आओ मिलकर खेलें भ्रष्टाचार... भ्रष्टाचार..., बढ़ाएं गुण्डाराज...
लोग नोटों का उपयोग करते हैं, बचाते हैं, छुपाते हैं, मगर उनकी नजर 'सत्यमेव जयते' पर नहीं जाती। झूठ की तात्कालिक विजय इतनी असरकारक होती है कि सत्य की अंतत: विजय होगी, यह मात्र एक छलावा लगता है। एक राष्ट्र नोट पर सत्यमेव जयते छाप कर सत्य की जीत के प्रति बेफिक्र हो जाता है।
जब जिस प्रदेश में चहुं ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला हो और भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया हो, तो इस कालखण्ड में नैतिकता की बात करना बेमानी है। जो लोग ईमानदारी और नैतिकता की बात करते हैं, उन्हें सरेआम जूते मारना चाहिए। मध्यप्रदेश अवमूल्यन के दौर का मॉडल राज बन गया है। लिहाजा प्रदेश के युवाओं, नौकरीपेशा लोगों, बेरोजगारों, अफसरों, कर्मचारियों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, छुटभैये नेताओं, मंत्रियों एवं अन्य जनप्रतिनिधियों से मेरा आह्वान है कि वे सब भोले शिव के राज में प्रदेश में खूब भ्रष्टाचार करें, लूट-खसोट मचाएं। बेरोजगार और गुण्डे खूब चौथवसूली करें, डकैती, चोरी-चकारी, बलात्कार, हत्या पूर्ण तन्मयता से करें।
मैं यह आह्वान इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि शिव-राज में चहुंओर भ्रम का उजियारा है। मुख्यमंत्री निवास से ही भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बनाने का उपक्रम चल रहा है। छोटे-छोटे इंजीनियरों, बाबुओं के घरों पर छापे पड़ रहे हैं। करोड़ों-अरबों रुपए की संपत्ति मिल रही है। बड़ी मछलियां मौज कर रही हैं। इसलिए हमारे समाज के अधिसंख्य लोग भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाने से वंचित क्यों हों? कानून के रखवालों के कानों में जूं नहीं रेंग रही है। रोज बलात्कार हो रहे हैं, हत्याएं हो रही हैं, डकैती डल रही हैं, लेकिन अपराधी बेखौफ होकर घूम रहे हैं। ऐसा अनुकूल वातावरण पहली मर्तबा शिव सरकार ने उपलब्ध कराया है। जनता इसका भरपूर लाभ ले। स्व. शरद जोशी के मुताबिक...
दुर्भाग्य की बात है कि भ्रष्टाचार एक नासूर बन चुका है। हमारी व्यवस्था को यह दीमक की तरह खा रहा है, फिर वह चाहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह हो या मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, भ्रष्टाचार के खिलाफ ये बातें तो करते हैं, लेकिन इनका अंतस हारा हुआ है। जनता के बीच नई-नई योजनाओं और घोषणाओं की नौटंकी करना इनका शगल है। दोनों में यह समानता है। दोनों ने अपने इर्द-गिर्द भ्रष्टों का जमावड़ा कर रखा है।
अब हमारे लोकायुक्त जस्टिस पीपी नावलेकर साहब को ही लें। वे कहते हैं कि भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए मप्र सरकार के नियमों में संशोधन करना चाहिए। इसको लेकर उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखा है। लोकायुक्त साहब प्रदेश के करीब दो दर्जन ऐसे मामलों से दुखी हैं, जिसमें भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ चालान की कार्यवाही और छापे आदि के बाद भी उनकी पोस्टिंग में कोई बदलाव नहीं किया गया। अरे, इसमें दुखी होने की क्या बात है। तब कोई भी विरोधी दल दुखी नहीं हुआ, तो आप क्यों दुखी होते हो।
