ठेठ ब्यूरोक्रेट
ब्यूरो/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)। गरीबों की सरकार होने का दावा करने वाली प्रदेश की शिवराज सरकार में नौकरशाहों का एक बड़ा वर्ग आज भी अपने शहंशाह माने बैठा है। देश की सर्वोच्च सेवा के नशे ने इन नौकरशाहों को बौरा दिया है। इनमें कई तो ऐसे हैं, जो अपनी सेवा के आखिरी दौर में हैं, लेकिन जैसे-जैसे वरिष्ठ हो रहे हैं, वैसे-वैसे इनके रुतबे का नशा और बढ़ता जा रहा है। कुछ युवा नौकरशाह जो प्रशासन की बारीकियों को सीखकर धीरे-धीरे परिपक्व हो रहे हैं, उनमें भी नौकरशाही की परंपरागत अकड़ बढ़ती जा रही है। इनमें कुछ उत्साही युवाओं के तो इन दिनों जमीं पर पांव ही नहीं हैं। इन हेकड़ीबाज नौकरशाहों से मिलने में तो आम आदमी भी घबराता है। न जाने ये उसका क्या बुरा कर दें।
ऊपर सत्ता के जिन मठाधीशों की बात की जा रही है वे ठेठ नौकरशाह हैं। ये अपनी नाक पर मक्खी तक बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। न इन्हें आम लोगों से मिलना-जुलना पसंद है, न ज्यादा बातचीत करना। इनमें से अधिकतर राज्य मंत्रालय में बैठते हैं, तो कुछ विभागाध्यक्ष हैं, तो कुछ जिलों में कलेक्टरी कर रहे हैं। इनके व्यवहार से इनके अधीनस्थ अफसर तक दुखी रहते हैं। साहब कब और किस बात पर नाराज हो जाएं, इसकी कोई गारंटी नहीं। इन्हें 'इफ' और 'बट' सुनना कतई पसंद नहीं है। ये हर काम अपने हिसाब से करना चाहते हैं। इनमें से कई तो बड़े उस्ताद और प्रशासनिक गोटियां जमाने में बड़े माहिर हैं। इनमें कुछ अफसरान को पिछले साल हुए प्रशासनिक फेरबदल में मनचाही पोस्टिंग नहीं मिल पाई लेकिन ये ज्यादा समय तक लूप लाइन में नहीं रहते। साम, दाम, दंड, भेद में से कोई भी नीति अपनाकर अपना काम करवा लेते हैं। फिलहाल यह नीति मुक्तेश वाष्र्णेय ने अपनाई और आखिरकार वे अपनी मनचाही और मलाईदार जगह पाने में सफल हो गए। प्रशासन अकादमी के संचालक पद पर रहकर अपना समय काट रहे वाष्र्णेय ने ऐसी गोटियां जमाई कि सरकार ने उन्हें आयुक्त भू-अभिलेख की उनकी मनचाही पोस्टिंग देकर नवाज दिया। कंचन जैन भी ऐसे ही अफसरान में गिनी जाती हैं। मत्स्य विकास निगम में एमडी रहते हुए तो मैडम से मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था, लेकिन मंत्रालय में आने के बाद उन्होंने अपने व्यवहार में थोड़ा बदलाव किया है। जब से उन्हें साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी विभाग के प्रमुख सचिव का अतिरिक्त प्रभार मिला है, तब से मैडम काफी मिलनसार होती जा रही हैं। वैसे इससे पहले मैडम के पास केवल 20 सूत्रीय कार्यान्वयन विभाग था, जहां कोई काम नहीं था, लेकिन उन्होंने भी ऐसी जोड़-तोड़ लगाई कि अब उनका काम बढ़ गया है।
कब बदलेगा इनका मिजाज
