उम्र के संध्या काल में आदर्शों से छुटकारा
भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश नारायण सारंग के अमृत महोत्सव ने बता दिया है कि यह पार्टी अतीत से कोई सबक नहीं लेगी। जिस इंडिया शाइनिंग के नारे ने अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी पार्टी की राष्ट्रवादी विचारधारा को सत्ता के कब्रस्तान में पहुंचा दिया, उसका वैभवशाली प्रादेशिक संस्करण सारंग के अमृत महोत्सव में साफ नजर आया। आरएसएस ने त्याग, समर्पण और सादगी की जो मिसालें बीते दशकों में कायम की हैं, उससे उलट सारंग ने ऐश्वर्य, यश और धन का भौंडा प्रदर्शन अपने गुणगान कराने में किया है।
खूबसूरती का ख्याल
ऐसे समय जब भाजपा अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजरने को अभिशप्त हो, तब जन्म तिथि के पांच महीने बाद इस ढंग से 75वां जन्मोत्सव मनाना कुछ ऐसा लगा, जैसे एक ध्वस्त होती इमारत के किसी जर्जर से कमरे में कोई शीशे के सामने खडा़ होकर अपनी खूबसूरती निहारे और टाई बांधे! बेहतर होता अपनी पत्रिका में भाजपा में सुधार के उपदेश देने वाले सारंग इस मौके पर पार्टी की बेहतरी पर केंद्रित कोई विचारोत्तेजक बहस आयोजित करते। शायद उसमें से कोई रास्ता नजर आता। लेकिन वे पूरी तरह अपने यशगान पर केंद्रित रहे, जैसे पार्टी से कोई लेना-देना ही न हो! या सिर्फ लेना ही लेना हो!
आत्मा का हाहाकार
उनके परिचय पत्र में बताया गया कि वे 1944 में आरएसएस से जुडे़, लेकिन इस जलसे में उन्होंने अपने आरएसएस से जुडे़ होने का कोई सबूत नहीं दिया। संघ हमेशा ही व्यक्ति पूजा और आत्मस्तुति के खिलाफ रहा। संघ को अपना जीवन समर्पित करने वाले हजारों लोगों के परिवार तबाह हो गए। न उन्हें कोई पद मिले, न अवसर, न उन्होंने अपने बच्चों के लिए ही कुछ किया। वे जीवनभर सिर्फ विचारधारा की खातिर भटकते रहे। सारंग के हमउम्र ऐसे हजारों त्यागी स्वयंसेवक आज भी मौजूद हैं। सारंग के जलवे देखकर उनकी आदर्शवादी आत्मा भी हाहाकार करती होगी!
मैं नहीं माखन खायो
गुरू माधव सदाशिव गोलवलकर और पंडित दीनदयाल उपाध्याय को भी सारंग ने अपने निजी आयोजन में जगह दी। एक विशालकाय पोस्टर पर इन दोनों त्यागी महापुरुषों के चित्र छापे गए। लेकिन बडी़ तस्वीर सारंग की ही थी। गुरूजी और पंडितजी आकर देखते तो माथा पीट लेते! उन्हें कुछ इस अंदाज में पोस्टर पर जगह मिली, जैसे ऋतिक रोशन की फिल्म में राजपाल यादव और जॉनी लीवर को मिलती है। जैसा कि बताया गया कि सारंगजी महोत्सव के लिए खुद तैयार नहीं थे। उनके मित्रों को लगा कि सारंगजी इस स्तर के महोत्सव के सुपात्र हैं और उन्होंने एक दिन का स्वर्ग शहर में रचकर बता दिया। यह तर्क सुनकर कृष्ण का वह प याद आया, जिसमें वे यशोदा से कहते हैं कि मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो, ग्वाल-बाल ने बरबस मुंह लपटायो! सारंग सरीखे ग्वाल-बाल सखा भगवान सबको दे!
