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भ्रष्टों की गिरफ्त में मप्र

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- जहां नजर डालो, वहीं नजर आते हैं भ्रष्ट अफसरान। -शिवराज के स्वर्णिम मध्यप्रदेश पर प्रश्नचिह्न।

महेश बागी / बिच्छू डॉट काम
भोपाल (डीएनएन)। मध्यप्रदेश की नौकरशाही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी है। स्वर्णिम मध्यप्रदेश बनाने की वकालात करने वाले शिवराज सिंह चौहान जहां भ्रष्टाचार को खत्म करने की वकालात कर रहे हैं, वहीं उन्हीं की नाक के नीचे भ्रष्ट अफसरान बैठे हैं, जो अन्य भ्रष्टों को बचाने में भी कामयाब हो गए हैं। आईएएस दंपति अरविंद-टीनू जोशी के मामले में सरकार की भद पिटने के बावजूद सरकार भ्रष्ट अफसरान के विरुद्ध कार्रवाई करने से कतरा रही है।
आयकर विभाग, लोकायुक्त और आर्थिक अपराध शाखा ने जहां-जहां छापे मारे, वहां-वहां अफसरान से करोड़ों रुपए बरामद हुए। इनमें से सिर्फ एक मामले (जोशी दंपति) में सरकार ने निलंबन की कार्रवाई की। इस पर भी यह आरोप चस्पा हो गया कि उक्त दंपति को सीबीआई जांच से बचाने की खातिर यह कदम उठाया गया। भ्रष्टों को अभयदान देने के मामले में शिवराज सरकार पहले से ही कुख्यात है और अब भी उसकी इस (कु) नीति में बदलाव नहीं आ रहा है।
अभियोजन की अनुमति क्यों नहीं?
हाल ही में लोकायुक्त द्वारा राज्य शासन को चिट्ठी लिखकर भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध अभियोजन की अनुमति न देने संबंधी पत्र लिखा गया है। सूत्रों के अनुसार कटनी नगर निगम आयुक्त रहते भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे आईएएस लक्ष्मीकांत द्विवेदी को शिक्षा मंडल में सचिव जैसा महत्वपूर्ण दायित्व सौंपने से लोकायुक्त खफा हंै। उनके सहित बड़े अधिकारियों के विरुद्ध अभियोजन की अनुमति सरकार नहीं दे रही है।
ये अधिकारी हैं- लक्ष्मीकांत द्विवेदी, एंटोनी डिसूजा, एमके सिंह, एमए खान (सेवानिवृत्त), राजेश गुप्ता, महेंद्र सिंह यादव, शंकर प्रताप सिंह बुंदेला, इंद्रजीत कुमार, एसके दासगुप्ता, पीसी मंडलोई, पुनीत गुजराल, एमएल वर्मा, मुकेश वर्मा, एमके देसाई, एनएम पुरस्वानी (सेवानिवृत्त), विनय निगम, बीपी सिंह गहरवार।
भ्रष्टाचार के मामले दफन
एक ओर लोकायुक्त ने सरकार से अधिकारियों के खिलाफ चालान पेश करने की अनुमति मांगी है, वहीं दूसरी ओर संगठन के ऊपरी दबाव और साक्ष्य के अभाव में 25 मामलों में खात्मा लगा दिया गया है। इनमें एमए खान (रिटायर्ड), एके श्रीवास्तव, (मृतक) होशियार सिंह (मृतक), आरके गोयल, जगत स्वरूप, राकेश बंसल, एलएन मीणा, (मृतक) रामजी टांडेकर, आईसीपी केसरी, मोहन गुप्ता, बीआर नायडू, बीएल खरे, एके जैन, मोहम्मद सुलेमान और शहजाद खान शरीक हैं।
सरकारी ढील से बच गए अफसरान
