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समानता का पाठ

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यह घटना उस समय की है जब फ्रांस में हेनरी चतुर्थ का शासन था। हेनरी चतुर्थ सभी नागरिकों को एक समान मानते थे और उनमें अमीरी-गरीबी, ऊंच-नीच आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करते थे। मगर उनके दरबारी और अधिकारी इस बात को पसंद नहीं करते थे कि सम्राट सभी को समान मानते हुए उनको सम्मान दें। एक बार हेनरी चतुर्थ अपने अधिकारियों के साथ किसी कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक भिक्षुक मिला। भिक्षुक ने बड़ी विनम्रता से अपना हैट उतारा और सिर झुकाकर सम्राट का अभिवादन किया। सम्राट ने भिक्षुक के अभिवादन का ठीक उसी तरह विनम्रता के साथ सिर झुकाकर उत्तर दिया। सम्राट का यह व्यवहार उनके एक अधिकारी को अच्छा नहीं लगा। वह तुरंत उनसे बोला, महामहिम, किसी साधारण भिक्षुक को उसके अभिवादन का इस प्रकार उत्तर देना आपको शोभा नहीं देता। यदि आप एक भिक्षुक को भी इस प्रकार उत्तर देंगे तो राजशाही की गरिमा को ठेस पहुंचेगी। अधिकारी की बात सुनकर सम्राट हंस पड़े। फिर उन्होंने कहा, बंधु, सभ्यता और संस्कार यही बताते हैं कि हमें प्रत्येक व्यक्ति के साथ विनम्र रहना चाहिए और यदि सम्राट ही सबके साथ विनम्रता व शालीनता से पेश नहीं आएगा तो फिर प्रजा उसके साथ आदर से कैसे पेश आएगी? याद रखना, प्रजा भी अपने राजा का तभी आदर करती है जब राजा उसके साथ पूर्ण आदर व प्रेम दर्शाए। लोगों को यह लगना चाहिए कि सत्ता उनके साथ है। वह उनसे दूर नहीं है। राजशाही का अर्थ नागरिकों को आतंकित करना नहीं, बल्कि उनके भीतर आत्मविश्वास पैदा करना है। यह तभी हो सकता है जब राजा और उसके समस्त अधिकारियों का व्यवहार सामान्य लोगों से मधुर और सौहार्द्रपूर्ण हो। फिर हम सभी मानव पहले हैं और राजा या भिक्षुक बाद में। सबको एक समान समझकर ही राजा अपनी प्रजा के साथ न्याय कर सकता है।  हेनरी चतुर्थ का जवाब सुनकर अधिकारी लज्जित हो गया और उसने सम्राट से माफी मांगी।

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