों मुख्यमंत्री अति आत्मविश्वास के शिकार हैं। हॉकी को मदद, फुटबॉल एकेडमी के लिए जमीन देने की घोषणा भी खुद को लोकप्रिय बनाने के शिगूफे हैं। कभी गाना गाकर, कभी नर्मदा नदी में तैरकर, कभी दलित के घर पर रुककर शिवराज खुद को लालू यादव की तरह लोकप्रिय बनाने की जुगत में दिखते तो जरूर हैं, लेकिन लालू जैसा दिमाग पाने में शिवराज को सदियां लग जाएंगी।
और अंत में शिवराज के लिए रघुवीर सहाय की कविता
पैदा कम हो रहा है क्योंकि लोग
गुलाम हैं
केवल बात करने वालों की नौकरियाँ
खेत खोदने वालों की नौकरियों पर निर्भर है
अब उनकी तनख्वाहें निकल नहीं रही हैं
अनाज का इस्तेमाल तुम चाहते हो
खाने के लिए
तुम चाहते हो गाढ़े वक्त में सहारे के लिए
तुम चाहते हो दबाकर
उसी से दूसरों का धन खींचने के लिए
तुम चाहते हो दूसरों का धन
खींचने का साधन बनाए जाने के लिए
ताकि उस धन से
तुम्हारे राजनैतिक कार्यकर्ताओं की
तनख्वाहें दी जा सकें।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान! इस नाम की ·ी प्रतिध्वनि अब आम जनता में पाखंड की प्रतिमूर्ति के रूप में सामने आती है। उनकी लाख कोशिश है कि वे सिर्फ और सिर्फ प्रदेश के विकास के लिए जुटे हुए हैं, उन्हें सिवाय जनता के कल्याण के अलावा और कुछ नहीं सूझता। जनता को अब यह साफ-साफ नजर आने लगा है कि मुख्यमंत्री सिर्फ और सिर्फ नौटंकीबाज और पाखंड की प्रतिमूर्ति हैं। पूरे प्रदेश में शिव बाबू नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के मंजे हुए कलाकार के रूप में सामने आ रहे हैं। मप्र का प्रशासन तंत्र मोटे तौर पर ऐसा नजर आता है मानो पूरे तंत्र में भ्रष्टाचार की दीमक लग गई हो। मैं उन्हें नौटंकीबाज इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जिस घर की औलादें दुष्चरित्र, भ्रष्ट और दुराचारी हो जाएं तो उस घर का बाप समाज में जिस तरह अपनी औलादों के कुकर्मों को छिपाता है और उनकी प्रशंसा के ·कीदे गढ़ता है, वही उपक्रम शिवराज सिंह कर रहे हैं। एक कहावत है कि आप सोते हुए को जगा सकते हैं, लेकिन जो सोने का बहाना कर रहा हो उसे कैसे जगाएंगे। शिवराज को सब मालूम है कि कौन भ्रष्ट है, कौन दूध का धुला है, कौन दूध का नहीं धुला है, कौन कितने पैसे कमा रहा है, कौन दलाल है, कौन भड़वा है। सब मालूम है। फिर भी जिस तरह से एक पाखंडी अपने अंत:करण का निस्पृह भाव प्रदर्शित करता है, वैसा ही वे करते हैं। ऐसा क्यों है? समझ में नहीं आता। मुख्यमंत्री निवास से लेकर सचिवालय तक चंद भ्रष्टों की कोटरी ने उन्हें घेर रखा है। सिर्फ उनको छोड़कर शिवराज पूरी नौकरशाही को भ्रष्ट बताने में जुटे हुए हैं। मैं तो लिख-लिख कर थक गया हूं। बार-बार लिखने पर ऐसा लगता है कि मैं भैंस के आगे बीन बजा रहा हूं। मुख्यमंत्री की प्राथमिकताएं क्या हैं, यह समझ में नहीं आता। वे भ्रष्टाचार को मिटाने की बात किस बूते पर करते हैं, जबकि उनके इर्द-गिर्द भ्रष्टों का बोलबाला हो। कृष्ण करे तो लीला और दूसरे करें तो गुण्डाई। संभवत: यही सूत्र वाक्य है शिवराज का। उनके अपनों के लिए भ्रष्टाचार और दुराचार की परिभाषा बदल जाती है। इन सब पर पर्दा डालने के लिए शिवराज ढोंग और चोचलेबाजी का तिलिस्म रचते हैं।