साहस को सलाम
सारंग का ज्यादा संबंध पार्टी के लिए धन जुटाने का रहा है। वे कोषाध्यक्ष रहे हैं। लेकिन जिन कुशाभाऊ ठाकरे जैसे संत पुरुषों के समय उन्हें इस स्तर पर काम करने का मौका मिला, उनका यह उत्तरदायित्व भी बेदाग नहीं रहा। महोत्सव में भी कई वता उनकी "कारीगरी" को सलाम करते नजर आए। तस्वीर का दूसरा पहलू दिखाने के लिए कुछ शुभचिंतकों ने इस मौके पर कुछ परचे भी छाप दिए, जिसमें उनकी इसी "कारीगरी" को दिखाया गया। लेकिन स्याह पहलुओं के होते हुए भी सारंगजी के साहस को दाद देनी होगी कि वे इतने वैभव के बीच अपनी जय-जयकार करवा पाए! जबकि सारे सच पार्टी और पार्टी के बाहर ओपन-फैट हैं।
कारीगरी के करिश्मे
निश्चित ही ऐसे आयोजन जेब के पैसे से नहीं होते। जाहिर है धन संग्रह की कारीगरी हुई होगी। भोपाल शहर के कोने-कोने में भांति-भांति की तस्वीरों वाले विशालकाय होर्डिंग्स जिस संख्या और जिस ढंग से लगाए गए, उससे जाहिर है कि इस आयोजन के जरिए सारंग परिवार अपनी पार्टी के सबसे बुरे दौर में अपनी सियासी क्षमताओं का लोहा मनवाने की जुगत में है। उनके प्रचार प्रिय सुपुत्र विश्वास सारंग संगठन की युवा इकाई के प्रदेशाध्यक्ष हैं और सरकार में करोडों के बजट वाले लघु वनोपज संघ के चेयरमैन भी। उन्हें टिकट मिला और जीतकर वे विधायक भी बन गए। सारंग के समकक्ष कई नेता और कार्यकर्ता ऐसे होंगे, जिनके परिवारों में आज भी दो वत के खाने के ठीक-ठिकाने नहीं होंगे। उन्हें उनके त्याग और संघर्ष का उचित से अधिक मिला है।
तब क्या होता
देश और प्रदेश के दिग्गज नेताओं की मौजूदगी में आठ सौ पेज के अभिनंदन ग्रंथ में खुद को पुजवाने की हसरत रह गई थी, सो संयोग से मुख्यमंत्री बने शिवराजसिंह चौहान के राज में उनकी यह इच्छा भी पूरी हो गई। कहा नहीं जा सकता कि उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं रहतीं तो अभिनंदन समारोह समिति के कर्णधार किस पैमाने पर मनाने की सोचते? और तब कैलाश सारंग अपना मूल्यांकन कराने के लिए क्या योजना बनाते और विश्वास सारंग कितना हाथ बंटाते? यह वक्त की बलिहारी है।
खूबसूरती का ख्याल
ऐसे समय जब भाजपा अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजरने को अभिशप्त हो, तब जन्म तिथि के पांच महीने बाद इस ढंग से 75वां जन्मोत्सव मनाना कुछ ऐसा लगा, जैसे एक ध्वस्त होती इमारत के किसी जर्जर से कमरे में कोई शीशे के सामने खडा़ होकर अपनी खूबसूरती निहारे और टाई बांधे! बेहतर होता अपनी पत्रिका में भाजपा में सुधार के उपदेश देने वाले सारंग इस मौके पर पार्टी की बेहतरी पर केंद्रित कोई विचारोत्तेजक बहस आयोजित करते। शायद उसमें से कोई रास्ता नजर आता। लेकिन वे पूरी तरह अपने यशगान पर केंद्रित रहे, जैसे पार्टी से कोई लेना-देना ही न हो! या सिर्फ लेना ही लेना हो!
आत्मा का हाहाकार
उनके परिचय पत्र में बताया गया कि वे 1944 में आरएसएस से जुडे़, लेकिन इस जलसे में उन्होंने अपने आरएसएस से जुडे़ होने का कोई सबूत नहीं दिया। संघ हमेशा ही व्यक्ति पूजा और आत्मस्तुति के खिलाफ रहा। संघ को अपना जीवन समर्पित करने वाले हजारों लोगों के परिवार तबाह हो गए। न उन्हें कोई पद मिले, न अवसर, न उन्होंने अपने बच्चों के लिए ही कुछ किया। वे जीवनभर सिर्फ विचारधारा की खातिर भटकते रहे। सारंग के हमउम्र ऐसे हजारों त्यागी स्वयंसेवक आज भी मौजूद हैं। सारंग के जलवे देखकर उनकी आदर्शवादी आत्मा भी हाहाकार करती होगी!
