जनाब! नौकरशाह नहीं, रावण कहिए
- नौकरशाह दूसरे कॉडर पर हावी होने की फिराक में। - जनरेशन कंपनी के सीएमडी अग्रवाल के इस्तीफा ने उठाए कई सवाल।
ब्यूरो / बिच्छू डॉट कॉम भोपाल (डीएनएन)। सत्ता के शीघ्र पर बैठे नौकरशाहों की शक्तिशाली होने की भूख मिटने का नाम नहीं ले रही है। सर्वशक्तिमान होने का ख्वाब पाले बैठे नौकरशाह इसके लिए किसी भी बलि लेने को तैयार हंै। फिर चाहे वह मंत्री ही क्यों न हों। दूसरे कॉडर और सर्विस अधिकारियों को तो यह कीड़े-मकोड़े की तरह मसल रहे हैं। इसका जीता जागता उदाहरण है मप्र पॉवर जनरेशन कंपनी के सीएमडी आरबी अग्रवाल का इस्तीफा। इन नौकरशाहों की शह पर ही ढिंढोरा पीटा गया कि अग्रवाल ने अपनी स्वेच्छा से इस्तीफा दिया, लेकिन इस हकीकत को सबने छिपा दिया कि तीन साल के अनुबंध पर पुन: नौकरी पाने वाले अग्रवाल ने दो साल पहले ही इस्तीफा क्यों दे दिया? दरअसल हकीकत यही है कि ऊर्जा विभाग के मास्टर माइंड सचिव मोहम्मद सुलेमान का षड्यंत्र अग्रवाल को ले डूबा। आईएएस लॉबी के इरादों को समझने के लिए यह उदाहरण काफी है। हरेक प्रमुख पद पर अपनी बिरादरी के कब्जे की भूख ने प्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था को ध्वस्त करना शुरू कर दिया है। अग्रवाल के इस्तीफे से इसकी शुरुआत नहीं हुई है, बल्कि पूर्व में भी इसी पद से हटाए गए डीएन प्रसाद को भी नौकरशाहों की नाराजगी ले डूबी। यह तो केवल इंजीनियरिंग सर्विस के पदों को हथियाने का मामला है। नौकरशाही स्वास्थ्य विभाग के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, मुख्य नगर पालिका अधिकारी, महाप्रबंधक, व्यापार एवं उद्योग केंद्र, जिला खनिज अधिकारी, एडीएम, जिला आबकारी अधिकारी, क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी, जिला आपूर्ति नियंत्रक जैसे मलाईदार पदों पर गिद्ध दृष्टि लगाए बैठी है। सूत्रों की मानें तो प्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था के विभिन्न सोपानों का पिरामिड बिगडऩे की कगार पर पहुंच गया है। आईएएस लॉबी ने इसकी शुरुआत आईपीएस और आईएएस कॉडर की उपेक्षा से बहुत पहले ही कर दी है। ये तीनों सेवाएं अखिल भारतीय स्तर की होने के बावजूद सरकार में दबदबा आईएएस लॉबी का ही है। आईपीएस और आईएफएस इनके आगे बौने और पंगु साबित हो गए हैं। सारे विभागों के शीर्ष पदों पर बैठकर प्रशासकीय और वित्तीय अधिकारों से लैस होने के बावजूद अधिकारों और रुतबे की लालसा पाले बैठे नौकरशाह अब रावण की तरह नजर आ रहे हैं, जो अपनी इच्छाओं और इरादों को पूरा करने के लिए अन्य सर्विस के अफसरों को कुछ भी नहीं समझ रहे हैं।
कच्चे कान के शिवराज
