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रंगों का एतबार ही क्या, सूंघ के भी देख

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आओ मप्र बनाएं अभियान का जो श्रीगणेश मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किया है, वह काबिल-ए-तारीफ है। लेकिन जब हर योजना का सरकारीकरण हो जाना है तो उसकी भद पिट जाती है। हुआ यही। एक ईमानदार कोशिश की प्रदेश के अफसरों ने भ्रूण हत्या कर दी। ठीक वैसे ही हुआ कि शिवराज सिंह की प्रादेशिक परिदृश्य की बडी़ योजना भोपाल तक सीमित हो गई। प्रदेश के अफसरों की यह मानसिकता है कि हर योजना में वे अपना लाभ-शुभ पहले देखते हैं। सांस्कृतिक नचैए-गवैए आए। बुद्धिवादी, बुद्धिजीवी, बौद्धिक अय्याशी करे इससे थोडे़ ही मप्र बनेगा। समाज के हर वर्ग में एक भावना को जाग्रत करना होगा। प्रदेशवासी होने के नाते हर वर्ग का व्यक्ति यह फील करे कि मुझे अपने प्रदेश के विकास के लिए क्या करना है? वह स्वयं सरकारी मदद के बिना क्या कर सकता है। इस भावना को जाग्रत करना होगा। प्रदेश में हर कार्य ताबड़तोड़ होता है और मंत्रियों-अफसरों का गिरोह हर योजना में अपनी लाभ-शुभ की गलियां ढूंढ कर योजनाओं को अपने वातानुकूलित कमरों में समेट लेता है। मंत्री हो या अफसर सबके अपने-अपने व्यक्तिगत एजेंडे हैं सिर्फ और सिर्फ अपनी झोली भरने के। शिवराज के गण और अफसर जब तक व्यक्तिगत एजेंडे नहीं छोडेंगे, तब तक मप्र बनाओ का सपना अधूरा ही रहेगा। दरअसल मप्र बनाओ अभियान में पूर्णता का भाव तभी आएगा जब जनभागीदारी होगी। प्रदेश के चंद अफसरानों और बरसों से मलाई खा रहे मंत्रियों की आत्मा में प्रमोद महाजन का भूत समाहित हो गया है। वे हर आयोजन एवं योजना में "भव्यता" चाहते हैं। भव्यता सरकारी बजट का दोहन फिर चंदाखोरी और उससे अपना उदर पोषण। यह प्रमोद महाजनी प्रवृत्ति बहुत बुरी तरह से पूरे प्रदेश में फैल रही है। मुख्यमंत्री की साफ नीयत की नियति देख कर दु:ख होता है। उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि वे भ्रष्टों की टोली से घिरे हैं। भ्रष्टों के सरताज उन्हें आंख दिखाते हैं। राजनीति में ज्यादा भलमनसाहत और निस्पृह भाव ले डूबता है। अगर वाकई शिवराज सिंह प्रदेश को स्वर्णिम बनाना चाहते हैं तो प्रदेश के मंत्रियों और अफसरों की भ्रष्टाचार से सराबोर स्वर्णिम राहों में कांटे बोना होंगे। सरकारी तंत्र में आंकड़ों की बाजीगरी के अलावा कुछ नहीं होता। अगर वाकई हर योजना का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है तो उसके लिए ग्रामीण सचिवालय का पृथक गठन करना होगा। यानी ग्रामीण कर्मचारियों का अलग कॉडर बनाना होगा। ताकि हर योजना के लाभ का भौतिक सत्यापन हो सके। अगर यह सब संभव नहीं है तो चंद अफसरान और चंद मंत्रियों की तिजोरियों में जनता के सपने बंद हो जाएंगे। सब कुछ वैसा ही चलेगा जैसा पूर्ववर्ती सरकारों में होता रहा है। मेरा शिवराज जी से इन पंक्तियों से एक आग्रह है...
कागजों की कतरनों को भी कहते हैं लोग फूल।
रंगों का एतबार ही क्या, सूंघ के भी देख।।
आओ अब सच का सामना करें।
- किस-किस मंत्री की मध्यप्रदेश में आपकी पार्टी के दो राष्ट्रीय नेताओ से व्यावसायिक भागीदारी है?
- भाजपा के कितने मंत्री और विधायक सार्वजनिक जलसों के लिए करोड़ों का चंदा करते हैं?
- मुख्यमंत्री सचिवालय के वे कौन दो नौकरशाह है, जिन्होंने भोपाल के डीएलएफ प्रोजेक्ट में आठ-आठ प्लाट लिए हैं?
- भोपाल का वह कौन विधायक है, जो अन्डरवर्ल्ड डॉन की तरह पुलिस की मदद से जमीनखोर बन गया है?
- पिछले डेढ़ माह में मंत्रियों और अफसरों के चहेतों को सामाजिक न्याय, महिला बाल विकास और स्वास्थ्य विभाग में कितने करोड़ के ठेके दिए गए?
- सबसे मलाईदार विभाग "परिवहन" का परिवहन दीनदयाल परिसर से यों चलता है?
- सहकारिता विभाग की शीर्ष संस्था अपेस बैंक के संचालक मंडल में बिल्डरों का बोलबाला कैसे हो गया है?
- वह कौन पांच मंत्री हैं, जिनके पास एक-एक हजार करोड़ की सपात्तियां हैं?
- मुख्यमंत्री बताएंगे कि वे कौन तीन मंत्री हैं जो कैबिनेट में उनका विरोध करते हैं?
- नरोत्तम, अजय विश्नोई, विजय शाह और सरताज सिंह क्या अब कैबिनेट में आपके संकट मोचक बनेंगे?
- जनसंपर्क आयुक्त मनोज श्रीवास्तव को अफसरों की आपकी कोटरी ने संस्कृति विभाग से हटवाया है या संघ लॉबी ने?
- वह कौन दो मंत्री हैं, जो केंद्रीय नेताओं के माध्यम से मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं।

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