लोकायुक्त ने भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों में सरकार से अभियोजन की अनुमति मांगी थी, किंतु सरकार खामोश बैठी रही। ऐसे 35 अफसर सेवानिवृत्त हो चुके हैं और अब सरकार कह रही है कि अब कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती। अगर सरकार की मंशा पवित्र होती तो इनकी पेंशन रोकी जा सकती थी, किंतु ऐसा भी नहीं किया गया। सरकारी धन डकार कर पेंशन लाभ लेने वाले ये अफसर हैं- हबीब खां, जीएस लोखंडे, केएल मालवीय, शैलेंद्र सिंह, एनजे रायचंदानी, ओपी गोयल, दिलशाद अली, एससी दुबे, एसए सिद्दीकी, एससी दुबे, आरजी सिंह, आरबी खरे, जीएस दुबे, माताप्रसाद शर्मा, आरएस अग्निहोत्री, एमएस चंद्रावत, आरपी शर्मा, एके सिंहा, रामचरण, केएल गुप्ता, आरडी सक्सेना, एआर खान, एसएस दांतरे, पीके गुप्ता, सीजी माथुर, एलके जैन, जीएस ठाकुर, आरबी सिंह, डीएन अग्रवाल, एसआर ब्राह्मण, किशोरीलाल और लक्ष्मीनारायण।
सरकार की नाक के नीचे
सरकार की नाक के नीचे किस तरह भ्रष्टाचार होता है, यह कमलकांत शर्मा के यहां पड़े छापे से स्पष्ट हो गया है। राज्य विधानसभा के इस अवर सचिव के यहां ईओडब्ल्यू द्वारा मारे गए छापे में दस करोड़ की संपत्ति बरामद की गई है। इसके बावजूद वे अपने पद जमे हुए हैं। इसके पूर्व विधानसभा के अतिरिक्त सचिव सत्यनारायण शर्मा और निज सचिव केपी द्विवेदी के यहां पड़े आयकर विभाग के छापे में करोड़ों की संपत्ति बरामद की गई थी।
भ्रष्टाचार पर सरकारी मुहर
ईओडब्ल्यू ने बाणसागर परियोजना में भारी भ्रष्टाचार की शिकायतों पर अफसरों, ठेकेदारों सहित 39 लोगों के खिलाफ प्रकरण पंजीबद्ध किया था। इसमें मे. एसके जैन कंपनी भी शरीक थी, जिसके कर्ता-धर्ताओं ने मे. एसके जैन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रा.लि. के नाम से इसी परियोजना में फिर ठेका हासिल कर लिया है। इसी तरह एक और फर्म विजय कुमार मिश्रा को पेंच सिंचाई परियोजना में ठेका दिया गया है। नियमानुसार जिस ठेकेदार के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज हो, उसे ठेका नहीं दिया जा सकता, किंतु जल संसाधन विभाग में इस नियम का खुलेआम मखौल उड़ाया गया है और सरकार खामोश रही। एसके जैन के पास दो हजार करोड़ के ठेके हैं।
यहां भी है भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार के मामले में जल संसाधन विभाग सबसे आगे है। इस विभाग में भ्रष्टाचार के 90 मामलों की जांच चल रही है। लोनिवि में ऐसी 70 शिकायतें मिली हैं। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की भी इतनी ही शिकायतें हैं। स्वास्थ्य विभाग के तत्कालीन आयुक्त राजेश राजौरा और संचालक योगीराज शर्मा के यहां तो आयकर छापा भी पड़ चुका है। नगरीय प्रशासन, राजस्व, आदिम जाति कल्याण, वाणिज्यिक कर, पीएचई की भी कई शिकायतें हैं। परिवहन और आबकारी विभाग के मामले इसलिए सामने नहीं आते, क्योंकि इनके अफसर जांच एजेंसियों को मासिक बंदी देते हैं।
शिवराज जवाब दें
भ्रष्टाचार खत्म करने का दंभ भरने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सच में अपनी जुबान के पक्के हैं, तो भ्रष्ट अफसरान के विरुद्ध चालान पेश करने की अनुमति क्यों नहीं देते? 750 करोड़ के बिजली खरीद घोटाले के आरोपी राकेश साहनी को सेवानिवृत्त होने के बावजूद मध्यप्रदेश विद्युत मंडल के अध्यक्ष जैसा महत्वपूर्ण दायित्व क्यों सौंपा गया है। भ्रष्टों को अभयदान और इनाम देकर वे कौन-सी नजीर पेश कर रहे हैं?
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