आईएएस लॉबी को करीब से जानने वाले बताते हैं कि शिवराज सरकार के कार्यकाल में ही आईएएस के ज्यादा पर निकले हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को यह लॉबी अपने इशारों पर नचाती है। प्रदेश में काम कर रहे हजारों ईमानदार अधिकारियों से ज्यादा शिवराज को नौकरशाहों पर भरोसा है। विभिन्न विभागों में पूरी निष्ठा और ईमानदारी से काम रहे अधिकारियों की मेहनत पर पानी फेरने में इनके विभागों के प्रमुख सचिव और सचिव काफी माहिर हैं। विभिन्न विभाग की समीक्षा बैठकों में यही होता है कि मुख्यमंत्री फील्ड के अफसरों की जमीनी रिपोर्ट को मानने की बजाय एसी कमरों में बैठकर काम करने वाले नौकरशाहों की बातों को ज्यादा तवज्जो देते हैं। इससे मैदानी अफसर न सिर्फ हतोत्साहित हो रहे हैं, बल्कि अब वे भी यथास्थितिवाद में विश्वास करने लगे हैं। जनरेशन कंपनी के सीएमडी अग्रवाल के प्रकरण में भी यही हुआ और ऊर्जा विभाग की बैठक में ऊर्जा सचिव मो. सुलेमान की सलाह पर खुद मुख्यमंत्री ने अग्रवाल से इस्तीफा मांग लिया, जबकि इस बैठक के एक दिन पहले एक अग्रवाल का एक पांव भोपाल तो दूसरा जबलपुर और सारणी ताप गृहों में रहा। केंद्र सरकार के खिलाफ कोयला सत्याग्रह और आए दिन दिल्ली में कोयले एवं बिजली का रोना रोकर सुर्खियां बटोरने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह बिजली विशेषज्ञ बनते जा रहे हैं, लेकिन क्या उन्हें यह नहीं मालूम कि जिस प्लांट लोड फैक्टर की कमी की वजह बताकर अग्रवाल का इस्तीफा लिया गया, उसे नियंत्रित करने की जिम्मेदारी सिर्फ सीएमडी की नहीं होती। सीएमडी के ऊपर ऊर्जा सचिव भी हैं और इसके ऊपर मंत्री। खटारा पॉवर प्लांटों और घटिया कोयले का खामियाजा सिर्फ एक अधिकारी के हिस्से आए और इसी आधार पर उसे हटाया जाए, यह बात गले उतरने वाली नहीं है। हकीकत यही है कि ऊर्जा सचिव सुलेमान की हां में हां नहीं मिलाना अग्रवाल को भारी पड़ा। सुलेमान लगातार अग्रवाल के खिलाफ मुख्यमंत्री के कान भर रहे थे और आखिरकार मुख्यमंत्री ने उनकी मंशा पर मुहर लगा दी। मुख्यमंत्री के कच्चे कानों का नतीजा कई अफसर पहले भी भुगत चुके हैं और कई अब भी भुगत रहे हैं।
पांचों कंपनियों में होंगे आईएएस
बिजली विभाग को तोड़कर बनाई गई पांचों कंपनियों के सीएमडी पर आईएएस अधिकारियों की निगाह है। इनमें से तीन वितरण कंपनियां तो सरकार पहले ही आईएएस के हवाले कर चुके हैं। केवल जनरेटिंग, ट्रांमिशन के अलावा एक ट्रेडिंग कंपनी अब इनके चंगुल से बची है। आईएएस लॉबी यह सारा खेल इन पांचों कंपनियों को अपने कब्जे में करने के लिए खेल रही है। यह भी संभव है कि इन टेक्निकल कामकाज वाली कंपनियों को भी शिवराज आने वाले दिनों में आईएएस अफसरों के हवाले कर दें।
टेक्नोक्रेट आने के बाद बढ़ी ख्वाहिशें
