भक्ति के साथ सभी से प्रेम करना ही है मानवतावाद
- श्री आनंदमूर्ति
मनुष्य अपने भाव जगत में जिस तरह आगे बढ़ता है, वह छंदमय है। बाहरी जगत में जो कुछ चल रहा है, उनमें से कुछ से उसकी तुक मिल जाती है, भाव जगत के छंद से सामंजस्य स्थापित हो जाता है, जबकि बाकी घटनाओं का, उसके अंतर्जगत से संतुलन स्थापित नहीं हो पाता। जहां यह संतुलन गड़बडा़ता है, वहां मनुष्य अटपटा अनुभव करता है।
जैसे तुम्हें कुछ लोगों के साथ रहना अच्छा नहीं लगता, जबकि कुछ अन्य लोगों के साथ रहना बहुत अच्छा लगता है। जिन लोगों के बाहरी कार्यकलाप या जीवन-शैली का छंद, तुम्हारे अंतर्जगत के छंद से सामंजस्य स्थापित कर लेता है, उन लोगों का साथ तुहें अच्छा लगता है। और जहां ऐसा नहीं हो पाता, वहां रहना तुम्हें अच्छा नहीं लगता। बाहरी जगत में किस प्रकार चलना है, इस संबंध में एक स्पष्ट नीति आवश्यक है।
मनुष्य जब प्रगति पथ पर आगे बढ़ता है, तब उसका मन अनेक भावनाओं से घिर जाता है। इसलिए यहां इनका विश्लेष्ण भी जरूरी है। भौतिक जगत में जो भावना मनुष्य को धरती के किसी विशेष भू-भाग से जोड़ती है, उसे भौगोलिक भाव प्रवणता (जीओ-सेंटिमेंट) कहते हैं। इसी भौगोलिक भाव प्रवणता से देश प्रेम और क्षेत्रीय धर्म या सोच जैसी और भी कई भावनाओं का जन्म होता है, जो मनुष्य को धरती के छोटे से हिस्से के मोहजाल में फंसा लेती हैं और उसकी प्रगति में बाधा पहुंचाती हैं। जबकि मनुष्य का अंतर्मन चारों दिशाओं में फैलकर अनंत आकाश में विचरण करना चाहता है। भक्ति तत्व, भौतिक जगत से जुडे़ हमारे अस्तित्व-बोध को आध्यात्मिक जगत की परम अनुभूति से जोड़ देता है।
सामाजिक भावना (सोश्यो-सेंटिमेंट) एक और भाव प्रवणता है, जिसकी सीमा, भौगोलिक भाव प्रवणता से थोडी़ बडी़ है। यह भौगोलिक सीमा में बंधी नहीं रहती वरन किसी विशेष समुदाय, संप्रदाय या जनगोष्ठ के मस्तिष्क पर छाई रहती है। इससे प्रभावित मनुष्य केवल अपने ही समुदाय के कल्याण के बारे में सोचता रहता है। अपने लोगों का कल्याण करने की धुन में दूसरों का अहित करने से भी नहीं हिचकिचाता। मानवतावाद यानी ह्यूमन सेंटिमेंट इसके अतिरिक्त एक और भावना है। अतीत में, इस धरती पर ऐसे बहुत से लोगों ने जन्म लिया, पीडित मानवता के दुखों का वर्णन करते-करते जिनकी आंखें आंसुओं से भीग गईं। लेकिन उसके बाद उन लोगों ने बडे़ आराम से बैठकर हिल्सा मछली की रसदार और स्वादिष्ट सजी खाई, मानो सजी के लिए कटते समय उन मछलियों को कोई कष्ट नहीं पहुंचा हो। इस मानवतावाद ने मनुष्य के अतिरिक्त अन्य किसी भी जीव की चिंता नहीं की। अन्य जीव-जंतुओं को कष्ट पहुंचाना, उन्हें अन्यायपूर्ण नहीं लगा। इसलिए मनुष्य को समझ-बूझकर चलना होगा। अपने अस्तित्व की रक्षा करते समय, अपने परिवेश को भी बचाना होगा। मनुष्य के भीतर प्राणों का जो छंदमय स्पंदन है, वही मनुष्य को मानवतावाद की ओर आकर्षित करता है और उसे अपनाने की प्रेरणा देता है। इसी सत्ता बोध को यदि समग्र ब्रह्मांड में फैला दिया जाए, तभी मनुष्य के रूप में हमारा अस्तित्व पूरी तरह सार्थक होगा।
अपने आंतरिक प्रेम को समस्त जगत में फैलाने की यह जो भावना है, इसके पीछे एक विराट सत्ता की उपस्थिति को भी स्वीकार करना होगा। वह विराट सत्ता मानवतावाद की भावना को समस्त दिशाओं में फैलाएगी, हमारे मन में संपूर्ण जीव जगत के प्रति ममत्व पैदा करेगी और सभी को परमानंद की स्थिति तक ले जाएगी। भक्ति मनुष्य की सर्वेष्ठ संपदा है। इस ब्रह्मांड के समस्त अणु- परमाणु उसी की अभिव्यक्तियां हैं। जो इस तथ्य को अच्छी तरह समझकर, इस अनुभूति को अपने हृदय में हमेशा संजोकर रखते हैं, उन्हीं का अस्तित्व सार्थक है। वही सच्चे भक्त हैं। उनके जीवन में भक्ति केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उनके प्राणों में रच-बस जाती है और अतत: भक्ति तत्व को पूरे विश्व में फैलाना उनके जीवन का उद्देश्य हो जाता है। इसी तथ्य को केंद्रित कर मानवतावाद की भावना को जब संपूर्ण चर-अचर जगत में फैला दिया जाता है, उसी भावना का नाम मैंने नव्य मानवतावाद रखा है।