प्रदेश में हेकड़ीबाज नौकरशाहों की फेहरिस्त वैसे तो काफी लंबी है, लेकिन कुछ को अपनी अफसरी का ज्यादा ही गुमान है। इनमें सबसे पहले नाम तो अपर मुख्य सचिव रंजना चौधरी का आता है, जो वरिष्ठता के शिखर के करीब पहुंच गई है, लेकिन आज भी वे अपना मिजाज मिलनसार नहीं कर पाईं। मंत्रालय में कृषि उत्पादन आयुक्त रहते हुए अपने एक अवर सचिव को पेपर वेट फेंकटर मारने वाली इस अधिकारी से मिलने से पहले विभाग के अफसर भगवान का नाम लेते हैं। आम आदमी से मिलकर उसकी परेशानी सुनने का पाठ इन्होंने अपनी पूरी सर्विस में नहीं सीखा। यही हाल अपर मुख्य सचिव ग्रामीण उद्योग आईएम चहल का है। जरा-सी बात पर इनका भी माथा ठनक जाता है। यही वजह रही है कि मैडम जहां-जहां भी पदस्थ रहीं उनमें से अधिकांश विभागों के कर्मचारियों को अपनी नौकरियां गंवानी पड़ीं। आयुक्त अल्प बचत एवं लाटरीज रहते हुए मैडम ने करीब 100 अधिकारी-कर्मचारियों की छुट्टी कर दी थी और ये लोग कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगा रहे हैं। मैडम की हेकड़ी आज तक भी नहीं गई।
कब जाएगी इनकी अकड़
सरकार में महत्वपूर्ण विभागों के प्रमुख सचिव के रूप में जिम्मा संभाल रहे कई अफसर को जनसामान्य से मानो एलर्जी-सी है। इनमें महिला एवं बाल विकास विभाग की प्रमुख लवलीन कक्कड़, वित्त विभाग के प्रमुख सचिव जीपी सिंघल, जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव राधेश्याम जुलानिया, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव इकबाल सिंह बैंस और राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव राघव चंद्रा ज्यादा ठेठ ब्यूरोक्रेट माना जाता है। इन अफसरान पर पद और प्रतिष्ठा का ज्यादा नशा है। दफ्तर में आने वाले किसी सामान्य या सामान्य से कुछ ऊपर वाले लोगों से मिलना भी इन्हें पसंद नहीं है। यदि कभी मिल भी लिए मिलने वाले की मजबूरी बन जाती है कि वो एक सांस में अपनी सारी बातें कह दें, क्योंकि इनके पास समय नहीं। स्वास्थ्य सचिव एसआर मोहंती खुद को सबसे होशियार अफसर मानते हैं। स्वास्थ्य के अफसर ही बताते हैं कि साहब के पास मानो ज्ञान का भंडार है। वे किसी की सुनने की बजाए अपनी ज्यादा चलाते हैं। उनके बारे में यही राय उन्हें जानने वालों की भी है। वैसे इन साहब को आमजन से मिलने-जुलने में कोई दिलचस्पी नहीं। मंत्रालय स्थिति इनके कक्ष के बारह घंटों-घंटों तक लगती वाली भीड़ आए दिन देखी जा सकती है।
सलीना सिंह, मनोज झालानी, शिखा दुबे, अनुराग जैन, आशीष उपाध्याय, विवेक अग्रवाल, दीपाली रस्तोगी, एम. गीता, आकाश त्रिपाठी, विवेक पोरवाल और निशांत बड़बड़े जैसे युवा अफसरों के पांव भी इन दिनों जमीं पर नहीं हैं। सलीना सिंह की तेज-तर्रार छवि ने उन्हें इस श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। मैडम के गुस्से के अब तक कई लोग शिकार हो चुके हैं। आयुक्त राज्य शिक्षा केंद्र मनोज झालानी न दफ्तर में मिलते हैं और न फोन पर। साहब ज्यादातर समय बैठकों में ही व्यस्त रहते हैं। साहब का स्टाफ इतना होशियार है कि मिलने आने वाले अच्छे-अच्छे लोगों को भी चलता कर देता है। हस्तशिल्प विकास निगम की एमडी दीपाली रस्तोगी को लोगों से परहेज है और आगंतुक को मैडम के पास भेजने से पहले उनका स्टाफ पूरी छानबीन कर लेता है। मिजाज में ऐसे ही उक्त सभी अफसर भी हैं। उच्च शिक्षा विभाग में अपनी बदमिजाजी के लिए जाने वाले आशीष उपाध्याय अब टाउन एण्ड कंट्री प्लानिंग के मुखिया हो गए हैं। हाल ही में पदभार संभालने के बाद अफसरान के साथ उनकी पहली मीटिंग कई अधिकारियों पर भारी पड़ गई है। यहां भी उनके अकड़ू
मिजाज की चर्चा शुरू हो गई है।