अभी हाल ही में ऐसे कई घटनाक्रम हुए हैं जिससे जनमानस में प्रदेश सरकार·की छवि धूमिल हुई है, लेकिन कर क्या सकते हैं। अभी तो वे सत्ता में हैं, मध्यप्रदेश उन राज्यों में शुमार हो गया है जहां सर्वाधिक इनकम टैक्स, सीबीआई और सेंट्रल एक्साइज के छापे पड़े हैं। भाजपा के नेता उत्सवधर्मी हो गए हैं। खूब चंदा वसूली कर रहे हैं। नव-सामंतों की तरह अपने जलसों में गोलियां चलवा रहे हैं, लड़कियों के नाच करवा रहे हैं, इससे शिवराज को कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जिस बाप की औलादें बिगड़ जाएं तो वह उनके दुष्कर्मों को ढांकता ही है।
उन्हें किसी की चिंता नहीं है। पाखंड से सराबोर शिवराज की आंखों पर पट्टी नहीं बंधी है। वे ऐसा उपक्रम कर रहे हैं मानो उन्हें कुछ मालूम ही नहीं है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि ऐसा कब तक चलेगा? इसका जवाब आने वाले चुनाव में जनता ही देगी, क्योंकि ये जनता है, सब जानती है।
मप्र बनाओ अभियान की नौटंकी अभी स्थगित है, किंतु एक माह पहले वे नगर निगम के सफाई दरोगा की तरह व्यवहार कर रहे थे। कभी किसी गांव में अचानक हाथ में झाड़ू उठाकर सफाई में जुट जाते हैं तो कभी किसी कॉलेज के सामने लगा होर्डिंग खुद उतरवाने में लग जाते हैं। शिवराज खुद को समग्र स्वच्छ दिखाकर एक आदर्श मुखिया की तस्वीर प्रदर्शित करना तो चाहते हैं लेकिन दरअसल ये बहुत बड़े छलावे का तिलिस्म है और शायद जनता भी अब इसे ठीक तरह से समझने लगी है। इस ढोंग को समझने के लिए इन कुछ उदाहरणों को विस्तार से समझना होगा।
डिण्डौरी के शाहपुर गांव में झाड़ू लगाने की घटना को शिवराज खुद हमेशा बड़े उत्साह से बताते हैं। उनका तर्क हैं कि ‘जैसे ही मैंने शाहपुर में झाड़ू लगाई उसके अगले दिन वे जहां गए, वहां के लोगों ने पूरा गांव साफ कर लिया और कहने लगे आप झाड़ू मत लगाना हमारी नाक कट जाएगी’ जबकि हकीकत यह है कि शिवराज के वहां पहुंचने से पहले ही चापलूस अधिकारियों ने पूरा गांव साफ करवा के गांव वालों को ताकीद कर दी थी कि सारा श्रेय गांव वाले लें, जिससे मुख्यमंत्री प्रसन्न हो जाएं। अब बात मुख्यमंत्री के अश्लीलता के खिलाफ जारी अभियान की। भोपाल के नूतन कॉलेज के सामने एक ब्यूटी पॉर्लर का होर्डिंग जिसमें स्पा का विज्ञापन था, मुख्यमंत्री को अश्लील लगा और उनके निर्देश पर न केवल आनन-फानन में वो होर्डिंग हटवाया गया, बल्कि ब्यूटी पार्लर संचालिका के खिलाफ पुलिस में मामला भी दर्ज कर लिया गया। ऐसे में तय है कि यदि शिवराज आगामी दिनों में खजुराहो जाते हैं तो काम क्रीड़ारत मूर्तियों वाले मंदिर में या तो पर्दा डाल दिया जाएगा या फिर शिवराज बुतभंजक बन खुद ही सारी मूर्तियों को तोडऩा शुरू कर देंगे।