मनुष्य अपने भाव जगत में जिस तरह आगे बढ़ता है, वह छंदमय है। बाहरी जगत में जो कुछ चल रहा है, उनमें से कुछ से उसकी तुक मिल जाती है, भाव जगत के छंद से सामंजस्य स्थापित हो जाता है, जबकि बाकी घटनाओं का, उसके अंतर्जगत से संतुलन स्थापित नहीं हो पाता। जहां यह संतुलन गड़बडा़ता है, वहां मनुष्य अटपटा अनुभव करता है।
जैसे तुम्हें कुछ लोगों के साथ रहना अच्छा नहीं लगता, जबकि कुछ अन्य लोगों के साथ रहना बहुत अच्छा लगता है। जिन लोगों के बाहरी कार्यकलाप या जीवन-शैली का छंद, तुम्हारे अंतर्जगत के छंद से सामंजस्य स्थापित कर लेता है, उन लोगों का साथ तुहें अच्छा लगता है। और जहां ऐसा नहीं हो पाता, वहां रहना तुम्हें अच्छा नहीं लगता। बाहरी जगत में किस प्रकार चलना है, इस संबंध में एक स्पष्ट नीति आवश्यक है।
मनुष्य जब प्रगति पथ पर आगे बढ़ता है, तब उसका मन अनेक भावनाओं से घिर जाता है। इसलिए यहां इनका विश्लेष्ण भी जरूरी है। भौतिक जगत में जो भावना मनुष्य को धरती के किसी विशेष भू-भाग से जोड़ती है, उसे भौगोलिक भाव प्रवणता (जीओ-सेंटिमेंट) कहते हैं। इसी भौगोलिक भाव प्रवणता से देश प्रेम और क्षेत्रीय धर्म या सोच जैसी और भी कई भावनाओं का जन्म होता है, जो मनुष्य को धरती के छोटे से हिस्से के मोहजाल में फंसा लेती हैं और उसकी प्रगति में बाधा पहुंचाती हैं। जबकि मनुष्य का अंतर्मन चारों दिशाओं में फैलकर अनंत आकाश में विचरण करना चाहता है। भक्ति तत्व, भौतिक जगत से जुडे़ हमारे अस्तित्व-बोध को आध्यात्मिक जगत की परम अनुभूति से जोड़ देता है।
सामाजिक भावना (सोश्यो-सेंटिमेंट) एक और भाव प्रवणता है, जिसकी सीमा, भौगोलिक भाव प्रवणता से थोडी़ बडी़ है। यह भौगोलिक सीमा में बंधी नहीं रहती वरन किसी विशेष समुदाय, संप्रदाय या जनगोष्ठ के मस्तिष्क पर छाई रहती है। इससे प्रभावित मनुष्य केवल अपने ही समुदाय के कल्याण के बारे में सोचता रहता है। अपने लोगों का कल्याण करने की धुन में दूसरों का अहित करने से भी नहीं हिचकिचाता। मानवतावाद यानी ह्यूमन सेंटिमेंट इसके अतिरिक्त एक और भावना है। अतीत में, इस धरती पर ऐसे बहुत से लोगों ने जन्म लिया, पीडित मानवता के दुखों का वर्णन करते-करते जिनकी आंखें आंसुओं से भीग गईं। लेकिन उसके बाद उन लोगों ने बडे़ आराम से बैठकर हिल्सा मछली की रसदार और स्वादिष्ट सजी खाई, मानो सजी के लिए कटते समय उन मछलियों को कोई कष्ट नहीं पहुंचा हो। इस मानवतावाद ने मनुष्य के अतिरिक्त अन्य किसी भी जीव की चिंता नहीं की। अन्य जीव-जंतुओं को कष्ट पहुंचाना, उन्हें अन्यायपूर्ण नहीं लगा। इसलिए मनुष्य को समझ-बूझकर चलना होगा। अपने अस्तित्व की रक्षा करते समय, अपने परिवेश को भी बचाना होगा। मनुष्य के भीतर प्राणों का जो छंदमय स्पंदन है, वही मनुष्य को मानवतावाद की ओर आकर्षित करता है और उसे अपनाने की प्रेरणा देता है। इसी सत्ता बोध को यदि समग्र ब्रह्मांड में फैला दिया जाए, तभी मनुष्य के रूप में हमारा अस्तित्व पूरी तरह सार्थक होगा।
अपने आंतरिक प्रेम को समस्त जगत में फैलाने की यह जो भावना है, इसके पीछे एक विराट सत्ता की उपस्थिति को भी स्वीकार करना होगा। वह विराट सत्ता मानवतावाद की भावना को समस्त दिशाओं में फैलाएगी, हमारे मन में संपूर्ण जीव जगत के प्रति ममत्व पैदा करेगी और सभी को परमानंद की स्थिति तक ले जाएगी। भक्ति मनुष्य की सर्वेष्ठ संपदा है। इस ब्रह्मांड के समस्त अणु- परमाणु उसी की अभिव्यक्तियां हैं। जो इस तथ्य को अच्छी तरह समझकर, इस अनुभूति को अपने हृदय में हमेशा संजोकर रखते हैं, उन्हीं का अस्तित्व सार्थक है। वही सच्चे भक्त हैं। उनके जीवन में भक्ति केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उनके प्राणों में रच-बस जाती है और अतत: भक्ति तत्व को पूरे विश्व में फैलाना उनके जीवन का उद्देश्य हो जाता है। इसी तथ्य को केंद्रित कर मानवतावाद की भावना को जब संपूर्ण चर-अचर जगत में फैला दिया जाता है, उसी भावना का नाम मैंने नव्य मानवतावाद रखा है।
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