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भ्रष्ट अफसर और 10 डकैतनुमा मंत्री बनाएंगे स्वर्णिम मध्यप्रदेश

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इतनी रफ्तार है
आज की हवाओं में
हर पत्थर
पड़ा है सिजदे में
और
चट्टानों ने
अपनी-अपनी जगह छोड़ दी है
पुराने दरख्त खामोश हैं
नये पेड़ों की
टहनियों की छांव
आधी अधूरी है
कोई एक माली नहीं है
इस बगीचे का
हर रोज
नये माली
औजारों से
क्यारियां बना रहे हैं
मेरे हाथों में जो
हथियार है
उसका नाम मैं नहीं जानता
मेरे अंदर की मिट्टी का रंग
मुझसे
अलहदा नजर आ रहा है
बगीचे का माली
मेरी भाषा नहीं समझता
इशारों से
बताना चाहता हूं
आग का दरिया है चारों ओर
सुबह की पहली हवा भी
अंदर नहीं आ पा रही है
बगीचे की सुलगती
दीवारों के पार
तलाश है मुझे एक खाली मैदान की
जिसकी कोई सरहद न हो
मध्यप्रदेश के हालात लगभग बगीचे बिना माली की तरह ही है। आग का दरिया चारों ओर है। सुबह की पहली हवा भी अंदर नहीं आ पा रही है। दिनेश जुगरान की उक्त कविता वर्तमान परिवेश में मौजूं है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का वर्तमान 'राज' ठीक उनके धूसर सांवले जीवन की तरह है, जहां चारों तरफ खौफनाक अंधेरा है। इस राज में अपनी आत्मा की मशाल जलाकर डरता-सहमता आम व्यक्ति आहिस्ता-आहिस्ता चलता हुआ प्रतीत होता है। दशहत और बदहवासी के भयानक दर्रों के बीच अचानक संकल्पधर्मा चेतना बांसुरी में फूट पड़ती है। खौफनाक दर्रे अब खौफनाक नहीं लगते। शिव का 'राज' सुबह शुरू होकर झुटपुटे में खत्म होने वाला राज है। उसका अंधेरा भी सच है और उजाला भी। चीख पुकार भी सच है और सन्नाटा भी। तूफानी गति भी सच है और प्रस्तरीभूत जड़ता भी। हॉरर भी सच है प्रबोध भी। बहुत बड़ा रेंज है उसका। सबको समेटने वाला, अंदर से बाहर तक। शिवराज प्रतिबद्ध मुख्यमंत्री दिखते हैं। संपूर्ण प्रतिबद्धता कहीं से संपूर्ण अकेलापन और संपूर्ण अकेलापन ब्रह्मांडत्व भी। मुक्तिबोध के शब्दों को उधार ले तो:
'पक्षधरता हमारी आत्मा, हमारी अंतरआत्मा, का प्रश्न है और चूंकि मेरी अंतरआत्मा की हलचल और बेचैनी आपकी अंतरआत्मा की हलचल और बेचैनी से मिलती जुलती है, इसलिए मैं... आपका भी पक्षधर हूं।'
मुक्तिबोध का यह कथन शिवराज के लिए मौजूं है। फर्ज करें कि शिवराज सिंह यह बात जनता से कहें तो जनता में इसकी स्वीकारोक्ति होगी। किंतु उनके साथी मंत्रिगण और अकर्मण्य नौकरशाही में न तो शिवराज को लेकर कोई प्रतिबद्धता है, न कोई स्वीकारोक्ति। यह कड़वा सच है। इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं, आओ मध्यप्रदेश बनाओ अभियान और माफियाओं के खिलाफ लडऩे के अभियान का हश्र! ये दोनों सरकार  में बैठे लोगों की इच्छा शक्ति को प्रकट करते हैं। आओ मप्र बनाएं अभियान की सुनियोजित तरीके से भू्रण हत्या कर दी कुछ अफसरों और नेताओं के गिरोह ने। इसमें शिवराज सिंह की गलती भी है। वे इन दिनों आत्ममुग्ध और भ्रम के कालखण्ड में जी रहे हैं। वे चार-पांच 'केपिटल-सी' टाइप के अफसरों की कोटरी से घिरे रहते हैं। वे उन्हें यह 'भान' करवाते रहते हैं कि साहब सब कुछ ठीक चल रहा है। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। शिवराज बेहद महत्वाकांक्षी हैं। महत्वाकांक्षी होना बुरी बात नहीं है। वैसे महत्वाकांक्षी होना अराजक होना है। नॉन कन्फरमिस्ट। रूप, पैटर्न और व्यवस्था ठहराव के लक्षण हैं। ठहराव यानी मृत्यु। गढऩे के लिए रूप को तोडऩा होगा। पैटर्न को भंग करना होगा। सड़ी-गली व्यवस्था को नष्ट करना होगा। 