मैं नहीं माखन खायो
गुरू माधव सदाशिव गोलवलकर और पंडित दीनदयाल उपाध्याय को भी सारंग ने अपने निजी आयोजन में जगह दी। एक विशालकाय पोस्टर पर इन दोनों त्यागी महापुरुषों के चित्र छापे गए। लेकिन बडी़ तस्वीर सारंग की ही थी। गुरूजी और पंडितजी आकर देखते तो माथा पीट लेते! उन्हें कुछ इस अंदाज में पोस्टर पर जगह मिली, जैसे ऋतिक रोशन की फिल्म में राजपाल यादव और जॉनी लीवर को मिलती है। जैसा कि बताया गया कि सारंगजी महोत्सव के लिए खुद तैयार नहीं थे। उनके मित्रों को लगा कि सारंगजी इस स्तर के महोत्सव के सुपात्र हैं और उन्होंने एक दिन का स्वर्ग शहर में रचकर बता दिया। यह तर्क सुनकर कृष्ण का वह प याद आया, जिसमें वे यशोदा से कहते हैं कि मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो, ग्वाल-बाल ने बरबस मुंह लपटायो! सारंग सरीखे ग्वाल-बाल सखा भगवान सबको दे!
साहस को सलाम
सारंग का ज्यादा संबंध पार्टी के लिए धन जुटाने का रहा है। वे कोषाध्यक्ष रहे हैं। लेकिन जिन कुशाभाऊ ठाकरे जैसे संत पुरुषों के समय उन्हें इस स्तर पर काम करने का मौका मिला, उनका यह उत्तरदायित्व भी बेदाग नहीं रहा। महोत्सव में भी कई वता उनकी "कारीगरी" को सलाम करते नजर आए। तस्वीर का दूसरा पहलू दिखाने के लिए कुछ शुभचिंतकों ने इस मौके पर कुछ परचे भी छाप दिए, जिसमें उनकी इसी "कारीगरी" को दिखाया गया। लेकिन स्याह पहलुओं के होते हुए भी सारंगजी के साहस को दाद देनी होगी कि वे इतने वैभव के बीच अपनी जय-जयकार करवा पाए! जबकि सारे सच पार्टी और पार्टी के बाहर ओपन-फैट हैं।
कारीगरी के करिश्मे
निश्चित ही ऐसे आयोजन जेब के पैसे से नहीं होते। जाहिर है धन संग्रह की कारीगरी हुई होगी। भोपाल शहर के कोने-कोने में भांति-भांति की तस्वीरों वाले विशालकाय होर्डिंग्स जिस संख्या और जिस ढंग से लगाए गए, उससे जाहिर है कि इस आयोजन के जरिए सारंग परिवार अपनी पार्टी के सबसे बुरे दौर में अपनी सियासी क्षमताओं का लोहा मनवाने की जुगत में है। उनके प्रचार प्रिय सुपुत्र विश्वास सारंग संगठन की युवा इकाई के प्रदेशाध्यक्ष हैं और सरकार में करोडों के बजट वाले लघु वनोपज संघ के चेयरमैन भी। उन्हें टिकट मिला और जीतकर वे विधायक भी बन गए। सारंग के समकक्ष कई नेता और कार्यकर्ता ऐसे होंगे, जिनके परिवारों में आज भी दो वत के खाने के ठीक-ठिकाने नहीं होंगे। उन्हें उनके त्याग और संघर्ष का उचित से अधिक मिला है।
तब क्या होता
देश और प्रदेश के दिग्गज नेताओं की मौजूदगी में आठ सौ पेज के अभिनंदन ग्रंथ में खुद को पुजवाने की हसरत रह गई थी, सो संयोग से मुख्यमंत्री बने शिवराजसिंह चौहान के राज में उनकी यह इच्छा भी पूरी हो गई। कहा नहीं जा सकता कि उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं रहतीं तो अभिनंदन समारोह समिति के कर्णधार किस पैमाने पर मनाने की सोचते? और तब कैलाश सारंग अपना मूल्यांकन कराने के लिए क्या योजना बनाते और विश्वास सारंग कितना हाथ बंटाते? यह वक्त की बलिहारी है।
Rate this article



del.icio.us
Digg