इन्हें क्या कहें
अपने गीत-संगीत के शौक के कारण सुर्खियों में रहने वाले कलाकार आईएएस अधिकारी एम. मोहन राव गीतों की शूटिंग और इनकी कम्पोजिंग के समय तो बड़े मृदु दिखाई देते हैं, लेकिन दफ्तर में पहुंचने के बाद वे अपना आचरण पूरी तरह बदल लेते हैं। आयुक्त पंचायत एवं सामाजिक न्याय रहते हुए लोगों को उनसे सबसे बड़ी परेशानी यही थी कि वे उनसे मिलना आसान काम नहीं था। इधर प्रदेश में पर्यटन को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी जिस अफसर के कंधों पर डाली गई है, उनसे भी लोगों को ऐसी ही शिकायत रहती है। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए हंसमुख चेहरा होना चाहिए। साहब में ये खूबी कुदरती हैं, लेकिन वे इसका इस्तेमाल नहीं करते और हमेशा सख्त मिजाजी और रौबदार आचरण उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका है।
ये हैं ठेठ ब्यूरोक्रेट
रंजना चौधरी, आईएम चहल, देवेंद्र सिंघई, लवलीन कक्कड़, जीपी सिंघल, एसआर मोहंती, राघव चंद्रा, देवराज बिरदी, एपी श्रीवास्तव, राधेश्याम जुलानिया, इकबाल सिंह बैंस, अनिल श्रीवास्तव, केके सिंह, प्रभाकर बंसोड़, विनोद सेमवाल, एमके सिंह, अनिल कुमार जैन, बीआर नायडू, सलीना सिंह, मनोज झालानी, शिखा दुबे, एम. मोहन राव, प्रवीण गर्ग, शैलेंद्र सिंह, अनुराग जैन, आशीष उपाध्याय, अशोक कुमार शाह, अश्विनी कुमार राय, मुक्तेश वाष्र्णेय, सीमा शर्मा, दीप्ति गौड़ मुखर्जी, अरुण कुमार भट्ट, विवेक अग्रवाल, हरिरंजन राव, दीपाली रस्तोगी, जेएन मालपानी, एम. गीता, आकाश त्रिपाठी, विवेक पोरवाल, निशांत बरबड़े।
भोपाल (डीएनएन)। गरीबों की सरकार होने का दावा करने वाली प्रदेश की शिवराज सरकार में नौकरशाहों का एक बड़ा वर्ग आज भी अपने शहंशाह माने बैठा है। देश की सर्वोच्च सेवा के नशे ने इन नौकरशाहों को बौरा दिया है। इनमें कई तो ऐसे हैं, जो अपनी सेवा के आखिरी दौर में हैं, लेकिन जैसे-जैसे वरिष्ठ हो रहे हैं, वैसे-वैसे इनके रुतबे का नशा और बढ़ता जा रहा है। कुछ युवा नौकरशाह जो प्रशासन की बारीकियों को सीखकर धीरे-धीरे परिपक्व हो रहे हैं, उनमें भी नौकरशाही की परंपरागत अकड़ बढ़ती जा रही है। इनमें कुछ उत्साही युवाओं के तो इन दिनों जमीं पर पांव ही नहीं हैं। इन हेकड़ीबाज नौकरशाहों से मिलने में तो आम आदमी भी घबराता है। न जाने ये उसका क्या बुरा कर दें।
ऊपर सत्ता के जिन मठाधीशों की बात की जा रही है वे ठेठ नौकरशाह हैं। ये अपनी नाक पर मक्खी तक बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। न इन्हें आम लोगों से मिलना-जुलना पसंद है, न ज्यादा बातचीत करना। इनमें से अधिकतर राज्य मंत्रालय में बैठते हैं, तो कुछ विभागाध्यक्ष हैं, तो कुछ जिलों में कलेक्टरी कर रहे हैं। इनके व्यवहार से इनके अधीनस्थ अफसर तक दुखी रहते हैं। साहब कब और किस बात पर नाराज हो जाएं, इसकी कोई गारंटी नहीं। इन्हें 'इफ' और 'बट' सुनना कतई पसंद नहीं है। ये हर काम अपने हिसाब से करना चाहते हैं। इनमें से कई तो बड़े उस्ताद और प्रशासनिक गोटियां जमाने में बड़े माहिर हैं। इनमें कुछ अफसरान को पिछले साल हुए प्रशासनिक फेरबदल में मनचाही पोस्टिंग नहीं मिल पाई लेकिन ये ज्यादा समय तक लूप