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झूठ के महल बनवा रहे हैं शिव तुम्हारे काले अंग्रेज

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वृहद स्तर पर अध्ययन करने पर ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री अपने गणों और निकटस्थों के बीच पाखण्डी के रूप में उभर रहे हैं। वे अपने मुंहलगों से तो झूठ बोल ही रहे हैं, साथ ही प्रदेश की जनता में झूठ, पाखंड और भुलावे के महल बनवा रहे हैं। यह सम्पूर्ण उपक्रम सम्पन्न हो रहा है उनके ही खासमखास चंद अफसरान (काले अंग्रेज) की देखरेख में। मुझे डर है कि शिवराज की इमेज का अंत "घोषणावीर" के रूप में तब्दील न हो जाए।
माना कि प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का जादू एकतरफा चल रहा है। वह फिर सलमान खान हो या कमलनाथ या फिर ज्योतिरादित्य सिंधिया। सबके सब उनके सामने फीके पड़ रहे हैं। परंतु वृहद स्तर पर अध्ययन करने पर ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री अपने गणों और निकटस्थों के बीच पाखण्डी के रूप में उभर रहे हैं। वे अपने मुंहलगों से तो झूठ बोल ही रहे हैं, साथ ही प्रदेश की जनता में झूठ, पाखंड और भुलावे के महल बनवा रहे हैं। यह सम्पूर्ण उपक्रम सम्पन्न हो रहा है उनके ही खासमखास चंद अफसरान (काले अंग्रेजों) की देखरेख में। मुझे डर है कि शिवराज की इमेज का अंत "घोषणावीर" के रूप में तब्दील न हो जाए। दरसअल सम्पूर्ण प्रदेश में योजनाओं का उजियारा नजर आ रहा है। कहने का आशय यह है कि चंद अफसरान के लाभ-शुभ के चलते विभिन्न योजनाओं की रूपरेखा बनती है। उसका जोरशोर से प्रचार होता है और नतीजा सिफर। ओवरऑल पूरे सिस्टम में नौकरशाही जबर्दस्त हावी है। जनप्रतिनिधि पंगु हो गए हैं। उनकी औकात दो कौड़ी की हो गई है। सिर्फ और सिर्फ इमेज बिल्डिंग हो रही शिवराज की। आम जनता को जितना उजला चेहरा सरकार का दिख रहा है उतना है नहीं। शिक्षा, स्वास्थ्य, अधोसंरचना, अपराध, भुखमरी, कुपोषण, बिजली, पानी, कृषि हर मामले में सरकार की भद पिट रही है। फिर भी शिव के मुंहलगे कह रहे हैं मेरा प्रदेश महान। हां, चालीस-पचास अफसरान और सत्ता के दल्लों की पौ बारह है। दिग्विजय सिंह के राज में  भी कमोबेश यही हालात थे। उन्होंने मंत्रियों और अफसरान को भ्रष्टाचार करने की खुली छूट दे रखी थी। शिव "राज" में मंत्रियों को कम अफसरों को लूटने की ज्यादा छूट है। प्रदेश हर क्षेत्र में पिट रहा है।
इसके कई उदाहरण हैं मसलन :-
- भाजपा सरकार के कार्यकाल में मध्यप्रदेश पर कर्ज और देनदारियां बढ़कर 58 हजार 846 करोड़ रुपए हो गई है।
- भाजपा सरकार ने कर्ज लेकर घी पीने की कहावत चरितार्थ की है। भाजपा ने विधानसभा चुनाव के समय जारी अपने घोषणा-पत्र में राज्य पर 56 हजार करोड़ रुपए की ऋणग्रस्तता का उल्लेख करते हुए इसे राज्य सरकार का दिवालियापन बताया था। उस समय राज्य पर 24 हजार करोड़ का कर्ज था। जो पार्टी 24 हजार करोड़ रुपए के कर्ज को सरकार का दिवालियापन मानती हो, वही पार्टी पांच साल के अपने शासनकाल में दोनों हाथ से कर्ज लेकर राज्य पर कर्ज भार दो गुना कर देती है। यह भाजपा की कथनी करनी में अंतर और भाजपा के महादिवालियेपन का प्रमाणित उदाहरण है।
- भाजपा सरकार द्वारा लिए गए कर्जों के हिसाब से इस सरकार ने अपने कार्यकाल में प्रतिदिन 21 करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज लिया है।