प्रशासनिक व्यवस्था में यह दोष और कॉडरों के बीच द्वंद्व टेक्नोक्रेट से ब्यूरोके्रट बने अधिकारियों के आने के बाद हुआ है। मप्र कॉडर में 66 आईएएस ऐसे हैं, जो पहले टेक्नोक्रेट बने और बाद में ब्यूरोक्रेट बन गए। इनके पास बीई, एमई, बी.टेक और एम.टेक की डिग्रियां हैं। ये अफसर अपने तकनीकी ज्ञान को संभाल नहीं पा रहे हैं, इसलिए छटपटा रहे हैं कि तकनीकी कामों की पूरी कमान भी इनके हाथ रहे। हालांकि विभागों में प्रमुख सचिव और सचिव भी यही हैं, विभागों की व्यवस्था में सर्वेसर्वा पद हैं, लेकिन इसके आईएएस होने का गुरूर दूसरे कॉडर की अफसरों की काबिलियत को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा। ये नहीं चाहते हैं कि सत्ता और शक्ति किसी दूसरे कॉडर के अफसर के हाथों में हो। इनकी तमन्ना तो सिर्फ यही है कि आईपीएस, आईएफएस हो या अन्य कोई किसी कॉडर के अधिकारी, इनके सामने 'इफ' और 'बट' न कर सकें। टेक्नोक्रेट टू ब्यूरोक्रेट आर. परशुराम (बीई), इंद्रनीलशंकर दाणी (बीई), जीपी सिंघल (बीई), मनोज गोयल (बीई), आलोक श्रीवास्तव (बी.टेक), रजनीश वैश्य (बीई), दीपक खाण्डेकर (एम.टेक), अनिल श्रीवास्तव (बी.टेक), एम. गोपाल रेड्डी (बी.टेक), मनोज झालानी (बी.टेक), संजय बंधोपाध्याय (बीई), अनुराग जैन (बी.टेक), विनोद कुमार (बी.टेक), टी. धर्माराव (बीई), शिवनारायण मिश्रा (एम.टेक), मलय श्रीवास्तव (बीई), अजीत केसरी (एम.टेक), अश्विनी कुमार राय (बीई), मनोज गोविल (बी.टेक), अशोक कुमार बर्णवाल (बी.टेक), प्रमोद अग्रवाल (एम.टेक), मनु श्रीवास्तव (एम.टेक), पंकज अग्रवाल (एम.टेक), कैलाश चंद्र गुप्ता (एम.टेक), आशीष श्रीवास्तव (एम.टेक), वीएल कांताराव (बी.टेक), नीलम शमी राव (बीई), संजय दुबे (एम.टेक), नीरज मण्डलोई (एम.टेक), अनिरुद्ध मुखर्जी (बी.टेक), आरके श्रीवास्तव (एम.टेक), संजय कुमार शुक्ला (बीई), हरिरंजन राव (बीई), मनीष रस्तोगी (बी.टेक), शिवशेखर शुक्ला (एम.टेक), सचिन सिन्हा (एम.टेक), डीपी अहिरवार (बीई), डीपी आहूजा (बी.टेक), नीतेश कुमार व्यास (एमई), संजीव कुमार झा (एम.टेक), अमित राठौर (बी.टेक), उमाकांत उमराव (बीई), मनीष सिंह (बीई), राघवेंद्र कुमार सिंह (एम.टेक), सुखवीर सिंह (एम.टेक), गुलशन बामरा (बी.टेक), आकाश त्रिपाठी (बीई), मुकेश चंद्र गुप्ता (बी.टेक), निकुंज कुमार श्रीवास्तव (बी.टेक), अनिल कुमार यादव (बी.टेक), पवन कुमार शर्मा (एमई), शोभित जैन (बीई), विवेक कुमार पोरवाल (एम.टेक), सोनाली व्यंगणकर (बीई), पी.नरहरि (बीई), निशांत बरबड़े (एम.टेक), ज्ञानेश्वर पाटिल (बीई), रघुराज एमआर (बी.टेक), संजीव सिंह (बी.टेक), श्रीमन शुक्ला (बीई), स्वतंत्र कुमार सिंह (बीई), एनएम विभीषण (बीई), छवि भारद्वाज (बी.टेक), सीबी चक्रवर्ती (बीई), विशेष गणपाले (बीई), वी. किरण गोपाल (बी.टेक)।



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