लाइन में नहीं रहते। साम, दाम, दंड, भेद में से कोई भी नीति अपनाकर अपना काम करवा लेते हैं। फिलहाल यह नीति मुक्तेश वाष्र्णेय ने अपनाई और आखिरकार वे अपनी मनचाही और मलाईदार जगह पाने में सफल हो गए। प्रशासन अकादमी के संचालक पद पर रहकर अपना समय काट रहे वाष्र्णेय ने ऐसी गोटियां जमाई कि सरकार ने उन्हें आयुक्त भू-अभिलेख की उनकी मनचाही पोस्टिंग देकर नवाज दिया। कंचन जैन भी ऐसे ही अफसरान में गिनी जाती हैं। मत्स्य विकास निगम में एमडी रहते हुए तो मैडम से मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था, लेकिन मंत्रालय में आने के बाद उन्होंने अपने व्यवहार में थोड़ा बदलाव किया है। जब से उन्हें साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी विभाग के प्रमुख सचिव का अतिरिक्त प्रभार मिला है, तब से मैडम काफी मिलनसार होती जा रही हैं। वैसे इससे पहले मैडम के पास केवल 20 सूत्रीय कार्यान्वयन विभाग था, जहां कोई काम नहीं था, लेकिन उन्होंने भी ऐसी जोड़-तोड़ लगाई कि अब उनका काम बढ़ गया है।
कब बदलेगा इनका मिजाज
प्रदेश में हेकड़ीबाज नौकरशाहों की फेहरिस्त वैसे तो काफी लंबी है, लेकिन कुछ को अपनी अफसरी का ज्यादा ही गुमान है। इनमें सबसे पहले नाम तो अपर मुख्य सचिव रंजना चौधरी का आता है, जो वरिष्ठता के शिखर के करीब पहुंच गई है, लेकिन आज भी वे अपना मिजाज मिलनसार नहीं कर पाईं। मंत्रालय में कृषि उत्पादन आयुक्त रहते हुए अपने एक अवर सचिव को पेपर वेट फेंकटर मारने वाली इस अधिकारी से मिलने से पहले विभाग के अफसर भगवान का नाम लेते हैं। आम आदमी से मिलकर उसकी परेशानी सुनने का पाठ इन्होंने अपनी पूरी सर्विस में नहीं सीखा। यही हाल अपर मुख्य सचिव ग्रामीण उद्योग आईएम चहल का है। जरा-सी बात पर इनका भी माथा ठनक जाता है। यही वजह रही है कि मैडम जहां-जहां भी पदस्थ रहीं उनमें से अधिकांश विभागों के कर्मचारियों को अपनी नौकरियां गंवानी पड़ीं। आयुक्त अल्प बचत एवं लाटरीज रहते हुए मैडम ने करीब 100 अधिकारी-कर्मचारियों की छुट्टी कर दी थी और ये लोग कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगा रहे हैं। मैडम की हेकड़ी आज तक भी नहीं गई।
कब जाएगी इनकी अकड़
सरकार में महत्वपूर्ण विभागों के प्रमुख सचिव के रूप में जिम्मा संभाल रहे कई अफसर को जनसामान्य से मानो एलर्जी-सी है। इनमें महिला एवं बाल विकास विभाग की प्रमुख लवलीन कक्कड़, वित्त विभाग के प्रमुख सचिव जीपी सिंघल, जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव राधेश्याम जुलानिया, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव इकबाल सिंह बैंस और राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव राघव चंद्रा ज्यादा ठेठ ब्यूरोक्रेट माना जाता है। इन अफसरान पर पद और प्रतिष्ठा का ज्यादा नशा है। दफ्तर में आने वाले किसी सामान्य या सामान्य से कुछ ऊपर वाले लोगों से मिलना भी इन्हें पसंद नहीं है। यदि कभी मिल भी लिए मिलने वाले की मजबूरी बन जाती है कि वो एक सांस में अपनी सारी बातें कह दें, क्योंकि इनके पास समय नहीं। स्वास्थ्य सचिव एसआर मोहंती खुद को सबसे होशियार अफसर मानते हैं। स्वास्थ्य के अफसर ही बताते हैं कि साहब के पास मानो ज्ञान का भंडार है। वे किसी की सुनने की बजाए अपनी ज्यादा चलाते हैं। उनके बारे में यही राय उन्हें जानने वालों की भी है। वैसे इन साहब को आमजन से मिलने-जुलने में कोई दिलचस्पी नहीं। मंत्रालय स्थिति इनके कक्ष के बारह घंटों-घंटों तक लगती वाली भीड़ आए दिन देखी जा सकती है।