- भाजपा सरकार द्वारा लिए गए बेतहाशा कर्जों के कारण मध्यप्रदेश के प्रत्येक नागरिक पर औसतन कर्ज भार लगभग 9750 रुपए हो गया है।
- पांच साल में भाजपा सरकार को केंद्र की यूपीए सरकार ने केंद्रीय अनुदान, करों के हिस्से के रूप में तथा विभिन्न योजनाओं में कुल लगभग एक लाख करोड़ रुपए दिए हैं।
- पांच साल में भाजपा सरकार ने इतनी बड़ी रकम उस हालात में कर्जे में ली है, जबकि मध्यप्रदेश का केंद्र की यूपीए सरकार द्वारा राजग सरकार के पांच सालों की तुलना में केंद्रीय करों के हिस्से और सहायता अनुदान के रूप में दुगनी धनराशि दी गई है।
- पांच सालों में केंद्र की सरकार ने जिस उदारता के साथ मध्यप्रदेश को धनराशि उपलब्ध कराई है, उसको देखते हुए तो भाजपा सरकार को कर्ज लेने की आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिए थी।
- केंद्र से मिलने वाली धनराशियों में अप्रत्याशित वृद्धि तथा कर्जों के कारण जो वित्तीय संसाधन राज्य सरकार के पास उपलब्ध थे, उसका उपयोग राज्य में दिखाई नहीं पड़ रहा है। कर्जे से ली गई राशि और केंद्र से मिली धनराशियों में व्याप्त लूट खसोट और कमीशनखोरी के स्वरूप के कारण ही संभवत: एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था ने मध्यप्रदेश को सर्वाधिक भ्रष्ट राज्यों में शुमार किया है।
- भाजपा सरकार में राज्य की विकास दर घट गई है। राज्य का सकल घरेलू उत्पाद पहले की तुलना में घटकर 3.5 प्रतिशत हो गया है, जबकि राष्ट्रीय वृद्धि दर 7.3 प्रतिशत रही है। सकल घरेलू उत्पाद के हिसाब से मध्यप्रदेश देश के 20 बड़े राज्यों में वर्ष 2004 में 12वें स्थान से खिसककर अब 14वें स्थान पर पहुंच गया है।
- सकल घरेलू उत्पाद के मामले में बिहार, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और झारखंड जैसे राज्य मध्यप्रदेश से बेहतर स्थिति में हैं।
- मध्यप्रदेश निवेश वातावरण की दृष्टि से भी आठवें स्थान से खिसककर 14वें स्थान पर पहुंच गया है। कृषि क्षेत्र में वर्ष 2004 में मध्यप्रदेश 9वें स्थान पर था, जो 2008 में खिसककर 12वें स्थान पर पहुंच गया है।
- सरकार ने किसानों को यूरिया-खाद खुले बाजार में उपलब्ध कराने का वायदा किया था। स्टाम्प शुल्क में कमी, हर किसान को क्रेडिट कार्ड, बीहड़भूमि को कृषि योग्य बनाकर भूमिहीनों को आवंटित करने और बीज, खेती के औजार तथा कीटनाशक सस्ते दाम पर उपलब्ध कराने का वायदा करने वाली सरकार के कार्यकाल में किसानों को यूरिया और डीएपी खाद तक नहीं मिल पाई। राज्य में ऐसे हालत बने कि खाद के लिए थानों को घेरा गया, ट्रकों को जलाया गया और जगह-जगह लूट हुई।
- जनरेटर पर सब्सिडी और सस्ते ब्याज पर किसानों को ऋण देने का वायदा भी पूरा नहीं किया गया। प्रत्येक कृषि उपज मंडी मुख्यालय पर मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित करने का वायदा भी पूरा नहीं किया गया। फसल आते ही समर्थन मूल्य पर खरीदी की व्यवस्था का वायदा करने वाली सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत राज्य के लिए आवश्यक खाद्यान्न भी समर्थन मूल्य पर खरीदने में सफल नहीं रही। भू-समतलीकरण ऋण से मुक्ति का वायदा भी किसानों के साथ धोखा साबित हुआ।
- फसल बीमा योजना के क्रियान्वयन में सरकार असफल रही है। प्राकृतिक आपदा में राज्य के किसानों को यह सरकार समय पर समुचित राहत पहुंचाने में असफल रही। बाढ़ और सूखे की स्थिति में किसानों की कमर टूट गई।