हमारे जीवन में 'सत्यमेव जयते' एक सील है, ठप्पा है। आप इसे सरकारी मोहर से लेकर चाय की दुकान पर लगे निरर्थक आदर्श वाक्यों की सजावट तक कहीं भी देख सकते हैं। सौ रुपए से एक रुपए तक के नोट पर लिखा होने के कारण हर भारतवासी की नजर इस पर दिन में कई बार जाती है। फिर वह नोट चाहे खरे पसीने की कमाई हो या रिश्वत, चोरी, बेईमानी की काली कमाई, पर नोटों पर सत्य की विजय चलती रहती है। इस हाथ से उस हाथ, इस जेब से उस जेब। लोग नोटों का उपयोग करते हैं, बचाते हैं, छुपाते हैं, मगर उनकी नजर 'सत्यमेव जयते' पर नहीं जाती। झूठ की तात्कालिक विजय इतनी असरकारक होती है कि सत्य की अंतत: विजय होगी, यह मात्र एक छलावा लगता है। एक राष्ट्र नोट पर सत्यमेव जयते छाप कर सत्य की जीत के प्रति बेफिक्र हो जाता है। सत्य के प्रति ही बेफिक्र हो जाता है। इस देश में जहां लोग बजाय सत्य के सत्यनारायण की कथा पर अधिक भरोसा करते हैं, वहां एक सील या ठप्पा, सील या ठप्पा होने से अधिक गहराई अर्जित नहीं कर पाता।
जहां सामाजिक जीवन में अदना आदमी असत्य से आंखें चार करने की बजाय कतरा कर निकल जाने में स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस करता हो, जहां आर्थिक शक्तियां असत्य को सामान्य व्यावहारिकता के तहत स्वीकार करती हों, जहां राजनीति असत्य पर चलते ही की जा सकती हो, वहां सत्यमेव जयते नोटों पर बने एक और चित्र से अधिक अर्थ नहीं रखता।
यह देश सत्यमेव जयते की सील बना सत्य के प्रति लापरवाह है, सत्य की रक्षा करने वाले न्यायालयों के प्रति लापरवाह है। न्यायाधीशों की आर्थिक हालत उन पंडे-पुजारियों की तरह खस्ता होती है, जो प्रदूषणग्रस्त नदी के घाट पर या उपेक्षित मंदिरों में बैठे रहते हैं। उनकी हालत तभी सुधर सकती है, जब वे असत्य से निरंतर तालमेल जमाते रहें। तबादलों का डर उन्हें सरकारी कर्मचारियों की तरह सताता है। पेंशन के बाद वे पुन: थोड़ा बहुत काम पाने के लिए सरकार के नेताओं की ओर नम्र भाव से निहारते रहते हैं। इस बढ़ती महंगाई में वे सुरक्षित बुढ़ापा कैसे गुजारेंगे, यह चिंता उन्हें परेशान करती है। सत्यमेव जयते की सील के नीचे सत्य की रक्षा करने वालों की बड़ी दुर्दशा है। जिन नोटों पर सत्य की जीत लिखी होती है, उन्हीं नोटों के कारण सत्य इस देश में निरंतर पराजित होता है।
सत्यमेव जयते श्रृंगार है, शोभा है, डिजाइन है, बेलबूटों का हिस्सा है, सत्यभाषी सुकरात के जमाने से गरीब, दुखी और परेशान है। बात समझ में आती है, पर वह ईमानदार न्यायाधीश या अधिकारी की समझ में क्यों नही आती?
जब जिस प्रदेश में चहुं ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला हो और भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया हो, तो इस कालखण्ड में नैतिकता की बात करना बेमानी है। जो लोग ईमानदारी और नैतिकता की बात करते हैं, उन्हें सरेआम जूते मारना चाहिए। मध्यप्रदेश अवमूल्यन के दौर का मॉडल राज बन गया है। लिहाजा प्रदेश के युवाओं, नौकरीपेशा लोगों, बेरोजगारों, अफसरों, कर्मचारियों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, छुटभैये नेताओं, मंत्रियों एवं अन्य जनप्रतिनिधियों से मेरा आह्वान है कि वे सब भोले शिव के राज में प्रदेश में खूब भ्रष्टाचार करें, लूट-खसोट मचाएं। बेरोजगार और गुण्डे खूब चौथवसूली करें, डकैती, चोरी-चकारी, बलात्कार, हत्या पूर्ण तन्मयता से करें।
मैं यह आह्वान इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि शिव-राज में चहुंओर भ्रम का उजियारा है। मुख्यमंत्री निवास से ही भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बनाने का उपक्रम चल रहा है। छोटे-छोटे इंजीनियरों, बाबुओं के घरों पर छापे पड़ रहे हैं। करोड़ों-अरबों रुपए की संपत्ति मिल रही है। बड़ी मछलियां मौज कर रही हैं। इसलिए हमारे समाज के अधिसंख्य लोग भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाने से वंचित क्यों हों? कानून के रखवालों के कानों में जूं नहीं रेंग रही है। रोज बलात्कार हो रहे हैं, हत्याएं हो रही हैं, डकैती डल रही हैं, लेकिन अपराधी बेखौफ होकर घूम रहे हैं। ऐसा अनुकूल वातावरण पहली मर्तबा शिव सरकार ने उपलब्ध कराया है। जनता इसका भरपूर लाभ ले। स्व. शरद जोशी के मुताबिक...