'मप्र बनाओ अभियान' में करोड़ों रुपए फूंके गए, लेकिन नतीजा सिफर रहा। इस सरकारी रस्म अदायगी में अफसरान की जेबें गर्म हो गईं। आयातित ब्यूरोक्रेसी के अंत:करण में मध्यप्रदेश के बारे में बेहतरी का विचार कैसे आएगा? यह विचारणीय है। सत्ता प्रतिष्ठान में विराजित मंत्रियों का आचार व्यवहार डकैतों की तरह हो गया है। उन्हें मप्र बनाओ अभियान से क्या लेना-देना। शिवराज सिंह इस बात से भिज्ञ हैं या नहीं, मुझे नहीं मालूम। वैसे उनकी स्मृति चैतन्यता के लिए मैं एक बात बताना चाहता हूं कि पूरे देश में इन दिनों इनकम टैक्स के सर्वाधिक छापे मध्यप्रदेश में पड़े हैं। अपराध और लचर कानून-व्यवस्था के मामले में भी मध्यप्रदेश अव्वल है। कभी शांति और बेहतरीन सुरक्षा व्यवस्था के लिए विख्यात प्रदेश की राजधानी में अपराधों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है तथा लूट, हत्या, चैन खींचना, बलात्कार की घटनाओं की बाढ़ आ गई है। अब हाल के ही घटनाक्रमों को देखें तो शनिवार (21 नवंबर) को सतना के कोरी थाने में न्याय की गुहार लगाने गए दलित दंपति (राजू अहिरवार और उसकी पत्नी सावित्री) को वहां तैनात प्रधान आरक्षक अनुसूइया द्विवेदी ने जमकर पीटा। बाद में क्षेत्रीय नागरिकों ने जब चक्काजाम कर दिया, तो प्रधान आरक्षक को लाइन अटैच किया गया। दूसरी घटना इसी दिन (21 नवंबर) को ग्वालियर में घटित हुई। यहां पिंटो पार्क से एक स्कूली छात्र हरदीप का दिनदहाड़े अपहरण कर लिया गया। ग्वालियर में ही विगत दिनों दिनदहाड़े महिला चिकित्सक और एक प्रापर्टी डीलर की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस तहर की घटनाएं आए दिन होना और इस पर भी शिवराज सरकार का यह कहना कि प्रदेश में कानून व्यवस्था बेहतर है, कितना उचित है? शिवराज सिंह प्रदेश के बालाघाट, मंडला और डिंडोरी में सक्रिय नक्सलियों पर काबू पाने की बात तो करते हैं, लेकिन राजधानी भोपाल में ही एक राजनैतिक पार्टी भाकपा (माले) के तीन दिवसीय सम्मेलन में नक्सलियों के समर्थन में न केवल नारे लगे, बल्कि संगठन के एक वरिष्ठ नेता ने राज्य सरकार को चुनौती तक दे डाली कि हम पर सरकार प्रतिबंध लगा कर देखे। उल्लेखनीय तो यह है कि सम्मेलन के दौरान राज्य सरकार ने इस राजनैतिक दल को पूरी तरह सुरक्षा व्यवस्था तक मुहैया कराई। प्रदेश में कानून व्यवस्था की बात की जाए तो धरना आंदोलन के दौरान शिवराज सरकार ने एक-दो नहीं 24 बार गोली चलाई। इसमें कभी मुजरिम को पकडऩे तो कभी चक्काजाम कर रहे निरीह लोगों के सामने आत्मरक्षार्थ गोली चलाना बताया गया। ये घटनाएं दस माह के अंतराल की ही हैं। इंदौर में दो बार मुजरिमों को पकडऩे गोली चलाई गई, तो धार के मनावर, सरदारपुर, देवास के कन्नौद, बागली, मंदसौर के भावगढ़, डिंडौरी के करंलिया, मुरैना के अम्बाह, पोरसा, नीमच के जावद, कुकड़ेश्वर, रामपुरा, सिंगरौली के माड़ा, बैढऩ, खरगोन के करही, उज्जैन के महिदपुर, सागर के राहतगढ़ में गोली चालन की घटनाएं हुई। इन घटनाओं में 9 लोगों की मौतें हुईं, जबकि 80 से ज्यादा घायल हुए। प्रदेश के आम लोग कितने सुरक्षित हैं, इसकी बात की जाए तो सात माह में ही 1804 महिलाओं के साथ बलात्कार और 833 हत्या की घटनाएं हुई हैं। अपहरण के मामले में 543 मामले दर्ज हैं। वर्ष 2009 के आंकड़ों पर नजर डालें तो 1413 हत्या, 684 अपहरण के प्रकरण दर्ज है। इसके अलावा काफी बड़ी तादाद उन मामलों की है, जिनके लिए लोग रिपोर्ट लिखाने थाने तक नहीं गए।