- खेती-किसानी के लिए बिजली नहीं मिल रही है। ट्रांसफार्मर जले हुए हैं। परिणामस्वरूप राज्य में कृषि उत्पादन में 10 प्रतिशत की कमी आ गई है। नकली खाद, बीज और कीटनाशक की खुलेआम बिक्री हो रही है। तंगहाली और कर्ज के कारण किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। जब अन्य प्रदेशों में गन्ने की दरें 135 रुपए क्विंटल थी, तब मध्यप्रदेश सरकार ने 60 रुपए क्विंटल रेट दिया। किसानों को गन्ना जलाना पड़ा। गन्ना परिवहन के लिए अनुदान भी नहीं दिया गया। गुड़ जब दूसरे प्रदेश में 1800 रुपए क्विंटल बिक रहा था, तब मध्यप्रदेश में 600 रुपए क्विंटल की दर किसानों को मिली, जिससे उनका भारी शोषण हुआ। उद्योगों से साठगांठ कर किसानों की निजी भूमि अधिग्रहित कर उन्हें बेघरबार किया जा रहा है।
- साम्प्रदायिक हिंसा के मामले में मध्यप्रदेश देश में अव्वल है। वर्ष 2006 से 2008 के बीच यहां सांप्रदायिक हिंसा की 448 वारदातें हो चुकी हैं। इस बाबत आंतरिक मामलों के मंत्री अजय माकन ने राज्यसभा के पटल पर एक रिपोर्ट पेश की है, जिसमें देशभर में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं का ब्यौरा दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार बीते तीन साल में मध्यप्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा की 448 घटनाएं हुईं।
- प्रदेश में अपराध चरम पर हैं। तिस पर एसएसपी प्रणाली जैसे शिगूफे से क्या हासिल होगा? बार माफियाओं से लडऩे की बात हो रही है। शिवराज भ्रष्टाचार समाप्त करने की बात कर रहे हैं। लेकिन इसका कोई असर नहीं हो रहा है। अदने से अदने अफसर के घर से करोड़ों रुपए छापों में मिल रहे हैं।
बहरहाल, हमारे प्रदेश और समाज के पराभव का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज जनचर्चा और उपमाओं के केंद्र बिंदु अपराधी और डकैतनुमा अफसर, मसखरे सत्ताई दलाल और असंवेदनशील मंत्रीगण हैं। एक हादसे की तरह ये लोग व्यवस्था के रग-रेशे में प्रवेश कर चुके हैं। प्रदेश स्तर पर सर्वव्यापी नैतिक चेतना का आज अभाव है। सबसे दु:खद और घातक बात यह है कि आज विद्रूपताएं मनुष्य चेतना को झकझोरती नहीं, अपितु आज का जनमानस इन सबमें अय्याशी की तलाश करने लगा है।
एक अजीब तरह की वैचारिक शिथिलता और ठण्डापन हमारे चारों तरफ व्याप्त है तथा इस आत्मघाती परिदृश्य में यदि सबसे ज्यादा कोई पिट रहा है तो वह मोहरा है आम आदमी। वही साध्य है और साधन भी तथा प्रपंची कोई और है। जो प्रपंची है वह मजे में है। वह जीवन की लड़ाई में वीतरागी है। वह इन समस्याओं से ऊपर उठा हुआ है, निस्संग है। उसकी उंगलियों में डोरियाँ हैं, वह नचाता है। हम नाचते हैं।

और अंत में
'' चोर उचक्के आये इक दिन/
बन-बन के सरदार/
मुलुक बिछ गया चादर सा/
पथरी जब सरकार/
चाटुकारों ने तलवे चाटे/
चमचों ने बाँटे लड्डू/
नाच रहे थे भाड़, मिरासी/
टर्राते थे टट्टू/
भले-भले सब लोग थे पब्लिक/
पब्लिक भीड़ का रेला/
भीड़ फिदा थी तस्वीरों पर फेंक-फेंक कर धेला/
"प्रभु रे" भगत बेचारो चीखे/
कैसी यह शिव बारात/
चार्वाक सो दहन में तड़पे/
कविरा बारह बाट/
तिलिस्म भीतर दुनिया भटके/
कोई नीचे कोई ऊपर/
मुर्दा का टीला उसमें ढूंढे/
एक दूर पार का जोकर
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