सलीना सिंह, मनोज झालानी, शिखा दुबे, अनुराग जैन, आशीष उपाध्याय, विवेक अग्रवाल, दीपाली रस्तोगी, एम. गीता, आकाश त्रिपाठी, विवेक पोरवाल और निशांत बड़बड़े जैसे युवा अफसरों के पांव भी इन दिनों जमीं पर नहीं हैं। सलीना सिंह की तेज-तर्रार छवि ने उन्हें इस श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। मैडम के गुस्से के अब तक कई लोग शिकार हो चुके हैं। आयुक्त राज्य शिक्षा केंद्र मनोज झालानी न दफ्तर में मिलते हैं और न फोन पर। साहब ज्यादातर समय बैठकों में ही व्यस्त रहते हैं। साहब का स्टाफ इतना होशियार है कि मिलने आने वाले अच्छे-अच्छे लोगों को भी चलता कर देता है। हस्तशिल्प विकास निगम की एमडी दीपाली रस्तोगी को लोगों से परहेज है और आगंतुक को मैडम के पास भेजने से पहले उनका स्टाफ पूरी छानबीन कर लेता है। मिजाज में ऐसे ही उक्त सभी अफसर भी हैं। उच्च शिक्षा विभाग में अपनी बदमिजाजी के लिए जाने वाले आशीष उपाध्याय अब टाउन एण्ड कंट्री प्लानिंग के मुखिया हो गए हैं। हाल ही में पदभार संभालने के बाद अफसरान के साथ उनकी पहली मीटिंग कई अधिकारियों पर भारी पड़ गई है। यहां भी उनके अकड़ू
मिजाज की चर्चा शुरू हो गई है।
इन्हें क्या कहें
अपने गीत-संगीत के शौक के कारण सुर्खियों में रहने वाले कलाकार आईएएस अधिकारी एम. मोहन राव गीतों की शूटिंग और इनकी कम्पोजिंग के समय तो बड़े मृदु दिखाई देते हैं, लेकिन दफ्तर में पहुंचने के बाद वे अपना आचरण पूरी तरह बदल लेते हैं। आयुक्त पंचायत एवं सामाजिक न्याय रहते हुए लोगों को उनसे सबसे बड़ी परेशानी यही थी कि वे उनसे मिलना आसान काम नहीं था। इधर प्रदेश में पर्यटन को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी जिस अफसर के कंधों पर डाली गई है, उनसे भी लोगों को ऐसी ही शिकायत रहती है। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए हंसमुख चेहरा होना चाहिए। साहब में ये खूबी कुदरती हैं, लेकिन वे इसका इस्तेमाल नहीं करते और हमेशा सख्त मिजाजी और रौबदार आचरण उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका है।
ये हैं ठेठ ब्यूरोक्रेट
रंजना चौधरी, आईएम चहल, देवेंद्र सिंघई, लवलीन कक्कड़, जीपी सिंघल, एसआर मोहंती, राघव चंद्रा, देवराज बिरदी, एपी श्रीवास्तव, राधेश्याम जुलानिया, इकबाल सिंह बैंस, अनिल श्रीवास्तव, केके सिंह, प्रभाकर बंसोड़, विनोद सेमवाल, एमके सिंह, अनिल कुमार जैन, बीआर नायडू, सलीना सिंह, मनोज झालानी, शिखा दुबे, एम. मोहन राव, प्रवीण गर्ग, शैलेंद्र सिंह, अनुराग जैन, आशीष उपाध्याय, अशोक कुमार शाह, अश्विनी कुमार राय, मुक्तेश वाष्र्णेय, सीमा शर्मा, दीप्ति गौड़ मुखर्जी, अरुण कुमार भट्ट, विवेक अग्रवाल, हरिरंजन राव, दीपाली रस्तोगी, जेएन मालपानी, एम. गीता, आकाश त्रिपाठी, विवेक पोरवाल, निशांत बरबड़े।
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