रही बात प्रदेश में काले धन और भ्रष्टाचार की तो पूरे प्रदेश में उपयंत्री, उप संचालक, सीईओ और लिपिको के यहां छापे में करोड़ों रुपए मिल रहे हैं। शिवराज सिंह को इस बात पर विचार करना चाहिए। अगर इन छोटी मछलियों के घर पर इतनी 'लक्ष्मी' मेहरबान है तो बड़े मगरमच्छोंं के यहां कितनी संपत्ति होगी? बार-बार चीख-चीख कर यह कहने से कि 'हम माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई करेंगे' से माफिया समाप्त नहीं हो जाएंगे। जो शिवराज चीखते हैं और माफियाओं का ढूंढते हैं, उन्हें ढूंढने की जरूरत नहीं है। मुख्यमंत्री निवास से लेकर मंत्रिमंडल में जहां देखो वहां डकैतनुमा लोग मिल जाएंगे, जो सभी तरह के माफिया गिरोहों के संरक्षणदाता हैं। इसे प्रदेश का दुर्भाग्य कहें या अभिशप्त होना कि जहां आईएएस लॉबी पंजाबियों द्वारा डॉमिनेट होती हो और आईपीएस लॉबी बिहारियों से उस प्रदेश का भगवान ही मालिक है। मैं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से कुछ सवालात पूछता हूं।
- कितने आईएएस, आईपीएस और आईएफएस के खिलाफ लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू में जांच चल रही है?
- क्या इन विभागों में भी दबाव की राजनीति चलती है?
- पिछले दिनों उद्योग विभाग के जिस उपसंचालक के यहां लोकायुक्त छापामारी में करोड़ों रुपए मिले थे, उस उपसंचालक पर सीएम हाउस का कौन अफसर मेहरबान था?
- अभी हाल ही में दो प्रमोटी कलेक्टर केपी राही और अंजू बघेल, जिन्हें भ्रष्ट आचरण के कारण आपने निलंबित किया, सीएम हाउस में उनका 'गॉडफादर' कौन है?
- इंदौर के सैटेलाइट समूह, चिराग रीयल इस्टेट, चौधरी इस्टेट के 20 ठिकानों पर इंकम टैक्स के छापे पड़े थे। इनके कर्ताधर्ताओं से बुंदेलखण्ड और महाकौशल के दो मंत्रियों के क्या संबंध हैं?
- शिव मंत्रिमंडल के कितने मंत्रियों के बच्चों और रिश्तेदारों पर जेपी सीमेंट के सनी गौर के एहसान हैं?
- जमाखोरी के खिलाफ चले अभियान में मालवा और ग्वालियर चम्बल क्षेत्र के किन-किन मंत्रियों ने जमाखोरों और मिलावटखोरों से बड़ी रकम डकारी?
-  करोड़ों रुपए की सरकारी जमीन हड़पने वाली दिल्ली की कंपनी पाश्र्वनाथ डेवलपर्स का संरक्षणदाता बुंदेलखण्ड का वह कौन मंत्री है? इस कंपनी को पंजाबी लॉबी के सबसे सशक्त अफसर ने भी सपोर्ट किया था।
-  कमल स्पांज पावर लिमिटेड और केजेएस सीमेंट प्लांट के कर्ताधर्ता के यहां पड़े इंकम टैक्स छापे में एक डायरी मिली है। इसमें चार मंत्रियों, एक सांसद, दो विधायक, एक पूर्व विधायक और तीन आईएएस के नाम उजागर हुए हैं। क्या शिवराज को यह जानकारी है?
बहरहाल, गुण्डों, भ्रष्टों और डकैत जनप्रतिनिधियों की कारगुजारी पर शलभ श्रीराम सिंह की कविता प्रासंगिक है-
बच्चों की खोपडिय़ों का व्यापार
हो रहा है यहां
व्यापार हो रहा है उनकी हड्डियों का
गुर्दों, आंखों और खून का व्यापार
हो रहा है उनके...
सौ रुपए किलो
पालक खरीदने के लिए
तैयार हो रहा है देश
तैयार हो रहा है जनगण
एक कभी न खत्म होने वाले युद्ध के लिए
सिक्कों से लड़ा जाने वाला यह युद्ध
शुरू हो चुका है पृथ्वी पर।
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