घर के लिए अलग नजरिया...
मुझे बचपन के वे दिन याद आ जाते हैं। जब मैं पुराने खंडहरनुमा लकड़ी के मकान में रहता था। तब मैं मलेशिया के एक छोटे से शहर सारावाक में रहता था। मकान इतना पुराना और जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था कि लोग उस तरफ आने से डरते थे। जब हम अपने घर में खेलते तो घर बुरी तरह से हिलने लगता। मेरी मां हम पर चीखती- "घर गिर जाएगा।" हमारा छोटा-सा परिवार था, जिसमें माता-पिता और हम दो भाई-बहन थे। मैं घर में सबसे छोटा था। घर के आस-पास इतने सारे पेड़-पौधे थे कि हमारा घर अंधेरे में डूबा हुआ लगता। रात की बात तो अलग, दिन के समय भी घर में अंधेरा छाया रहता। वर्ष 1960 के शुरुआती दिन थे। उस वक्त हमारे यहां बिजली नहीं आई थी। हम केरोसिन तेल से जलने वाली लालटेन का प्रयोग करते थे। मेरी मां अंधविश्वासी थी। उस माहौल में घर और भी भयानक लगता था। हम ताओ और बौद्ध दोनों धर्म को मानते थे। हम भटकती आत्माओं और भूत-प्रेत पर भी विश्वास करते थे। हमारे घर के भूतहेपन के बारे में लोगों में काफी चर्चा थी। हमें उनके मुंह से यह सुनना अच्छा नहीं लगता था। मेरे दोस्त भूत के डर से कभी हमारे घर खेलने नहीं आते। हमें यह बात भी खलती थी। हम शाम के वक्त खेलने के लिए घर से दूर घास के मैदान की तरफ निकल जाते। अंधेरा घिर आने पर हमें अपने घर की तरफ लौटने का बिल्कुल भी मन नहीं करता था। इन्हीं बुरे अहसासों के बीच मैं बड़ा होता रहा। जब मैं अपनी किशोरावस्था में पहुंचा तो मेरे मन में अपने घर के प्रति बैठे डर की जगह आत्महीनता और शर्म ने जगह बना ली। हमारे घर में पक्का शौचालय नहीं था, पानी के नल नहीं थे। जबकि हमारे दोस्तों के मकान खूबसूरत और सुविधा संपन्न हुआ करते थे। जब मैं 13 साल का हुआ तो एक बार स्कूल में मेरे पैर में मोच आ गई। स्कूल के प्रधानाध्यापक मुझे घर छोडऩे आए। कितना शर्मनाक दिन था वह, जब वे हमारे घर आए तो मेरी बहन शौच के लिए बनाए गड्ढे की सफाई कर रही थी। वह मेरी जिंदगी के सबसे अप्रिय क्षण थे। मैं उस स्थिति के लिए अपने आप को कोसने लगा। मेरे प्रधानाध्यापक काफी अच्छे संस्कार के थे। उन्होंने कुछ बोला तो नहीं पर हम कितने अस्वास्थ्यकर घर में रहते हैं, जरूर सोचा होगा।
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