बतौर व्यक्ति शिवराज के आचरण की शुद्धता भले ही सतही तौर पर सराहे जाने लायक दिखे, लेकिन बतौर मुख्यमंत्री तो माहौल बेहद अराजक है। उनके साथ गुड़ में मक्खी की तरह चिपके रहने वाले मंत्रियों और अधिकारियों की अय्याशी और रंगीनमिजाजी पूरी सरकार को बदनाम कर रही है, लेकिन ये या तो शिवराज को दिखता नहीं या वे जानबूझकर आंख मूंदे हुए हैं। शिवराज काबीना के एक मंत्री ने खंडवा के पास मलगांव उत्सव में रशियन डांसर बुलवाकर बैले डांस करवाया। इसमें मंत्री जी ने भी एक गाना गाया। सब कुछ हुआ संत दातार साहब की समाधि के निकट। उन रशियन नृत्यांगनाओं का लिबास और भाव-भंगिमाएं बेहद उत्तेजक थीं। गौरतलब है कि इस कार्यक्रम में भारी तादाद में शिवराज की ‘बहन-बेटियां‘ भी मौजूद थीं जो स्पा के होर्डिंग से भी ज्यादा लज्जित हुई होंगी। लेकिन उन मंत्री महोदय के खिलाफ शिवराज एक शब्द नहीं निकाल पाएं, सिवाय इसके कि ‘अभी मैंने वो फुटेज देखे नहीं हैं, देखकर टिप्पणी करूंगा।’ दरअसल वो मंत्री महोदय दिल्ली दरबार के निकट हैं और उनका मंत्रिमंडल में समायोजन भी दिल्ली के रिमोट से हुआ है, ऐसे में पांव-पांव वाले भैया की उनसे पंगा लेने की क्या बिसात?
अब तीसरा उदाहरण देखें - 31 जनवरी को उज्जैन में सरकारी जमीन पर भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की सभा हुई। कार्यक्रम से दस मिनट पहले हैलीपेड पर शिवराज पत्रकारों को ज्ञान दे रहे थे कि सूबे के विकास में सबसे बड़ी बाधा है बिजली चोरी। उनके शब्द थे ‘डायरेक्ट लाइन से तार डालकर बिजली चुराने वाले प्रदेश के विकास को बाधित कर रहे हैं, उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करूंगा।’ जहां शिवराज ये बात कह रहे थे वहां से कुछ दूरी पर आडवाणी की सभा चोरी की बिजली से ही रोशन थी। कार्यक्रम में साउंड सिस्टम और पंखे चलाने के लिए मेन लाइन से सीधे तार डालकर तो बिजली चुराई ही गई, इसके अलावा खंभों पर बड़ी-बड़ी लाइट भी उसी चोरी की बिजली से जलाई गई।
ये बहुत छोटे-छोटे उदाहरण हैं जो यह दर्शाने के लिए काफी हैं कि छवि मांझने में जुटे शिवराज की सत्ता कितनी तिलिस्मी है। इन दिनों मुख्यमंत्री अति आत्मविश्वास के शिकार हैं। हॉकी को मदद, फुटबॉल एकेडमी के लिए जमीन देने की घोषणा भी खुद को लोकप्रिय बनाने के शिगूफे हैं। कभी गाना गाकर, कभी नर्मदा नदी में तैरकर, कभी दलित के घर पर रुककर शिवराज खुद को लालू यादव की तरह लोकप्रिय बनाने की जुगत में दिखते तो जरूर हैं, लेकिन लालू जैसा दिमाग पाने में शिवराज को सदियां लग जाएंगी।
और अंत में शिवराज के लिए रघुवीर सहाय की कविता
पैदा कम हो रहा है क्योंकि लोग
गुलाम हैं
केवल बात करने वालों की नौकरियाँ
खेत खोदने वालों की नौकरियों पर निर्भर है
अब उनकी तनख्वाहें निकल नहीं रही हैं
अनाज का इस्तेमाल तुम चाहते हो
खाने के लिए
तुम चाहते हो गाढ़े वक्त में सहारे के लिए
तुम चाहते हो दबाकर
उसी से दूसरों का धन खींचने के लिए
तुम चाहते हो दूसरों का धन
खींचने का साधन बनाए जाने के लिए
ताकि उस धन से
तुम्हारे राजनैतिक कार्यकर्ताओं की
तनख्वाहें दी जा सकें।
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