दुर्भाग्य की बात है कि भ्रष्टाचार एक नासूर बन चुका है। हमारी व्यवस्था को यह दीमक की तरह खा रहा है, फिर वह चाहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह हो या मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, भ्रष्टाचार के खिलाफ ये बातें तो करते हैं, लेकिन इनका अंतस हारा हुआ है। जनता के बीच नई-नई योजनाओं और घोषणाओं की नौटंकी करना इनका शगल है। दोनों में यह समानता है। दोनों ने अपने इर्द-गिर्द भ्रष्टों का जमावड़ा कर रखा है।
अब हमारे लोकायुक्त जस्टिस पीपी नावलेकर साहब को ही लें। वे कहते हैं कि भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए मप्र सरकार के नियमों में संशोधन करना चाहिए। इसको लेकर उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखा है। लोकायुक्त साहब प्रदेश के करीब दो दर्जन ऐसे मामलों से दुखी हैं, जिसमें भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ चालान की कार्यवाही और छापे आदि के बाद भी उनकी पोस्टिंग में कोई बदलाव नहीं किया गया। अरे, इसमें दुखी होने की क्या बात है। तब कोई भी विरोधी दल दुखी नहीं हुआ, तो आप क्यों दुखी होते हो।
हमारे जीवन में 'सत्यमेव जयते' एक सील है, ठप्पा है। आप इसे सरकारी मोहर से लेकर चाय की दुकान पर लगे निरर्थक आदर्श वाक्यों की सजावट तक कहीं भी देख सकते हैं। सौ रुपए से एक रुपए तक के नोट पर लिखा होने के कारण हर भारतवासी की नजर इस पर दिन में कई बार जाती है। फिर वह नोट चाहे खरे पसीने की कमाई हो या रिश्वत, चोरी, बेईमानी की काली कमाई, पर नोटों पर सत्य की विजय चलती रहती है। इस हाथ से उस हाथ, इस जेब से उस जेब। लोग नोटों का उपयोग करते हैं, बचाते हैं, छुपाते हैं, मगर उनकी नजर 'सत्यमेव जयते' पर नहीं जाती। झूठ की तात्कालिक विजय इतनी असरकारक होती है कि सत्य की अंतत: विजय होगी, यह मात्र एक छलावा लगता है। एक राष्ट्र नोट पर सत्यमेव जयते छाप कर सत्य की जीत के प्रति बेफिक्र हो जाता है। सत्य के प्रति ही बेफिक्र हो जाता है। इस देश में जहां लोग बजाय सत्य के सत्यनारायण की कथा पर अधिक भरोसा करते हैं, वहां एक सील या ठप्पा, सील या ठप्पा होने से अधिक गहराई अर्जित नहीं कर पाता।
जहां सामाजिक जीवन में अदना आदमी असत्य से आंखें चार करने की बजाय कतरा कर निकल जाने में स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस करता हो, जहां आर्थिक शक्तियां असत्य को सामान्य व्यावहारिकता के तहत स्वीकार करती हों, जहां राजनीति असत्य पर चलते ही की जा सकती हो, वहां सत्यमेव जयते नोटों पर बने एक और चित्र से अधिक अर्थ नहीं रखता।
यह देश सत्यमेव जयते की सील बना सत्य के प्रति लापरवाह है, सत्य की रक्षा करने वाले न्यायालयों के प्रति लापरवाह है। न्यायाधीशों की आर्थिक हालत उन पंडे-पुजारियों की तरह खस्ता होती है, जो प्रदूषणग्रस्त नदी के घाट पर या उपेक्षित मंदिरों में बैठे रहते हैं। उनकी हालत तभी सुधर सकती है, जब वे असत्य से निरंतर तालमेल जमाते रहें। तबादलों का डर उन्हें सरकारी कर्मचारियों की तरह सताता है। पेंशन के बाद वे पुन: थोड़ा बहुत काम पाने के लिए सरकार के नेताओं की ओर नम्र भाव से निहारते रहते हैं। इस बढ़ती महंगाई में वे सुरक्षित बुढ़ापा कैसे गुजारेंगे, यह चिंता उन्हें परेशान करती है। सत्यमेव जयते की सील के नीचे सत्य की रक्षा करने वालों की बड़ी दुर्दशा है। जिन नोटों पर सत्य की जीत लिखी होती है, उन्हीं नोटों के कारण सत्य इस देश में निरंतर पराजित होता है।
सत्यमेव जयते श्रृंगार है, शोभा है, डिजाइन है, बेलबूटों का हिस्सा है, सत्यभाषी सुकरात के जमाने से गरीब, दुखी और परेशान है। बात समझ में आती है, पर वह ईमानदार न्यायाधीश या अधिकारी की समझ में क्यों नही आती?
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